जहरीली गैस का ‘ज्वालामुखी’

तारापुर औद्योगिक क्षेत्र के एक कारखाने में हुए गैस रिसाव ने तीन लोगों की जान ले ली। रविवार के दिन यह दुर्घटना घटी। हर बार की तरह इस दुर्घटना की जांच शुरू है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के बिना सम्मति-पत्र के इस कारखाने में उत्पादन कार्य शुरू था, ऐसा प्रथम दृष्टया दिखाई दे रहा है। जांच के दौरान हो सकता है कई दोष और कमियां सामने आएं लेकिन तारापुर ही नहीं बल्कि राज्य सहित देशभर के रासायनिक उद्योगवाले औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग यही तस्वीर दिखाई देती है। तारापुर औद्योगिक क्षेत्र स्थित ‘स्क्वेअर केमिकल्स’ नामक कारखाने में हुई दुर्घटना सल्फर डाय ऑक्साइड और हाइड्रोजन क्लोराइड नामक जहरीली गैस के कारण हुई। यह दुर्घटना ‘वन क्लोरो फोर ब्रोमो ब्यूटेन’ का उत्पादन करते समय हुई। हालांकि अब कहा जा रहा है कि इस उत्पादन के लिए आवश्यक सम्मति-पत्र नहीं था। इसका मतलब यह हुआ कि नियमों को ताक पर रखकर यह कार्य किया जा रहा था। रिएक्टर में तैयार उत्पादन जिस गल्वनाइज ड्रम में पाइप द्वारा छोड़ा जा रहा था उसमें पहले से ही कोई रसायन रहा होगा और उसके संपर्क में आने से रिएक्शन हुआ होगा और वह ड्रम फूट गया होगा। उससे निकली जहरीली गैस के संपर्क में आने से तीनों की मृत्यु हुई होगी, ऐसी आशंका जताई जा रही है। भोपाल गैस कांड में क्या हुआ था? जमीन के नीचे ठंडी टंकियों की साफ-सफाई के दौरान सावधानी न बरतने के कारण उसमें बचा हुआ पानी ही अत्यंत जहरीली गैस का कारण बना था। तारापुर की दुर्घटना में भी लापरवाही उसी प्रकार की है। इस औद्योगिक बस्ती में ३०० से ज्यादा कारखानों में रासायनिक उत्पादन किए जाते हैं। यहां ‘जॉब वर्क’ के रूप में काम किया जाता है लेकिन सुरक्षा के उपाय और नियमों का पालन नहीं किया जाता। उसी के कारण दुर्घटनाएं होती हैं और वहां के कर्मचारियों की जान चली जाती है। तारापुर ही नहीं बल्कि डोंबिवली और नई मुंबई के तलोजा परिसर के रासायनिक कारखानों का भी यही हाल है। गत वर्ष पनवेल तालुका के पोसरी स्थित ‘एचओसी’ कंपनी में गैस रिसाव हुआ, जिसमें ४८ बंदर, कई कबूतर और अन्य कई पक्षी मारे गए। नजदीकी गांववालों पर भी इसका असर पड़ा था। उसी महीने में तारापुर के ‘बजाज हेल्थ केयर’ नामक कंपनी में ३० कर्मचारी गैस रिसाव का शिकार हुए थे। सौभाग्य से उस दुर्घटना में किसी की जान नहीं गई थी। कल्याण स्थित सेंचुरी रेयॉन कंपनी में भी जहरीली गैस के रिसाव के कारण गत वर्ष के फरवरी महीने में एक कर्मचारी की मौत हो गई थी। उल्हासनगर भी वायु प्रदूषण और दुर्घटनाओं से अछूता नहीं है। डोंबिवली औद्योगिक क्षेत्र तो मानो ‘रासायनिक ज्वालामुखी’ के मुहाने पर बैठा हुआ है। जहरीली गैस दुर्घटना, रासायनिक कारखानों में विस्फोट और वहां पर आनेवाली ‘हरी बरसात’ सहित जल-वायु प्रदूषण की अति के कारण डोंबिवली की यात्रा भोपाल की दिशा में शुरू है, ऐसा अक्सर कहा जाता है। केवल इन्हीं कारखानों पर गैस रिसाव की तलवार नहीं लटक रही। उनके कारण वायु और जल प्रदूषण होता है जिससे कुएं, अपशिष्ट जल और भूगर्भ भी ‘गैस चैंबर’ बन चुका है। गत वर्ष कल्याण में कुआं साफ करने उतरे पांच लोगों की जहरीली गैस के कारण मौत हो गई थी। हाल ही में ‘मेन होल’ की सफाई के लिए उतरे सफाई कर्मचारियों की जान इसी कारण से गई है। १९८४ में भीषण भोपाल गैस कांड हुआ। उसमें हजारों जानें गई थीं। जो लाखों लोग बचे उन्हें जीवनभर मरण यातना भोगनी पड़ी। तीन साढ़े तीन दशक बीतने के बावजूद हमने उस घटना से कोई सबक नहीं लिया और न ही औद्योगिक सुरक्षा और नियमों का पालन किया। इसीलिए तारापुर जैसे गैस रिसाव की घटनाएं हो रही हैं। कई लोगों की जान जा रही है। आकाश से भूगर्भ तक सबकुछ विषैला होता जा रहा है। औद्योगिक विकास होना चाहिए। रासायानिक उद्योग भी आज की आवश्यकता है लेकिन उसी समय हमें औद्योगिक सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन भी करना होगा। हालांकि ऐसा होता नहीं है। इसीलिए हमारे देश के रासायनिक कारखाने मतलब जहरीली गैस के ‘ज्वालामुखी’ बन गए हैं। कब कौन सा ज्वालामुखी फूटेगा कहा नहीं जा सकता। रविवार को तारापुर में ऐसा ही एक ज्वालामुखी फूटा और उसने तीन लोगों की जान ले ली। इसे विकास कहा जाए या गैस रिसाव का ‘भोपाल से तारापुर’ की जानलेवा यात्रा कहा जाए?