जिंदगी का आखिरी किनारा

सोचता हूं मैं कभी-कभी
दुनिया में क्यों भगवान ने इंसान बनाए हैं
क्यों तकदीर, भाग्य, धर्म, पाप-पुण्य के मेले सजाए हैं
जीना तो है हर किसी को मरने के लिए
फिर क्यों हर वक्त खयालों में तरह-तरह के ख्वाब सजाए हैं
अपनी जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
इंसान को न जाने क्या-क्या करना पड़ता है?
इंसाफ के तराजू में हमेशा पापों को तौलना पड़ता है
इस दुनिया में सवाल तो बस दो वक्त की रोटी का है
वह बड़ी आसानी से पूरा हो सकता है
पर आराम की जिंदगी पाने के चक्कर में
इंसान अपने हर चैन-ओ-अमन खो देता है
रहता है परेशान हर दम
और-और के चक्कर में खुद को
आंसुओं के सागर में डुबो देता है
मौत से हरदम घबराता है
पर ये नहीं समझ पाता कि जिंदगी का आखिरी वही किनारा है
इस जग में नहीं कुछ भी हमारा है
-विजय कुमार अग्रवाल, वसई