चुनावी बिसात मुसलमानों की बात

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। सरकार बनाने पर राजनैतिक दलों में जोड़-गणित बिठाया जा रहा है। पिछली बार के मुकाबले कम सीटों पर जीतने के कारण भाजपा खेमे में उत्साह की कमी और निराशा का माहौल है। पहली बार हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे परिवार के चश्म-ओ-चिराग शिवसेना नेता-युवासेनाप्रमुख आदित्य ठाकरे का चुनावी समर में उतरना और उनकी जीत के बाद शिवसेना में जबरदस्त उत्साह है। आश्चर्यजनक रूप से इस बार एनसीपी और कांग्रेस ने भी पिछली बार की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है और उनकी सीटें भी बढ़ी हैं। खासकर एनसीपी के नतीजों ने शरद पवार के राजनैतिक कौशल का लोहा मनवाया है। इस बीच मुस्लिम समाज को लेकर भी राजनैतिक समीक्षक आकलन कर रहे हैं। माना जा रहा है कि मुस्लिम समाज ने इस बार भाजपा को छोड़कर किसी भी बड़े दल को निराश नहीं किया। सिर्फ बड़े ही नहीं मुस्लिम समाज ने क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों तक को अपना मत देने से परहेज नहीं किया जबकि वह अच्छी तरह से जानता था कि इसके नतीजे में कथित सेक्युलर पार्टियां हार भी सकती हैं। २०१४ में महाराष्ट्र विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या ९ थी, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में १० मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। इनमें कांग्रेस से तीन, एनसीपी, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और समाजवादी पार्टी से दो-दो मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीते हैं जबकि शिवसेना से भी एक विधायक चुनकर विधानसभा में पहुंचा है।
बात अगर मुस्लिम समाज के वोटों की करें तो उसने शिवसेना सहित कांग्रेस, एनसीपी, समाजवादी पार्टी, एमआईएम और वंचित आघाड़ी पर भी अपना विश्वास जताया। हिंदुत्व की पहचान के साथ राष्ट्रप्रेमी मुसलमानों से परहेज न करनेवाली शिवसेना के टिकट पर दूसरी बार कोई मुस्लिम चेहरा चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचा है। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की गठबंधन सरकार में पशुपालन मंत्री रहे कांग्रेस के विधायक अब्दुल सत्तार ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर शिवसेना का दामन थामा था। शिवसेना ने अब्दुल सत्तार को संभाजीनगर जिले की उसी सिल्लोड़ विधानसभा सीट से मैदान में उतारा था जहां से वह पिछली बार विधायक थे। वहां के मुस्लिम समाज ने उन्हें शिवसेना के टिकट पर भी स्वीकार कर इस बात पर मुहर लगा दी कि उन्हें शिवसेना से बिलकुल परहेज नहीं है। इससे पहले हिंदुत्व के दम पर महाराष्ट्र में अपनी साख बनानेवाली शिवसेना ने मरहूम साबिर शेख पर विश्वास जताते हुए उन्हें मुसलमानों का चेहरा बनाया था। साबिर शेख को आगे कर शिवसेना तब भी कहा करती थी कि हमारे दिल में देशभक्त मुसलमानों के लिए सम्मान है। साबिर शेख १९९० में शिवसेना के टिकट पर अंबरनाथ से पहली बार विधायक बने थे। वह १९९५ में फिर से चुने गए और मनोहर जोशी के मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री बने। १९९९ में हैट्रिक दर्ज दर्ज करते हुए वे तीन बार विधायक बने।
इस बार कुछ बड़े उलटफेर भी हुए। पिछली बार एमआईएम के दो विधायक थे। उनमें से इम्तियाज जलील अब सांसद हैं। उनकी सीट से चुनाव लड़नेवाले प्रत्याशी नसीरुद्दीन सिद्दीकी शिवसेना के प्रदीप जयसवाल से पराजित हुए। जबकि भायखला से वारिस पठान को शिकस्त देकर शिवसेना की ही यामिनी यशवंत जाधव ने जीत हासिल की। हालांकि एमआईएम के डॉक्टर फारुक शाह ने धुले शहर से और मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल ने कास्मीमाले गांव से चुनाव जीतकर उस कमी को पूरा किया। इस बार समाजवादी पार्टी ने भी अपनी संख्या में एक विधायक की बढ़ोत्तरी कर ली। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू आसिम आजमी ने शिवाजी नगर-मानखुर्द में हैट्रिक मारते हुए अपनी सीट बरकरार रखी जबकि भिवंडी (पूर्व) से रईस शेख ने जीत दर्ज की। मुंबई में कांग्रेस के तीन उम्मीदवारों में मुंबादेवी से अमीन पटेल, बांद्रा (पूर्व) से जीशान बाबा सिद्दीकी और मालाड (पश्चिम) निर्वाचन क्षेत्र से असलम शेख चुनाव जीते। एनसीपी प्रवक्ता और पूर्व मंत्री नवाब मलिक ने अणुशक्ति नगर निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। राकांपा के वरिष्ठ नेता हसन मुश्रीफ कोल्हापुर जिले में कागल निर्वाचन क्षेत्र से विजयी रहे। चार बार के विजेता नसीम खान को शिवसेना के दिलीप लांडे ने पराजित कर सबको चौंका दिया।
चुनाव नतीजों को देखकर मुस्लिम वोटों की राजनीति करनेवालों का कहना है कि अगर मुस्लिम वोट नहीं बंटते तो शायद विधानसभा में मुस्लिमों की संख्या और अधिक हो सकती थी। सच भी है कि ऐसे कई निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार बहुत कम वोट से हारे। उनके हारने का एक कारण यह भी रहा कि कई और मुस्लिम उम्मीदवारों ने उनके वोट काटे। प्रदेश में कुल ३१ ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां मुस्लिम वोटरों की आबादी निर्णायक भूमिका में होती है। मुस्लिम मतों के समीक्षकों के अनुसार वंचित बहुजन आघाड़ी और एमआईएम की मौजूदगी ने कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन को काफी नुकसान पहुंचाया। चुनावी आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि मुख्य तौर पर इन दोनों पार्टियों ने कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन को ही नुकसान पहुंचाया। लेकिन यह तो कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं को सोचना होगा कि आखिर उनके परंपरागत वोट उनसे क्यों बिदके? यह जानते हुए भी कि छोटे दलों को वोट देने से कांग्रेस-एनसीपी को नुकसान होगा फिर भी मुस्लिम मतदाताओं ने क्यों ऐसा कदम उठाया, इस सवाल का जवाब कांग्रेस-एनसीपी को तलाशना होगा। कारण साफ है, मुस्लिम मतदाता अब कांग्रेस-एनसीपी की जागीर नहीं रहा। मुस्लिम समाज उसके साथ भी खड़ा होने से नहीं हिचकिचाता जिसके हार जाने की भी गुंजाइश हो या फिर ऐसे दलों को भी वोट देने से नहीं हिचकता जिसके साथ उसकी कभी नहीं बनी हो। पिछले मुंबई महानगरपालिका में दो नगरसेवक और इस बार के विधानसभा चुनाव में एक विधायक शिवसेना की झोली में डालकर मुसलमानों ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है। किसी समय का चर्चित मुस्लिम वोट बैंक, कथित मुस्लिमपरस्त पार्टियों का पिछलग्गू न बनकर अब अपने विवेक से वोट देता है।
राजनीतिक स्तर पर एक बात तो स्पष्ट है कि यदि मुस्लिम समाज को धार्मिक मुद्दों पर एकत्रित किए जाने की बात होगी तो हिंदू समाज में इसकी प्रतिक्रिया निश्चित तौर पर होगी। इस प्रतिक्रिया की भावना को हिंदू वोट बैंक में परिवर्तित करने का काम वह दल करेंगे, जिन्हें पता है कि उन्हें मुसलमानों का वोट नहीं मिलना। इसका खामियाजा सबसे ज्यादा मुस्लिम समाज को भुगतना पड़ेगा। अब तक मुस्लिम समाज इसी समस्या को झेल रहा था। वह राष्ट्र की मुख्यधारा से कटकर सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया था। उसके वोट देने का बदला अंदाज दिखाता है कि उसे धार्मिक मुद्दों पर बरगलाने से ज्यादा मूलभूत सुविधाओं की बात करने वाले लोग ज्यादा पसंद हैं। वह चुन-चुनकर ऐसे दलों और प्रत्याशियों को वोट देता है जो उनके हितों का ख्याल रखें। शिवसेना ने मुस्लिम समाज पर जो विश्वास जताया उसके बदले में मुस्लिम समाज का भी उस कर्ज को अदा करना यह दर्शाता है कि मुसलमानों के लिए कोई दल अछूत नहीं है। हां, एमआईएम और वंचित आघाड़ी को अब भी वह पर्याय समझने की कोशिश कर रहा है लेकिन पूरी तरह से उन पर निर्भर नहीं है। अलग-अलग जगह पर अलग-अलग दलों के प्रत्याशियों को जिताकर भेजने से मुस्लिम मतों को किसी भी तरफ हांके जाने का आरोप भी हट जाएगा। क्या ऐसा नहीं लगता कि इस चुनाव ने इस बात को बड़ी खूबसूरती से साबित किया है?