जनमत सर्वेक्षण में राजग को बढ़त

दुनिया के सबसे बड़े और विश्वसनीय लोकतंत्र हिंदुस्थान में दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का शंखनाद होने के साथ ही समाचार चैनलों में जनमत सर्वेक्षणों अर्थात ओपिनीयन पोल की बाढ़ सी आ गई है। सभी सर्वेक्षणों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्ववाली राष्ट्र्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनते दिख रही है। साफ है, इस गठबंधन को बहुमत मिलता है तो नरेंद्र मोदी ही फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे। दरअसल पुलवामा हमले और उसके बाद वायुसेना द्वारा बालाकोट में किए गए हवाई हमलों ने देश में प्रखर राष्ट्र्रवाद की बयार बहा दी है। इस हवा को रफ्तार देने का काम कांग्रेस समेत विपक्ष के तमाम नेताओं ने एयर स्ट्राइक पर शंका जताकर भी किया है। कांग्रेस व अन्य विपक्ष तो एयर स्ट्राइक के बाद इतना विचलित दिख रहा है कि कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में ऐसे मुद्दे शामिल कर लिए हैं, जो अलगाववादियों के हित साधते दिख रहे हैं। दूसरी तरफ मायावती ने एक चुनावी सभा में मुसलमानों से भाजपा को वोट नहीं देने की अपील करके यह जताने की कोशिश की है कि केवल मुस्लिम हित ही सर्वोच्च हैं। नतीजतन पहले दौर के आए सर्वेक्षणों ने राजग को स्पष्ट बहुमत में आते दिखाना शुरू कर दिया है। अलबत्ता इन सर्वेक्षणों की रिपोर्ट प्रसारित करते वक्त चैनलों के एंकर जिस तरह से देशप्रेम झलका रहे हैं, उससे साफ है कालांतर में राजग गठबंधन को फायदा होनेवाला है। यह फायदा इसलिए भी मिलेगा, क्योंकि जो विपक्ष मोदी को सत्ता से बाहर रखने के लिए एकजुट होने की कोशिश में था, उसकी एकजुटता देशव्यापी महागठबंधन की शक्ल नहीं ले पाई और न ही इस कथित गठबंधन या तीसरे मोर्चे का प्रधानमंत्री कौन होगा? यह तय हो पाया। साफ है, इस संशय का फायदा राजग को मिलेगा।
लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के ठीक पहले आए चार ओपिनियन पोल्स के औसतन नतीजे बताते हैं कि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन इस बार भी बहुमत हासिल कर सकता है। इस बार राष्ट्रवाद और राष्ट्र्रीय सुरक्षा की तुलना में खेती किसानी, बेरोजगारी, गरीबी और शिक्षा जैसे मुद्दे लगभग नदारद हो गए हैं। लिहाजा भाजपा की अगुवाई वाला गठबंधन सांसद की ५४३ सीटों में से २७३ सीटें जीत सकता है, जो सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से एक ज्यादा है। हालांकि पिछले चुनाव में इसी गठबंधन को ३३० से ज्यादा सीटें मिली थीं, जो ३ दशकों में मिला किसी दल को सबसे बड़ा जनादेश था।
सी वोटर ने सत्तारूढ़ गठबंधन को २६७, इंडिया टीवी-सीएनएक्स ने २७५, सीएसडीएस ने २६३-२८३ और टाइम्स नाऊ ने २७९ सीटें दी हैं। इन्हीं सर्वेक्षणों में क्रमश: कांग्रेस नेतृत्ववाले संप्रग गठबंधन को १४२, १४७, ११५-१३५, १४९ सीटें दी हैं। इसके कुछ दिन पहले आजतक-कार्वी इनसाइट्स ने जनता की जो नब्ज टटोली थी, उसके मुताबिक राजग को ६० फीसदी मत और २६४ सीटें मिलना बताया है। वहीं इस सर्वे ने संप्रग को १४१ सीटों पर सिमटा दिया है। एबीपी न्यूज-सी वोटर का सर्वे भी राजग को २६४ और संप्रग को १४१ सीटें दे रहा है। न्यूज नेशन प्रोजेक्षन का सर्वे राजग को २६८ से २७२ और संप्रग को १३२ से १३६ सीटें दे रहा है। अन्य दलों को इस सर्वे में १३७ से १४१ सीटें दी गई हैं। जी-२४ ने राजग को २६५, संप्रग को १६४ और अन्य को ११४ सीटों से उपकृत किया है। इन सर्वेक्षणों से लग रहा है कि मतदाता अब अप्रत्यक्ष रूप से सीधे प्रधानमंत्री के लिए मतदान करने की मानसिकता में आ गया है। एयर स्ट्राइक के बाद जनमत में कुछ ऐसा बदलाव दिख रहा है कि वह अब चुनावी घोषणा-पत्रों में किए वादे से कहीं ज्यादा राष्ट्र की रक्षा और राष्ट्र्रभक्ति को महत्व दे रहा है। गोया विकास पर आतंकवाद के विनाश का संकल्प भारी पड़ रहा है। इसी कारण कालाधन की वापसी, मंदिर निर्माण, धारा-३७०, नोटबंदी और जीएसटी जैसे प्रभावी मुद्दे भी गौण होकर रह गए हैं। राहुल गांधी ने जिस राफेल मुद्दे को हवा दी थी, वह भी अब बोफोर्स बनने की स्थिति में नहीं रह गया है।
हालांकि जनमत सर्वेक्षण मतदाता को गुमराह कर निष्पक्ष चुनाव में बाधा भी बनते हैं इसलिए इन सर्वेक्षणों पर रोक लगाने की मांग भी की जाती रही है। वैसे भी ये सर्वेक्षण वैज्ञानिक नहीं हैं, इनमें पारदर्शिता की कमी रहती है। ये किसी नियम से भी बंधे नहीं हैं। ज्यादातर सर्वे दलों या उनके सहयोगी उद्योगपतियों से धन लेकर कराए जाते हैं इसलिए ये चुनाव परिणामों पर खरे नहीं उतरते। इनका देशव्यापी उदाहरण २०१४ के आम चुनाव और बीते साल के अंत में हुए ५ विधानसभाओं के चुनाव परिणाम हैं। दिल्ली विधानसभा में हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी को ६७ सीटें जीतते किसी भी सर्वे ने नहीं दिखाया था, लेकिन मतदाताओं ने अरविंद केजरीवाल पर विश्वास किया और कांग्रेस व भाजपा समेत अन्य दलों का सूपड़ा साफ कर दिया था। फिर भी इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने चलाया जा रहा हैं। दरअसल, पेड न्यूज की तर्ज पर जनमत सर्वेक्षण भी ‘पेड ओपिनियन पोल’ की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं इसीलिए इनके परिणाम भरोसे के तकाजे पर खरे नहीं उतरते। सर्वे कराने वाली एजेंसियां भी स्वायत्त होने के साथ जवाबदेही के बंधन से मुक्त हैं। गोया, इन पर भरोसा किस बिना पर किया जाए?
इसीलिए चुनाव आयोग ने इस परिप्रेक्ष्य में २०१३ के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सभी राजनीतिक दलों को एक पत्र लिखकर, चुनाव सर्वेक्षणों पर राय मांगी थी। दलों ने जो जवाब दिए थे, उनमें मत भिन्नता पेश आई थी। बहुदलीय लोकतंत्र में एकमत की उम्मीद बेमानी है। जाहिर है, कांग्रेस ने सर्वेक्षण निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करनेवाले बताए थे। बसपा ने भी असहमति जताई थी। माकपा की राय थी कि निर्वाचन अधिसूचना जारी होने के बाद सर्वेक्षणों के प्रसारण और प्रकाशन पर प्रतिबंध जरूरी है। तृणमूल कांग्रेस ने आयोग के पैâसले का सम्मान करने की बात कही थी, जबकि भाजपा ने इन सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध लगाना संविधान के विरुद्ध माना था क्योंकि ज्यादातर चुनाव सर्वेक्षणों का रुख भाजपा के पक्ष में रहा है। सर्वेक्षणों में दर्ज मतदाता या व्यक्ति की राय, भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार क्षेत्र का ही मसला है। दलों की मतभिन्नता के कारण आयोग कोई निर्णय नहीं ले पाया, नतीजतन स्थिति यथावत बनी हुई है।
फिलहाल हमारे देश में चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण को अस्तित्व में आए एक दशक ही हुआ है। यह ‘सेफोलॉजी’ मसलन जनमत सर्वेक्षण विज्ञान के अंतर्गत आता है। हिंदुस्थान के गिने-चुने विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम के तहत सेफोलॉजी विषय को पढ़ाने की शुरुआत हुई है। जाहिर है, विषय और इसके विशेषज्ञ अभी परिपक्व नहीं हैं। जो सर्वेक्षण आते हैं, उन्हें एनजीओनुमा कंपनियां, प्रशिक्षु पत्रकारों से कराती हैं, जिनका अपना चुनावी सर्वे का कोई अनुभव या ज्ञान नहीं होता है। इन कंपनियों द्वारा तय किए गए चंद चुनावी क्षेत्रों में स्थानीय पत्रकारों और समाजसेवियों से मिलकर सर्वे की खानापूर्ति कर ली जाती है। सर्वेक्षणों पर शक की सुई इसलिए भी जा ठहरती है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में निर्वाचन-पूर्व सर्वेक्षणों की बाढ़ सी आई हुई है। इनमें तमाम कंपनियां ऐसी हैं, जो धन लेकर सर्वे करती हैं इसलिए धन-संपन्न राजनीतिक दल अपने अनुकूल सर्वे करा लेते हैं। ये सर्वे भी करोड़ों मतदाताओं की तुलना में कुछ हजार मतदाताओं के मन की राय जानकर पूरे कर लिए जाते हैं इसलिए इनकी प्रामाणिकता परिणाम के बाद संदिग्ध साबित होती रही है।
इनके पैरोकार सर्वेक्षणों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने जारी रखने की बात कहते हैं जबकि उन्हें सोचने की जरूरत है कि संविधान में दर्ज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी के मौलिक अधिकारों में इनके दुरुपयोग का भी उल्लेख है। चुनाव अब कोई भी हो ज्यादातर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दल और उम्मीदवारों से पेडन्यूज की अपेक्षा रखता है। दरअसल संविधान की मूल भावना, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की ओट में ही मीडिया का उम्मीद से ज्यादा व्यावसायीकरण हुआ है। मीडिया में मीडिया से इतर व्यवसायवाली कंपनियों ने बड़ी पूंजी लगाकर प्रवेश किया और देखते-देखते मीडिया के अनेक निष्पक्ष स्वायत्त घरानों, मंचों, पत्रकार समितियों व संस्थानों पर कब्जा कर लिया। नतीजतन मीडिया पर स्वामित्व मुट्ठी भर लोगों का हो गया। इसी का परिणाम है कि भूमाफिया, खनिज माफिया, शराब माफिया और चिटफंड कंपनियों का हिंदुस्थानी मीडिया पर एकाधिकार हो गया है। केंद्र व राज्य सरकारें निर्वाचन प्रक्रिया की घोषणा से पूर्व तक उपलब्धियों के बड़े-बड़े विज्ञापन देकर भी मतदाता को लुभाने की कोशिश करती हैं। कुछ साल पहले बिहार के एक मामले से यह भी साबित हुआ था कि बाजार की शक्तियों ने मीडिया पर अपना प्रभुत्व कायम कर उपभोक्ता वर्ग को ललचाने का किस हद तक काम किया है। गोया, सरकारी कोश और आवारा पूंजी के स्वच्छंद प्रवाह ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम प्रेस की आजादी को बाधित किया है। इसलिए पेडन्यूज पर जिस तरह से अंकुश लगाने के उपाय पिछले चुनावों में हुए हैं, उसी तर्ज पर चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है, जिससे ओपिनियन पोल पूरी तरह ‘पेड ओपिनियन पोल’ की गिरफ्त में न आने पाएं?