" /> चूल्हा कर रहा है ‘रोटी’ का इंतजार : लॉक डाउन से ठंडे पड़े ‘रोटी’ व्यवसायियों के चूल्हे

चूल्हा कर रहा है ‘रोटी’ का इंतजार : लॉक डाउन से ठंडे पड़े ‘रोटी’ व्यवसायियों के चूल्हे

हजारों महिलाओं पर आया उदर निर्वाह पर संकट

कोरोना के चलते देश बहुत बड़े संकट से जूझ रहा है। देश की आर्थिक व्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ता दिखाई दे रहा है। कोरोना ने कई नौकरी, उद्योग धंधे को लील लेने का काम किया है। कोरोना के कोहराम को लेकर महारास्ट्र राज्य में विषम परिस्थिति होने के कारण कई छोटे-छोटे उद्योग ठप पड़े हैं। इसी क्रम में बीते तीन माह से नई मुंबई शहर में बचत गट के माध्यम से चलनेवाले चूल्हे के रोटी का व्यवसाय पूरी तरह बंद होने से बचत गट से जुड़ी हजारों महिलाओं के सामने संकट मंडरा रहा है।
बता दे कि नई मुंबई शहर के भीतर बड़ी संख्या में आगरी-कोली समाज के नागरिक रहते हैं। बेलापुर से दीघा तक कुल २९ गांवों में बचत गट द्वारा चूल्हे तथा गैस पर रोटी बनाकर होटलों में विवाह शादी के अवसर पर घरेलू पार्टियों में तथा किसी भी पर्व पर ऑर्डर के साथ रोटी, भाकरी देने का कार्य किया जाता है, जो कि बीते कुछ माह से पूर्ण रूप से बंद है। इस व्यवसाय से जुड़ी हजारों महिलाओं के उदर निर्वाह पर संकट मंडराने लगा है। गौरतलब हो कि रोटी के व्यवसाय में कई प्रकार की रोटियां बनाई जाती हैं। शहर में सबसे अधिक चावल के आटे की रोटी जो कि मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी जलाकर बनाई जाती है, जिसे भाकरी भी कहते हैं। इसके साथ ही गेहूं की रोटी, ज्वारी-बजड़ी की रोटी भी काफी जायकेदार बनती है। अधिक मुनाफा न लेते हुए बचत गट में तमाम महिलाएं रोटी बनाकर अपना एवं अपने परिवार के भरण-पोषण में सहारा बनने की भूमिका अदा करती हैं। वाशी के कोपरी गांव में ज्ञानाई महिला मंडल की अध्यक्षा सुनीता ठाकुर ने बताया कि नई मुंबई, रायगढ़, मुंबई, पालघर के समुद्री किनारे पर रहनेवाले आगरी-कोली समाज के लोगों का प्रिय भोजन चावल की रोटी यानी भाकरी मुख्य रूप से माना जाता है। एक भाकरी को ₹१५ में दिया जाता है। कोरोना के कारण इस समय यह व्यवसाय पूर्ण रूप से बंद है।