जानवरों के घरों पर मनुष्यों का कब्जा

जैसे-जैसे मानव अपने इस्तेमाल के लिए जंगलों पर कब्जा करता जा रहा है, वैसे-वैसे जानवरों को कम जगह में रहकर अपना जीवनयापन करना पड़ रहा है। इससे हो रही जगह की कमी के चलते जानवरों की संख्या कम हो रही है। एक विदेशी रिपोर्ट के आधार पर इस दशक में कुल औसतन २५ प्रतिशत जानवरों की संख्या कम हो जाएगी।
बता दें कि जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म होती जा रही है, वैसे-वैसे मानव अपने उपयोग के लिए जानवरों के आवासों पर कब्जा करता जा रहा है। जिसके कारण विशेष निवास की आवश्यकतावाले बड़े, कम फुर्तीले जानवरों की संख्या में कमी आ रही है। इस सप्ताह नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि मानव अतिक्रमण से बचने में सक्षम सबसे छोटे जीवों सहित बड़े स्तनपायी और पक्षी सबसे अधिक पीड़ित होंगे। जिसमें गैंडा, हिप्पोस, गोरिल्ला, जिराफ और बड़े पक्षियों में जैसे ईगल, कंडोर्स और गिद्धों जैसे बड़े प्राणियों का समावेश है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि विलुप्त होने का पैटर्न अगली सदी में स्तनधारियों के औसतन शरीर द्रव्यमान में २५ प्रतिशत की कमी होगी। अब तक पक्षियों और स्तनधारियों के लिए सबसे बड़ा खतरा मानव जाति है-ग्रह पर हमारे प्रभाव, जैसे वनों की कटाई, शिकार, गहन खेती, शहरीकरण और ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के कारण नष्ट हो रहे हैं। एक रिपोर्ट के आधार पर पिछले बर्फ युग के बाद से १,३०,००० वर्षों में जानवर कुल १४ प्रतिशत सिकुड़ गए हैं। अगले १०० वर्षों में पच्चीस प्रतिशत जानवरों का कम होना तय है।