" /> छोटे पर्दे का रंगोत्सव

छोटे पर्दे का रंगोत्सव

होली का त्यौहार यानी रंगों का त्यौहार। रंग, गुलाल, मिठाई, ठंडई से जुड़ी कई बातें हैं होली के साथ। बिजी शेड्यूल के बावजूद क्या ज्यादा काम करनेवाले कलाकार होली मनाते हैं? कुछ ऐसे ही सवाल पूजा सामंत ने किए छोटे पर्दे के कलाकारों से और उन्होंने सबसे पहले पूछा, `कब है होली?’

विजयेंद्र कुमेरिया
मेरा मानना है होली यानी रंगों का त्यौहार। रंग और जिंदगी का गहरा रिश्ता है। जिंदगी में रंग ही नहीं होते तो कितनी बेरंग हो जाती जिंदगी। इसीलिए हमारे पुरखे कहते थे कि शगुन के लिए सही गुलाल लगाया करो। मेरी कोशिश होती है कि मैं हर वर्ष होली का त्यौहार जितना हो सके मनाऊं, उसे एन्जॉय करूं। २०१७ की बात है, वो होली मेरे लिए बहुत यादगार बनी थी। मैंने मेरे घर पर होली पार्टी का आयोजन किया था। उस होली को खास तरीके से मनाने के पीछे वजह थी मेरी बेटी का जन्म हुआ था। हम सभी की खुशियों में चार चांद लग गए थे। मेरा उन दिनों शो `उड़ान’ बहुत पॉपुलर हुआ था।
आस्था चौधरी 
होली से मेरा सीधा कनेक्शन है गुजिया से। मेरी मां दुनिया की बेहतरीन गुजिया बनाती है। इस पर मुझे कोई संदेह नहीं है। होली पर जब गुजिया खाना शुरू करती हूं तब कम से कम ५-६ गुजिया एक साथ खाए बिना मुझे कोई चैन नहीं मिलता। जो भी घर में आता है गुजिया, जलेबी और पेठा का स्वाद जरूर चखता है। एक मर्तबा मुझे किसी ने भांग पिलाई और दूसरे दिन मेरा सर चकरा रहा था। मैं अब भांग कभी नहीं लेती। जहाँ तक रंगो की बात है, मैं होली अपने बचपन की सहेलियों से खेलती हूं। हर वर्ष अपने परिवार के साथ होली खेलने का मजा ही कुछ और है। इको प्रâेंडली होली और गुलाल की होली पर मेरा विश्वास कायम है।
रिषिना कन्धहारी
होली के समय एक घटना को याद कर बहुत हंसी आती है। होली के दिनों में मैं अपने भाई के घर गई थी। ठंडई समझा वो तो भांग निकली। फिर क्या मैं २-३ घंटे हंसती ही जा रही थी। मैं फौजी बन गई और लेफ्ट -राइट करने लगी। होली रह गई बाजू में सभी लोग इस बात का इंतजार करने लगे कि मेरा भांग का नशा कब उतरेगा? मुझे भाभी जबरदस्ती कमरे में ले गई और सुलाया। जब मेरी नींद पूरी हुई और मैं नहायी, तब सभी ने मुझे मेरे कारनामे बताए। मैं खुद हैरान थी कि क्या यह पागलपन करनेवाली मैं ही थी या कोई और? भाई ने मेरा वीडियो बनाया था फौजी के रूप वाला जो उसने मुझे दिखाया। फिर मुझे यकीन हुआ।
रोहिताश्व गौर
आज अगर टीवी या रेडिओ पर बस कोई होली कह दे तो मुझे नागपुर याद आ जाता है। मैंने अपने जीवन का कुछ समय शिमला और एक लंबा समय नागपुर में बिताया है। लेकिन नागपुर वाली होली मैं भयंकर कहूंगा। नागपुर वासी होली के समय रंगो में वार्निश पेंट्स का इस्तेमाल कर देते हैं। क्या यह भयंकर नहीं है? कई बार सड़क पर चलनेवालों को भी रोककर वे वार्निश पेंट्स -व्हाइट -ग्रीन ब्लू कलर कोट्स लगा देते है। अभी आज से १० वर्ष पहले मेरे चेहरे पर किसी लड़के ने वार्निश पेंट चढ़ाया था। मुझे अपने चेहरे से वो वार्निश निकालने में १५ दिन लग गए। जब मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में था तब सभी भांग का आनंद ले रहे ले रहे थे उस समय मैंने भी भांग पी। यह अनुभव इतना अजीब था कि भांग पीने के बाद मैं पतंग उड़ाने लग गया जबकि आकाश में कोई पतंग नहीं थी। बस मैं हाथ में डोर लेकर मूवमेंट किये जा रहा था। सब लोग हंस-हंसकर लोट-पोट हो गए।
अनिरुद्ध दवे
होली खेलने का असली मजा तो स्कूल के दिनों में ही है। स्कूल और सोसायटी के पड़ोसी बच्चों के साथ एक-एक हफ्ता होली खेलना क्या होता है, यह कोई मुझ से पूछे। हम बच्चे एक-दूसरे पर गटर का पानी भी फेंकते थे लेकिन मजाल है किसी की जो किसी बच्चे या उसके माता -पिता ने बुरा माना हो। मैंने अपने पड़ोसी साथी को पानी में इतना डुबोया कि वो घबरा सा गया। मेरी मां से मैंने बहुत डांट खायी। मारा भी मां ने मुझे। आज वो बचपन की होली जवानी की होली पर भारी पड़ जाती है।