" /> झांकी… गुमनाम कोरोना योद्धा

झांकी… गुमनाम कोरोना योद्धा

कोरोना के चलते अपने पिता को खो चुके ५३ साल के एक बेटे की न तो कोई तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है न ही उसके गले में कोरोना योद्धा का कोई अ अवॉर्ड लटक रहा है। लेकिन अपने पिता के डॉक्टर सहित वह अब तक २५ लोगों को कोरोना की दवा देकर उनकी जान बचा चुका है। यह स्तंभ लिखे जाने तक मुंबई के जाने-माने एक पुलमोनोलॉजिस्ट डॉक्टर २०० से ज्यादा कोरोना के मरीजों का इलाज करते-करते खुद कोरोना के चपेट में गए थे। पिछले हफ्ते ५ दिनों तक आईसीयू में भर्ती रहे। तभी एक ऐसे व्यक्ति ने उन्हें रेमडेसिवीर दवा लाकर दी, जिसके पिता की पिछले दिनों कोरोना से मौत हो गई थी। जिनका इलाज यही डॉक्टर कर रहे थे। इस व्यक्ति ने अपने पिता को भी यह दवा दी थी लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। एक अंग्रेजी अखबार की खबर के अनुसार डॉक्टर ने उस व्यक्ति के पिता को १२ दिनों तक आईसीयू में रखा था लेकिन उन्हें रेमडेसिवीर का डोज देने में देर होने से उनकी मौत हो गई। अब तक इस व्यक्ति ने इस दवा से २५ लोगों की जान बचाई है। इसके लिए वे करीब ५ लाख रुपए खर्च कर चुके हैं। डॉक्टर की जान बचाने वाला यह बेटा अपना नाम गोपनीय ही रखना चाहता है। क्योंकि इससे लोगों को पता चल जाएगा कि वह दवा मंगाते कहां से हैं। उनके अनुसार यह दवा बांग्लादेश में उपलब्ध है। वहां से इनके दोस्त इस दवा को कोरियर सर्विस के जरिए कोलकाता भेजते हैं। फिर इसे मुंबई भेजा जाता है। बांग्लादेश में इस दवा की एक शीशी की कीमत ६५ डॉलर है। वे और लोगों की मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि उनके पिता की जान नहीं बच सकी लेकिन वे दूसरों की मदद करना चाहते हैं। यह गुमनाम कोरोना योद्धा प्रणम्य है। अमेरिका, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में संक्रमण के गंभीर मरीजों के इलाज में रेमडेसिवीर के इस्‍तेमाल की मंजूरी है। साल के अंत तक २ करोड़ से ज्‍यादा कोरोना मरीजों को रेमडेसिवीर उपलब्‍ध करा दी जाएगी। रेमडेसिवीर का परीक्षण अमेरिका, यूरोप और एशिया के ६० केंद्रों में १०६३ मरीजों पर किया गया था। परीक्षण में दवा ने बेहतर रिकवरी में मदद की। रेमडेसिवीर दिए जाने वाले मरीजों में मृत्यु दर ७.१ फीसदी रही।
धीरे से सरका दिया!
गलवान में वीरगति पाने वाले जवानों की चितायें अभी ठंडी भी नहीं हुई हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने उनके बलिदान के राजनीतिक दोहन की शुरुआत कर दी है। इसलिए सप्ताह के पहले दिन सुशांत सिंह को श्रद्धांजलि देने के बहाने पटना पहुंचे दिल्ली के पूर्व भाजपा अध्यक्ष और सांसद मनोज तिवारी सुशांत सिंह के घर से सीधे बीहटा पहुंचे जहां उन्होंने लद्दाख के गलवान घाटी में शहीद हुए सुनील कुमार के परिजनों से मुलाकात की। भीतर खाने की खबर यह है कि दिल्ली में पिटे अपने इस मोहरे को पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव में भी अजमाना चाहती है। राजनीति में आने से पहले भोजपुरी फिल्म जगत के बड़े स्टार मनोज तिवारी ने भोजपुरी गानों के साथ-साथ कई सुपरहिट फिल्में भी दी हैं। बिहार में लाखों की संख्या में उनके चाहने वाले हैं। इसलिए पार्टी ने धीरे से उनको बिहार की तरफ सरका दिया है। इस साल के अंत तक बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। वैसे पार्टी ने विधानसभा चुनाव का बिगुल उसी दिन फूंक दिया था जब ७ जून को गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार से ही अपनी वर्चुअल रैली की शुरूआत की थी। बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए दिल्ली से एक दर्जन से अधिक नेता भी जाएंगे। ये सभी नेता पूर्वांचल मोर्चा में बिहार से ताल्लुक रखते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल मोर्चा के कई चेहरों को अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। मनोज तिवारी भी पूर्वांचली चेहरा हैं। खबर है कि पार्टी जुलाई के पहले सप्ताह में सर्वदलीय बैठक बुला सकती है। बीते महीने मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा अध्यक्ष पद से हराकर उनकी जगह पर आदेश गुप्ता को यह कमान दी गई थी।
पर्दा है…
इस चित्र में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हाल ही में दरभंगा-मधुबनी यात्रा की झलक है। काश यह गुजरात होता तो सफेद कपड़े की कायनात की जगह दीवार उठ गई होती ताकि सुशासन बाबू को राज्य की कुव्यवस्था न दिखे। देश का प्रशासनिक अमला बहुत समझदार है। वह शासन के मुखिया को वही दिखाता है जो मुखिया देखना चाहता है। इसलिए जिस रास्ते से नीतीश बाबू का काफिला गुजर वहां सड़क किनारे गरीबों की झोपड॰ियों को छिपाने के लिए पर्दा लगा दिया गया कि कहीं बिहार का विकास देखकर मुख्यमंत्री अचंभित न हो जाएं। राज्य में डेढ़ दशक से सुशासन के बाद यह हाल है कि नजर बचाना पड़ रहा है। प्रशासनिक अमले को शर्म इसलिए नहीं आएगी क्योंकि वह वही कर रहा जो नेता को खुश करने के लिए करना पड़ता है। यह चित्र दरभंगा एयरपोर्ट के निर्माण कार्य का जायजा लेने पहुंचे मुख्यमंत्री के काफिले का है, जिसमें मुख्यमंत्री के साथ जल संसाधन मंत्री संजय झा और अन्य अधिकारी भी दरभंगा पहुंचे थे। वैसे इसी साल जून महीने से दरभंगा एयरपोर्ट से सेवा शुरू होनी थी लेकिन लॉकडाउन और अन्य वजहों से निर्माण कार्य बाधित हुआ, जिसके बाद अक्टूबर महीने से इसके चालू होने की संभावना है। यही वह समय होगा जब राज्य में चुनाव की मुनादी का समय आस-पास होगा। तब तक दरभंगा में विकास की गंगा बहना बहुत जरूरी है।
वांग छी को जंग नहीं चाहिए
करीब ५५ साल भारत में बिताने के बाद चीनी सेना के ७७ वर्षीय वांग छी मध्यप्रदेश के बालाघाट जिला स्थित तिरोड़ी गांव से जब वापस चीन जाने के लिए निकले तब तिरोड़ी की स्थानीय निवासी रेणुका कठौते सहित पूरे गांव के लोगों ने उनसे कहा था क्यों जा रहे हो? जल्दी लौटकर आना। उनके साथ भारतीय मूल के उनके बेटे और बेटी ने भी ११ फरवरी २०१७ की सुबह ३ बजे दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से चीन के लिए उड़ान भरी थी। अब वांग ८० साल के हो चुके हैं और गलवान सीमा पर भारत-चीन विवाद की खबरों से खासे विचलित हैं। वांग छी के मुताबिक १९६३ में वे गलती से भारत में घुस गए और पकड़े गए, उधर भारतीय अधिकारियों के अनुसार वे भारत में बिना कागजात के घुसे। वांग छी जासूस होने के आरोपों से इनकार करते हैं। रेडक्रॉस की जीप दिखी तो लगा कि चीन की है और उसी में सवार हो गए। इसके बाद वे गिरफ्तार हुए और उन्हें असम छावनी में रखा गया। वांग विभिन्न जेलों में सात साल रहे और उसके बाद उन्हें तिरोड़ी में छोड़ दिया गया। वहां उन्होंने एक आटे की चक्की पर काम करना शुरू किया, जहां १९७५ में उन्होंने सुशीला से शादी की। परिवार से दूरी के कारण वो घंटों रोते थे और परिवार को याद करते थे। ८० के दशक में पहली बार पत्रों के माध्यम से चीन में परिवार के साथ उनका संपर्क हुआ। ४० साल में पहली बार २००२ में फोन पर उनकी बात उनकी मां से हुई। २००६ में उनकी मां की मृत्यु हो गई। उनके परिवार को, जिनमें उनके बेटे विष्णु वांग, बेटी अनीता वानखेड़े, बहू नेहा वांग और पोती खनक वांग शामिल हैं। वांग छी को भारत ने अपना लिया है। वांग छी की बूढ़ी आंखों ने जंग देखी ही नहीं, लड़ी भी है और इसका अंजाम भी भुगता है। इसलिए वे चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच अमन कायम रहे। भारत की सरकार और यहां के लोगों ने भी उसे प्यार और सम्मान दोनों ही दिया। उनका कहना है, `लड़ाई अच्छी नहीं। कोई फायदा नहीं है। सबको नुकसान है। लड़ाई नहीं करना तो बहुत अच्छा है, मुझे ये कहना है।‘ बकौल रेणुका वांग का व्यवहार बहुत अच्छा है, बचपन से देख रहे हैं।