" /> जरायम की खेती सियासत की उपज!

जरायम की खेती सियासत की उपज!

गुजरे कुछ दशकों का अतीत देखें तो उत्तर प्रदेश के बारे में यह धारणा पुष्ट करने के लिए पर्याप्त से अधिक उदाहरण हैं कि यहां जरायम की फसल बोकर सियासत की उपज काटी जाती है। एक जमाने में विशुद्ध राजनीति की उर्वर जमीन रहे हिंदी हृदय प्रदेश में ऐसे अनगिनत पूर्व और मौजूदा माननीयों की फेहरिस्त अब आम है जिनके हाथ खून से सने रहे हैं। सिर्फ विधानसभा और संसद ही नहीं, ऐसे कई महानुभावों ने माननीय मंत्री जी के पद की शोभा बढ़ाई है ।
वास्तव में यूपी की सियासत में कुछ दशकों का ऐसा दौर रहा जब येनकेन प्रकारेण चुनाव जीतने के लिए और सत्ता तक पहुंचने के लिए दुर्दांत अपराधी और बाहुबली राजनीति करने वालों की सख्त जरूरत हो गए थे। नेता उनकी मदद से चुनाव जीतते थे और वे बदले में नेता जी का संरक्षण पाते था। धनबल और बाहुबल से तृप्त होने के बाद सीधे सियासत में प्रवेश की अतृप्त इच्छा को पूरा करने की ललक धीरे-धीरे प्रवृत्ति बन गई । विकास दुबे वस्तुतः इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है जिसका साथ लेना तमाम इलाकाई सांसदों और विधायकों की मजबूरी बन गई । राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में शिवली थाने में घुसकर दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री का कत्ल करने वाले जघन्य अपराधी को सात साल बाद ही कानपुर पुलिस ने निष्क्रिय बताकर उसकी हिस्ट्रीशीट फाड़ दी। सरकार मायावती की थी और तत्कालीन एसएसपी आनंद स्वरूप ने पुलिस लाइन में सार्वजनिक रूप से यह नेक काम किया था, मतलब सरकार किसी की भी हो, सांसद और विधायक किसी भी दल के हों, विकास दुबे के बगैर उनका काम नहीं चलता था। रोज किसी न किसी विधायक, सांसद या महत्वपूर्ण व्यक्ति के साथ विकास की तस्वीरें साया हो रही हैं और माननीय सफाई दे रहे हैं कि सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग साथ में फोटो खिंचा लेते हैं। इन तस्वीरों वाले नेताजी लोग किसी एक पार्टी के नहीं, बहुदलीय हैं। यही हाल स्थानीय पुलिस का भी रहा है। विकास दुबे के स्थानीय पुलिस पर आतंक का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि उसने ३ जुलाई को चौबेपुर थाने के दरोगा को सीधे जान से मारने की धमकी तो दी ही, यह भी कहा था कि वह इतने पुलिस वालों को मारेगा कि गिनती नहीं हो पाएगी। दरोगा शर्मा ने एसओ विनय तिवारी को इसकी जानकारी भी दी थी पर लेकिन उसने सन्नाटा खींच लिया और यह बात उच्चाधिकारियों को बताने की जरूरत नहीं समझी ।
इलाकाई पुलिस का हाल यह था कि वह विकास दुबे का मूड देखकर उससे बात करती थी। दुबे का मूड अच्छा होता तो वह राह चलते पुलिस वालों से हालचाल ले लिया करता था लेकिन मूड खराब हो तो वह सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक वह किसी को भी गाली दे देता था। चौबेपुर में शायद ही ऐसा कोई पुलिसकर्मी बचा हो जिसे दुबे ने धमकी न दी हो। उसके बावजूद कोई कुछ कहने को नहीं तैयार था। घटना से कुछ दिन पूर्व विकास के गुर्गों ने सिपाही को तमाचा मार दिया था। वह गांव की तरफ चला आया था महज इसी बात से गुर्गे नाराज हो गए थे।
फिलहाल इस सम्पूर्ण प्रकरण में पुलिस कनेक्शन की जांच तेज हो गई है। आईजी रेंज लखनऊ लक्ष्मी सिंह अपराधियों और पुलिस कनेक्शन की जांच कर रही हैं। शहीद पुलिस उपाधीक्षक देवेंद्र मिश्र के उस वायरल पत्र के गायब होने के मामले की भी जांच आईजी कर रही हैं। विगत मार्च माह में यह पत्र पुलिस उपाधीक्षक देवेंद्र मिश्र ने तत्कालीन एसएसपी अनंत देव को लिखा था जिसमे चौबेपुर के एसओ विनय तिवारी को साफ साफ विकास दुबे का मददगार बताते हुए कहा था कि अगर कार्रवाई नही की गई तो शिवली थाने में घुसकर राज्यमंत्री की हत्या करने वाला दुर्दांत अपराधी किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है ।
आखिरकार हुआ वही लेकिन सिस्टम सोता रहा । वास्तव में जांच इस बात की भी होनी चाहिए कि जिस विकास दुबे से देवेंद्र मिश्र ने इतना बड़ा खतरा बताते हुए अपराधी और उससे मिलीभगत करने वाले अपने मातहत पुलिस अफसर के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत बताई थी, उसकी दबिश के पहले वरिष्ठ अफसरों ने तैयारी का क्या आकलन किया था? जून माह के पहले हफ्ते में ही डीजीपी के निर्देश जारी हुए थे कि किसी भी ख़तरनाक अपराधी पर दबिश के पहले तैयारियां इतनी मुकम्मल होनी चाहिए जैसी दंगारोधी ऑपरेशन में होती है। बड़ा सवाल यहां उठता है कि क्या एसएसपी ने दबिश देने वाली टीम की तैयारियां जानी थीं ? चर्चा तो इस बात की भी है कि उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी ही नहीं थी। अभी विकास दुबे, जय बाजपेई और पूर्व एसएसपी अनंत देव, जो अभी एसटीएफ के डीआईजी हैं, के कनेक्शन की भी जांच हो रही है।
दरअसल कानपुर में सिर्फ चौबेपुर ही नहीं पूरा शहर, और शहर के बड़े पान मसाला कारोबारी, प्रॉपर्टी डीलर और बिल्डर, माफिया सरगना विकास दुबे के आगे भेड़-बकरी की तरह सरेंडर थे। थानेदार, तहसीलदार, जेई, आबकारी इंस्पेक्टर ….फील्ड के ये अहम मुलाजिम, हर सरकारी ठेके-पट्टे में दुबे के साझेदार थे। कम शब्दों में, दुबे के आतंक को आप यूं समझिये कि २००१ में जब उसने भाजपा नेता संतोष शुक्ला को कानपुर देहात के शिवली थाने में गोलियों से भून दिया तो इस खौफनाक वारदात के २५ पुलिस वाले चश्मदीद गवाह बने। लेकिन दुबे की दहशत का आलम ये था कि सभी पुलिस वाले अदालत में सच बोलने से मुकर गए और सरगना इस जघन्य हत्याकांड में बरी हो गया। बरी होते ही दुबे ने राजनीति में पैर बढ़ाए और विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर हरिकृष्ण श्रीवास्तव (अब दिवंगत) ने उसे बिना शर्म गोद ले लिया।
दुबे के कुछ और प्रभावशाली नेता मित्रों से भी नरमी बरती गई है। बहरहाल, पुलिस से एके ५६ राइफल जैसे हथियार छीनकर फरार हुए करीब सवा सौ घंटे बीत गए हैं। अभी तक उसका कोई निशान, कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा है। अलबत्ता जांच एजेंसियों के बीच खुद आपस में मतभेद है। एक दूसरे की गर्दन नापने-बचाने की कोशिशें हो रही है। बेशक, विकास दुबे दुर्दांत है, लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला से बड़ा दुर्दांत अपराधी उत्तर प्रदेश में कोई नहीं हुआ। दर्जनों हत्याओं के बाद जब श्रीप्रकाश ने लखनऊ के जनपथ मार्किट में एसपी के पेशकार सब इंस्पेक्टर आरके सिंह को सरेआम मारा, तब अपने साथी का बदला लेने के लिए तीन पुलिस अफसर तत्कालीन एसएसपी अरुण कुमार, एसपी सत्येंद्र वीर और एडिशनल एसपी राजेश पांडेय सिर पर कफन बांधकर मैदान में उतरे। उनके दिन-रात के इस अभियान को यूपी पुलिस के इतिहास में दुर्दांत अपराधी के पीछा करने का सबसे जोखिम भरा ऑपरेशन बताया गया है जिसमे कई मौकों पर कई बार गोलियां चली। आखिरकार इस तिकड़ी ने शुक्ला को गोलियों से छलनी किया और उसके गिरोह का नामोनिशां मिटा दिया। यह वही श्रीप्रकाश शुक्ला था जिससे तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह तक को खतरा बताया जाने लगा था । विपक्ष योगी राज में यूपी की कानून व्यवस्था की स्थिति को भयावह बता रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि इधर तीन सालों में अपराधियों के खिलाफ पुलिस की छवि आक्रामक रही है और मुठभेड़ों में तमाम अपराधी मारे गए हैं लेकिन इस घटना ने बाकी बातों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। ऐसी सूरत में जनता को एक संदेश देने के लिए विकास दुबे और उसके पूरे गैंग को जिन्दा या मुर्दा पकड़ना फिलहाल योगी सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन कई भ्रष्ट पुलिसकर्मी, जो दुबे और वाजपेयी जैसे उसके गुर्गों के साथ सेल्फी खिंचा रहे थे, इस अभियान को कैसे सफल करेंगे ? जो पुलिस छापे से पहले दुबे को फोन करके मुखबिरी दे रही थी, उससे जनता क्या उम्मीद करे? पुलिस अफसरों की अलग अलग लॉबी और उनके बीच टकराव के चलते क्या इतनी बड़ी चुनौती से मुख्यमंत्री निपट सकते हैं? जमीनी हकीकत से रूबरू होने की जरूरत है।