जब-जब करि धरम की हानि! हारे कपटी, अकर्मठ-अज्ञानी!!

आखिरकार कर्नाटक के चुनावी नतीजे आ गए। भारतीय जनता पार्टी भले ही सबसे बड़े दल के रूप में खुद को स्थापित करने का जश्न मनाए पर हकीकत में जनादेश उसके पक्ष में नहीं है। जनता ने किसी को भी स्पष्ट जनादेश नहीं दिया है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो कर्नाटक में उसकी वापसी हो गई होती, यदि उसने ‘सनातन संस्कृति से कपट’ की नीति त्याग दी होती। यानी हिंदू धर्म के बार-बार बंटवारे की कलुषित योजना उसे इस बार भी भारी पड़ी है। कर्नाटक चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने लिंगायत कार्ड खेला था। लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का मास्टर स्ट्रोक। ठीक उसी तरह जैसा २०१४ के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार ने खेला था और उससे पहले के दौर में उस दौर के सत्ताधीशों ने। जिस तरह २०१४ में मनमोहन सिंह को जैन कार्ड का नुकसान उठाना पड़ा, उसी तरह इस बार सिद्धरमैया को भी लिंगायत कार्ड ने कुर्सी से बेदखल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कांग्रेस के लिए एक सबक है। उसे यह याद कर लेना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस के मामले में बार-बार यह साबित हुआ है कि ‘जब-जब करि धरम की हानि, हारे कपटी, अकर्मठ-अज्ञानी!’ अर्थात कांग्रेस ने जब-जब हिंदुओं को विभाजित किया है, उसे नुकसान ही हुआ है।
कर्नाटक में लिंगायतों की आबादी १८ प्रतिशत तक बताई जाती है। समाज का एक तबका कुछ प्रशासनिक लाभ लेने के लिए लिंगायतों को हिंदुओं से अलग करने की जुगत में हमेशा जुटा रहता है। कांग्रेस को लगा कि इसी जुगत से उसकी बात बन सकती है। हालांकि चुनाव के पहले ही तय हो गया था कि कांग्रेस को इस चुनावी स्ट्रोक का कोई फायदा नहीं मिलने वाला है। इसका फायदा मिलेगा तो भाजपा को। वैसे कर्नाटक के नतीजे भाजपा की उपलब्धि नहीं हैं, बल्कि हिंदुओं का कांग्रेस के प्रति रोष है। यदि कांग्रेस ने धर्म विभाजन का लिंगायत कार्ड न खेला होता तो उसकी स्थिति काफी मजबूत होती और भाजपा की अपेक्षाकृत कमजोर। कांग्रेस ने बैठे-बिठाए भाजपा को लिंगायत कार्ड का लाभ दिला दिया। खुद लिंगायतों ने कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया। लिंगायतों के एक बड़े वर्ग को हिंदू धर्म से कभी कोई शिकायत नहीं रही। कांग्रेस सरकार के इस कार्ड से एक और लिंगायतों के बड़े वर्ग ने नाराजगी में कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया, तो दूसरी और हिंदू बंटवारे से आहत हिंदुओं ने कांग्रेस का बहिष्कार कर दिया। खैर, लिंगायतों का मामला हो या फिर जैनियों का, वे आज भी खुद को हिंदू ही मानते हैं और मानते रहेंगे। कांग्रेस यह गांठ बांध ले।