" /> चुनाव का रास्ता साफ

चुनाव का रास्ता साफ

अंततः महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव निर्विरोध होगा। कांग्रेस पार्टी ने अपने दूसरे उम्मीदवार को नहीं उतारने का फैसला किया है। यह महाराष्ट्र की राजनीतिक उच्च संस्कृति के अनुरूप हुआ। देखा जाए तो विधान परिषद चुनाव कुछ ढोल पीटने जैसा मामला नहीं था। कोरोना काल के दौरान लोगों ने थालियां और तालियां बजार्इं लेकिन विधान परिषद की नौ सीटों के लिए कोरोना संकट के दौरान ढोल बजना उचित नहीं होता। राज्य के मुख्यमंत्री इस चुनावी मैदान में हैं इसलिए यह चुनाव महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए हर कोई चाहता था कि यह चुनाव निर्विरोध हो क्योंकि इसमें सबकी प्रतिष्ठा दांव पर थी। जब मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, उस समय वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। कानूनन उन्हें छह महीने के भीतर विधिमंडल के किसी एक सदन से चुना जाना चाहिए। अचानक कोरोना संकट आ गया और विधान परिषद चुनाव नहीं हुए। राज्यपालनियुक्त सदस्यता की बात पर राज्यपाल को ‘ऊपर से’ आदेश न होने के कारण संविधान एक ओर धरा रह गया। अंततः प्रधानमंत्री के साथ चर्चा के बाद रुके हुई विधान परिषद चुनाव का रास्ता साफ कर दिया गया, लेकिन क्या ‘कोरोना’ काल में ये चुनाव निर्विरोध होंगे? इस पर कांग्रेस की भूमिका से सवाल उठा था। विधान परिषद की नौ सीटों के लिए चुनाव हो रहा है। लेकिन कांग्रेस द्वारा ‘दसवां’ उम्मीदवार दिए जाने के कारण मामला गरमा गया था। अब उन्होंने अपना फैसला बदल लिया और दो की बजाय एक ही उम्मीदवार को मैदान में उतारने का फैसला किया। इसलिए बिना किसी कारण जो मामला गरमाया था, वह पहले ही शांत हो गया। भारतीय जनता पार्टी के १०५ विधायक हैं। उनके तीन उम्मीदवार, प्रत्येक २९ मतों के गणित के अनुसार आराम से चुने जाएंगे। लेकिन उन्होंने चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। ‘हमारे पास चौथे उम्मीदवार को जिताने का पर्याप्त संख्याबल है’ ऐसा इन लोगों की ओर से कहा गया। अब यह आंकड़ा वे कहां से और कैसे लाएंगे ये वही जानें, लेकिन एक बार चुनाव को घोडाबाजार बनाना और इसके लिए जनता पर बोझ डालकर गधा बनाना, यह पक्का होने पर इस प्रकार की राजनीतिक ‘दूरदृष्टि’ आदि तय करके मुक्त हो जाना ही हमारे हाथ में है। शिवसेना ५६, राकांपा ५४ और कांग्रेस ४४ के अनुसार पांच उम्मीदवार आसानी से जीत जाएंगे। कांग्रेस का ४४ वोटों के साथ एक विधायक चुना जाएगा, लेकिन बाकी १४ वोटों के कारण इस पार्टी ने एक और उम्मीदवार को मैदान में उतारने की योजना बनाई थी। मतलब शेष १५ वोटों के लिए कांग्रेस को कोरोना के कठिन काल में खरीद-फरोख्त करनी पड़ती और वो तस्वीर गंभीर होती। वास्तव में कोरोना जैसे कठिन समय में महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनाव निर्विरोध ही होने चाहिए। जनता को अपेक्षा थी कि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एकजुट होकर इस पर विचार करें कि चुनाव निर्विरोध कैसे होंगे? लेकिन राजनीति में अक्सर समायोजन का दूसरा अर्थ होता है, ‘हम अपनी बात पर अड़े रहेंगे। पीछे हटने की बात पर सामनेवाले को जो समायोजन करना हो, करे।’ सौभाग्य से महाराष्ट्र में इस तरह की नौबत नहीं आई। यह महाराष्ट्र की राजनीतिक परंपरा के अनुरूप है। महाराष्ट्र में कोरोना पीड़ितों की संख्या बीस हजार से ऊपर पहुंच गई है। लगभग चार सौ लोगों की जान चली गई है। लोग परेशानी में हैं। खतरा बढ़ता जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में राज्य के कोने-कोने से विधायकों का चुनाव के लिए मुंबई आना अच्छा नहीं होता। इसमें जान को खतरा तो था ही, साथ ही लोगों का सामना भी करना पड़ता। लोग अपना काम-धंधा छोड़कर घर पर तालाबंद रहें और चुनावी खरीद-फरोख्त के लिए विधायकों का मुंबई आना सही नहीं था। लेकिन सत्ता की राजनीति में राजनीतिक उथल-पुथल के अवसर आते रहते हैं। इस पर समायोजन करके रास्ता निकाला जाता तो सब ठीक था। महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव अब खरीद-फरोख्त की मोड़ से गुजरे बिना समायोजन से संपन्न होगा। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस चुनाव के लिए मैदान में हैं और इस चुनाव का उद्देश्य मुख्यमंत्री का चुना जाना ही है। इस चुनाव के पीछे का उद्देश्य यही है कि राज्य कोरोना काल में अस्थिर न हो। इसलिए ‘पीछे’ हटने की बजाय महाराष्ट्र का हित ही अधिक महत्वपूर्ण था। ये अच्छा हुआ कि सभी राजनीतिक दलों ने यह समझ दिखाई। क्योंकि अगर चुनाव होते तो विधायकों के किराए, भत्ते व अन्य प्रशासनिक खर्च बढ़ जाते। अब यह ‘खर्च’ प्रधानमंत्री केयर फंड में देकर राष्ट्रीय कार्य में योगदान दिया जा सकता है। भाजपा ने अपनी उम्मीदवारी घोषित करके पार्टी के प्रस्थापित नेताओं को धक्का ही दिया है। खडसे, पंकजा मुंडे और तावडे जैसे पुराने नेताओं को छोड़कर ‘भाजपा को वोट मत दो’ सभाओं में घोषित तौर पर ऐसा कहने वाले गोपीचंद पडलकर जैसों को उम्मीदवारी दी गई है। (ऐसा हम नहीं बल्कि खडसे और उनके लोग कह रहे हैं)। बाकी रणजीत सिंह मोहिते पाटिल बाहरी हैं और बाकी दो भाजपा के ही हैं, भाजपा के इस गणित से भी हलचल मची हुई है। लेकिन यह उनका आंतरिक मामला है और उस पर हमारा कुछ कहना ठीक नहीं। राष्ट्रवादी ने शशिकांत शिंदे और अमोल मिटकरी को उम्मीदवार बनाया। ऐसा लग रहा था कि सचिन सावंत जैसे आक्रामक व अध्ययनशील पदाधिकारी को कांग्रेस से मौका मिलेगा। विदर्भ के अतुल लोंढे का नाम भी चर्चा में था, लेकिन कम चर्चित राजेश राठौर और पापा मोदी के नाम मराठवाड़ा से सामने आए। इसलिए, महाराष्ट्र विधानपरिषद चुनावों के दौरान थोड़ी हलचल मची। लेकिन अब कांग्रेस पार्टी द्वारा एक ही उम्मीदवार के मैदान में उतारे जाने से चुनाव प्रक्रिया आसान हो गई है। यह महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति और परंपरा के अनुसार ही हो रहा है। इसलिए महाराष्ट्र में समायोजन की राजनीति में लोगों का विश्वास और मजबूत होगा।