चुनावी वादों से डिगती नहीं महिलाएं, ठान कर करती वोटिंग

देश में चुनावी मौसम है और पोलिंग बूथ पर महिलाएं काफी जोश में वोट डालती देखी जा सकती हैं। वोट के इस मौसम में वोटरों को लुभाने के लिए रोजाना कोई न कोई चुनावी शिगूफा छोड़ा जाता है। मगर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि महिलाओं पर इन शिगूफों या यूं कहें चुनावी नौटंकी का ज्यादा असर नहीं होता। वे पहले से ही जिसे वोट देने की ठान लेती हैं, उसे ही वोट देती हैं। यह बात एक सर्वेक्षण में सामने आई है। ‘मॉमस्प्रेसो’ नाम की एक कंपनी महिलाओं के बीच एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वे १,३१७ महिलाओं से विभिन्न तरह के सवाल पूछे गए थे। इनमें चुनाव से संबंधित सवाल थे जिसमें महिलाओं ने अपने विचार व्यक्त किए।
लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण में है। कल यूपी सहित अन्य राज्यों में छठे चरण के तहत मतदान हुआ। सातवें और अंतिम चरण का मतदान १९ मई को संपन्न होगा। लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए अपने मैनिफेस्टो में तरह-तरह के वादे करती हैं लेकिन एक सर्वे के मुताबिक लोकसभा चुनाव के दौरान नेताओं द्वारा उछाली जानेवाली चुनावी नौटंकी से वे प्रभावित नहीं होती हैं। सर्वे में ७० प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि वे राजनेताओं के झांसे में नहीं आतीं और अपने विवेक से मतों का प्रयोग करती हैं। यह खुलासा ‘मॉमस्प्रेसो’ के ‘मॉम्स मैनिफेस्टो’ सर्वे में हुआ है।
सर्वे में लगभग ७० प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि वे राजनीतिक नौटंकी से प्रभावित नहीं होती हैं। अपने और अपने बच्चों के जीवन की बेहतर गुणवत्ता की तलाश में महिलाओं ने अपनी पसंद पर बारीकी से विचार करने के बाद ही अपना वोट डालने की योजना बनाई। ‘मॉमस्प्रेसो’ द्वारा किए गए सर्वे में १,३१७ महिलाओं को शामिल किया गया था, जिन्होंने लोकसभा चुनाव २०१९ को लेकर अपने मत रखे। इस सर्वे में कामकाजी माताएं (३३.७ प्रतिशत) और गृहिणियां (६६.३ प्रतिशत) शामिल थीं। इस सर्वे के मुताबिक करीब ७० प्रतिशत माताओं की प्रमुख चिंता महिलाओं की सुरक्षा रही है, खासकर महानगरों में। वहीं ६२ प्रतिशत माताओं ने अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। ‘मॉमस्प्रेसो’ के सर्वेक्षण में अधिकांश माताओं ने अपने बच्चों के कल्याण को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। ८५ प्रतिशत उत्तर देनेवाली माताओं ने कहा कि शिक्षा का खर्च जान-बूझकर बढ़ाया गया है। उन्होंने भारतीय स्कूलों में आम हो चुकी वार्षिक शुल्क वृद्धि की भी निंदा की है। सर्वेक्षण के मुताबिक ८० प्रतिशत से अधिक माताएं बच्चों के लिए अधिक और अच्छे स्कूल चाहती हैं, ८४ प्रतिशत माताएं सभी प्रमुख कंपनियों या शहर के बड़े कार्यालयों में डे-केयर सुविधाएं चाहती हैं। वहीं सर्वेक्षण में शामिल सभी कामकाजी माताओं को लगता है कि सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान के लिए अधिक कमरों की आवश्यकता है, जबकि १० में से ८ माताओं को लगता है कि खाने के पदार्थों में मिलावट भविष्य में उनके बच्चे के स्वास्थ्य को प्रभावित करेगा। ‘मॉमस्प्रेसो’ के सह-संस्थापक और सीईओ विशाल गुप्ता ने कहा कि ‘मॉमस्प्रेसो’ में हमने दृढ़ता से महसूस किया है कि माताओं के जीवन को जो वास्तविक मुद्दे प्रभावित करते हैं, उनका उल्लेख सभी घोषणापत्रों और बातचीत में शामिल नहीं किया गया है। हमने इसे ही ध्यान में रखते हुए माताओं के सबसे बड़ी कम्युनिटी के तौर पर एक ऐसा घोषणापत्र बनाने का पैâसला किया, जिसमें माताओं की आवाज को सामने लाया जा सके। एक ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाए, जो देश की समग्र प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है।