जन्नत और दोजख

अब्दुल उमर कुरैशी ने संकरे कमरे में प्रवेश किया और सामने बैठे तीन हट्टे-कट्ठे लोगों को सलाम करके संकुचाता हुआ सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया। तीनों ने गर्मजोशी से उसका जवाब दिया लेकिन उसके बाद वातावरण में ब्लेड की धार जैसा पैना सन्नाटा पसर गया। थोड़ी देर तक उनकी तेज एक्स-रे जैसी निगाहें अब्दुल पर जमी रहीं फिर एक ने तीखी आवाज में पूछा, `तो तुम तैयार हो?’ अब्दुल ने थूक गटका और सहमति में सर हिला दिया।
अब्दुल मीनारा मस्जिद के पास फलों की रेहड़ी लगाता था। वहां उसकी मुलाकात मुहम्मद सुलेमान से हुई, जो सामने बैठे तीनों में से एक था। बाद में उसने इन दोनों से मिलवाया। कई मुलाकातों के बाद वे अब्दुल को यह समझाने में कामयाब हो गए थे कि कुछ लोगों की वजह से इस्लाम खतरे में है और अपने मजहब की रक्षा के लिए कुछ लोगों की कुर्बानी निहायत जरुरी है। अब्दुल अब उनके कहे अनुसार तीन दिन बाद राष्ट्र के एक बड़े नेता की सभा में मानव बम बनकर विस्फोट करके खुद के साथ अनेक लोगों की जान लेने को तैयार हो चुका था, जिसके बदले में उसे एक लाख रुपए पेशगी मिल चुके थे और उसके बाद परिवार की देखभाल और विपुल धनराशि का आश्वासन भी।
आज रात अब्दुल बिल्कुल न सो सका। रात भर जागकर कभी बीवी का चेहरा देखता तो कभी बच्चों का। बाहर सोए अब्बा की खांसी की आवाज भी उसे परेशान करती रही। इन सभी को क्या पता था कि इन्हीं के भविष्य की खातिर अब्दुल कितनी बड़ी कुर्बानी देने जा रहा था। वैसे भी कुर्बानी के बाद अब्दुल को जन्नत के मजे मिलने ही थे। बड़ी सी लाल दाढ़ीवाले विद्वान से दिखनेवाले जिस आदमी ने अब्दुल को इस राह पर धकेला था, उसने इसका पूर्ण आश्वासन भी दिया था और जन्नत का खूब खाका खींच कर बताया था।
नियत समय पर अब्दुल सभास्थल पर पहुंच गया। उसके शरीर पर भारी मात्रा में विस्फोटक बंधा हुआ था। उसका दिमाग एकदम सुन्न हो चुका था। यंत्रवत उसने सारे काम किए। नेता के पास पहुंचकर उन्हें प्रणाम करने की मुद्रा बनाई और कमर पर लगा बटन दबा दिया। इस समय उसके दिमाग में सिर्फ जन्नत के मजे छाए हुए थे।
एक भयानक विस्फोट ने अब्दुल और उसके आसपास के कई लोगों के परखच्चे उड़ा दिए। भयानक अफरा-तफरी मच गई। लहू-लुहान शव भूमि पर बिखरे थे और घायल तड़प रहे थे। दोजख का नजारा था अगर अब्दुल को पता होता कि उसके तीनों बच्चे स्कूल से छूटकर घर जाते हुए यूं ही इस जलसे में आ गए हैं तो वो कभी मौत का यह खेल नहीं खेल पाता। उसे यह भी पता नहीं चल पाया कि उसकी बीवी अपने शौहर और तीनों बच्चों को इस हादसे में गंवा चुकने के बाद ता-जिंदगी किस दोजख में रहेगी! उसके बूढ़े और लगभग अंधे बाप को पुलिस की किन-किन यातनाओं का सामना करना होगा। वो तो अपनी जन्नत की यात्रा पर निकल चुका था।