जाग मछिंदर गोरख आया!

माना जाता है कि जितने भी देवी-देवताओं के साबर मंत्र है उन सभी के जन्मदाता श्री गोरखनाथ ही हैं। नाथ संप्रदाय के लोग जब आपस में मिलते हैं तो एक दूसरे से मिलते वक्त कहते हैं- आदेश और नमो नारायण। नवनाथ की परंपरा की शुरुआत गुरु गोरखनाथ के कारण ही शुरू हुई थी। शंकराचार्य के बाद गुरु गोरखनाथ को हिंदुस्थान का सबसे बड़ा संत माना जाता है।
गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं – चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव ( जालंधर या जालिंदरनाथ) आदि। १३वीं सदी में इन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे। कुछ लोग नौ नाथ का क्रम ये बताते हैं: मत्स्येन्द्र, गोरखनाथ, गहिनीनाथ, जालंधर, कृष्णपाद, भर्तृहरि नाथ, रेवणनाथ, नागनाथ और चर्पट नाथ।
।।मच्छिंद्र गोरक्ष जालीन्दराच्छ।। कनीफ श्री चर्पट नागनाथ:।।
श्री भर्तरी रेवण गैनिनामान।। नमामि सर्वात नवनाथ सिद्धान।।
नाथ शब्द का अर्थ होता है स्वामी। भगवान शंकर को आदिनाथ और दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है। इन्हीं से आगे चलकर नौ नाथ और ८४ नाथ सिद्धों की परंपरा शुरू हुई। नौ नाथों की परंपरा से ८४ नाथ हुए। नागा बाबा, नाथ बाबा और सभी कमंडल, चिमटा धारण किए हुए जटाधारी बाबा शैव और शाक्त संप्रदाय के अनुयायी हैं, लेकिन गुरु दत्तात्रेय के काल में वैष्णव, शैव और शाक्त संप्रदाओं का समन्वय किया गया था। सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। कहते हैं एक बार ईश्वरीय आदेशानुसार गोरखनाथ के गुरु मछिंदरनाथ ने लीला रची और एक महिला प्रदेश की रानी के मोह में पड़ गए और उसके साथ ही रहने लगे। तब गोरखनाथ अपना शिष्यधर्म निभाते हुए वहां पहुंचे और बोले `जाग मछिंदर गोरख आया!’ यह सुनते ही मछिंदर की तंद्रा और मोह समाप्त हो गया। मछिंदर अपने शिष्य गोरख के साथ लौट आए।