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चुनौतियों का अंबार!

कोरोना काल के दौरान काम के हालात और आर्थिक दशा को देखते हुए अब उत्तर प्रदेश सरकार के सामने कम संसाधनों में अधिक काम करने की चुनौती है। फिलहाल कर्मचारियों की दक्षता में वृद्धि कर उनका बेहतर उपयोग करने के साथ ही सरकार ने एक समान विभिन्न योजनाओं को समेकित कर अनुपयोगी योजनाओं को समाप्त करने का फैसला किया है जो वक़्त की जरूरत है। फिलहाल स्थितियों की बेहतरी के लिए योगी सरकार अन्य राज्यों की गुड प्रैक्टिस और उसके कारणों का भी अध्ययन करा रही है ताकि उनको आवश्यकतानुसार उत्तर प्रदेश में भी लागू किया जा सके और बेहतर काम हो। योगी सरकार ने मितव्ययिता के साथ ही विभिन्न अनुदानों पर भी कैंची चलाने की भी तैयारी कर ली है।
फिलहाल भागते-हांफते और हलकान हुए मजदूरों के बीच उत्तर प्रदेश में जो बस की सियासत हुई, कत्तई नहीं होनी चाहिए थी, यह हर खासोआम मान रहा है। वास्तव में यह आपदकाल देश और प्रदेश के सामने ऐसी चुनौतियां और दिक्कतें लेकर आया है जो कभी देखी सुनी नहीं गर्इं। असली चुनौतियां तो आगे हैं और उनसे पार पाने के लिए हमें सिर्फ सरकार पर ही जिम्मेदारी नहीं छोड़ देनी चाहिए। सूबे के हर व्यक्ति, समूह, संस्था और सियासत करने वालों के लिए यह समय सामूहिक प्रयास करने का है, आलोचना और विरोध का शायद नहीं। सरकार को भी सिर्फ अफसरों की ही नहीं, आम-ओ-खास, हर तरह की सलाह पर निगाह रखने का समय है।
लॉकडाउन का चौथा संस्करण उत्तर प्रदेश जैसे देश के महत्वपूर्ण राज्य के लिए वास्तव में बहुत ही चुनौती भरा है खासतौर से गांव गिरांव की बड़ी आबादी के लिए। दरअसल योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए यह क्षेत्र वाकई बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली, मुंबई से लेकर पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों से लाखों प्रवासी कामगार उत्तर प्रदेश लौट चुके हैं या अब भी लौट रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि प्रवासी श्रमिकों और बाहर से गांव आने वाले अन्य लोगों की वजह से सूबे का पूर्वी हिस्सा यानी पूर्वांचल के हालात कई कारणों से चुनौतीपूर्ण हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अभी तक कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या काफी कम थी। कष्टकाल के प्रथम चरण में जब जमात के लोगों का ग्रामीण इलाकों में आना-जाना हुआ तो मरीज भी मिलने शुरू हुए लेकिन इलाज और सतर्कता के साथ ही सख्त एहतियात के चलते स्थितियों में अपेक्षाकृत सुधार रहा। जौनपुर, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और आजमगढ़ जैसे जिलों में जहां गिनती के मरीज मिल रहे थे, वहां एकदम से फूट रहे कोरोना बम पर काबू पाना वास्तव में सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि शुरुआती दिक्कतों के बाद अब ज्यादातर जिलों में बाहर से आनेवाले लोगों को सावधानी से रखने के अलावा चिकित्सीय उपाय बढ़ने से आने वाले दिनों में स्थिति सुधरने के आसार हैं।
मई महीने की आखिरी तिथि तक १२२ ट्रेन सीधे सिर्फ जौनपुर पहुंची है। मुंबई महानगर में उत्तर भारतीयों की सबसे बड़ी प्रवासी आबादी जौनपुर की ही है। ट्रेनों के माध्यम से आए १४९१४२ प्रवासी श्रमिकों में ५७२३७ जौनपुर के हैं। अन्य जनपदों में जो ट्रेनें आई है, उनसे ३०९०८ जौनपुर के प्रवासी श्रमिक पहुंचे हैं। ट्रेनों से ८८१४५ और बहुत से प्रवासी ट्रकों के माध्यम से अन्य वाहनों से व अन्य साधनों से भी आए हैं। जौनपुर के डीएम दिनेश कुमार सिंह बताते हैं कि करीब ढाई लाख से अधिक प्रवासी अब तक जिले में आ चुके हैं। इनके सबको होम क्वॉरन्टीन की निगरानी गांव पंचायत स्तर पर बनी निगरानी समिति द्वारा किया जा रहा है और जनपद के खंड विकास अधिकारी उप जिलाधिकारी व थानाध्यक्षों द्वारा भी भ्रमण कर सुनिश्चित कराया जा रहा है।
वैसे सबसे बड़ी समस्या और चुनौती बाहर से आए लाखों श्रमिकों को गांव में रोजगार उपलब्ध कराने की भी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में प्रारंभ से ही होशियारी बरती है, जिसका लाभ अब मिल सकता है। गांव में स्वरोजगार से लेकर चार पैसे कमाने की सरकारी योजनाओं के अलावा कामगारों को सबसे बड़ी मदद मनरेगा से मिलने आ रही है।कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए चल  रहे लॉकडाउन के बीच श्रमिकों को रोजगार देने के लिए महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना यानि मनरेगा ने यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार को बड़ा सहारा दिया है। वास्तव में अब राज्य सरकार का फोकस इस बात पर है कि इतनी बड़ी संख्या में जो लोग गांव आ गए हैं या फिर आने के रास्ते में हैं, उनको कैसे रोजगार के जरिए गांव में रोके रखा जाए। योगी सरकार ने इसके लिए मनरेगा को आधार बनाया है। ग्राम्य विकास विभाग के आंकड़ों को मानें तो विगत ५ मई को राज्य में १४ लाख ७३ हजार ५९५ मनरेगा श्रमिक व्यक्तिगत और सामुदायिक कार्यों में लगे हुए थे। मनरेगा की यह गति उस समय है जब कि राज्य मेंकोरोना से अधिक प्रभावित २१ जिलों में काम नहीं के बराबर है। कुछ जिलों में मिली शिकायतों की छोड़ दें तो यूपी ने लॉकडाउन के दौरान महज दो महीने में गरीबों को २९.६६ लाख मीट्रिक टन राशन वितरित कर देश में किर्तिमान बनाने का दावा किया गया है।
कुछ अपवाद की घटनाओं को छोड़ दें तो इस आपदकाल में दुनिया के सबसे बड़े पुलिस बल यानि उत्तर प्रदेश पुलिस के बारे में उत्तर प्रदेश वासियों का खयाल काफी बदला है। वैसे अब, जब दफ्तर से लेकर बाजार तक खुल गए हैं और अगले हफ्ते से धार्मिक स्थल भी खुल जाएंगे तो पुलिस के सामने ज्यादा चुनौती होगी। उत्तर प्रदेश में कोरोना के खिलाफ जंग में अब तक पुलिस पूरी तरह से मुस्तैद दिखी है और रोजमर्रा की थकान और अमूमन तनाव भरी ड्यूटी के साथ ही अपनी भूमिका को बखूबी अंजाम दिया है। प्रदेश में महिला पुलिसकर्मियों ने कोरोना को मात देने के लिए घर के काम करने के बाद अपनी ड्यूटी पर समय से पहुंच रही हैं और कोरोना के खिलाफ लॉकडाउन में घर से निकालने वालों को भरपूर समझाने का प्रयास करने भी किया ताकि अवाम को इस घातक महामारी से बचाया जा सके। लॉकडाउन में जो लोग बिना किसी वजह के बाहर निकले, उनके खिलाफ भी पुलिस ने कार्रवाई की और वाहनों के भारी मात्रा में चालान काटे। लॉकडाउन में लोगों ने पुलिस की मदद मांगी तो मिली भी। यूपी पुलिस के जवानों ने ड्यूटी करने के साथ ही भूखे लोगों को खाना भी खिलाया। लखनऊ और नोएडा पुलिस कमिश्नरी हो या आजमगढ़ रेंज या फिर अलग अलग जिले, पुलिस की सक्रियता और व्यवहार काबिले-तारीफ देखा गया है।
लॉकडाउन का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की गई है। प्रदेश में कोरोना न फैले, इसके लिए यूपी पुलिस ने कड़ी मेहनत की है और शायद यही कारण है कि इस संकटकाल में पुलिस के प्रति आम लोगों का मित्र भाव निश्चित रूप से बढ़ा है।