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झांकी…जयदीप और कल्याणी

जयदीप और कल्याणी
शादी के दिन दरवाजे पर लगाए गए केले के पत्ते सूख गए थे। शादी में शामिल होने घर आए कुछ मेहमान बचे थे। सत्यनारायण की पूजा संपन्न करवाकर ब्राह्मण देवता भी दक्षिणा लेकर चले गए। साड़ी पहने दुल्हन उठकर खड़ी हुई। तभी उसका सद्यविवाहित पति आकर कहता है, `आज से, साड़ी मत पहनना, इस पंजाबी ड्रेस को ले लो, अंदर का कमरा तुम्हारा है। और सुनो, ये किताबें पढ़ो। मैं दो साल में तुम्हे पुलिस उप निरीक्षक बनाना चाहता हूं।’ हनीमून, प्रणय-वार्तालाप को एक किनारे रख पति ने पत्नी को सामान्य ज्ञान वगैरह पढ़ाना जारी रखा। वाठार रेलवे स्टेशन पर तीन मिनट के लिए रुकने वाली गाड़ी में १०-१२ गन्ने के रस के गिलास बेचकर जयदीप पिसल देशमुख ने दो बार महाराष्ट्र प्रदेश सेवा आयोग (एमपीएससी) परीक्षा उतीर्ण की और पुलिस उपनिरीक्षक व तत्सम पद के लिए चुने जाने के बावजूद सोचा गांव की ही सेवा करनी है। हीरो होंडा की सेमी प्रâेंचायजी लेकर व्यापार किया। समाजसेवी राजनीति की तो पलशी के सरपंच बने और गांव के जर्जर रास्तों की काया पलट दी। पानी फाउंडेशन के तहत गांव के पास बांध बनवाया। तमाम सम्मान वगैरह के ढेर लग गए। गांव की कल्याणी पिसल पसंद आई। उसके पिता से रिश्ते के लिए संपर्क किया गया तो वे बोले, ‘दो-दो बार एमपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी जो गांव में ही खप रहा है, उसे लड़की देने से बेहतर है मैं अपनी लड़की को कुएं में फेंक दूं।’ बात चुभ गई। जयदीप ने कहा, ‘शादी कर दो, दो साल में इसे पीएसआई बना दूंगा।’ कल्याणी ने भी जयदीप को निराश नहीं किया। किसी बुजुर्ग ने जयदीप से पूछा, ‘हीरो होंडा का व्यवसाय तरक्की कर रहा है, गांव के सरपंच हो, हर तरफ क्षेत्र के लोग बधाई देते हैं, अब सपना क्या बचा है?’ जयदीप बोला, `अंकल, मुझे सब कुछ मिल गया, उसने अपनी ट्रेनिंग पूरी कर ली, मैं अपनी पत्नी को एक बार वर्दी में सलाम करना चाहता हूं।’ चित्र में जयदीप अपनी वही इच्छा पूरी कर रहा है।
तब ऐसा होता है…!
कानपुर शूटआउट के बाद जिस तरह से उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाएं सुर्खियां बनी हैं तब लगता है कि नेता भी कभी-कभी सच बोलते हैं। समानता, संयोग और प्रयोग तो निमित्त मात्र हैं। चमत्कारी नेतृत्व के बल पर देश की सत्ता पर प्रतिष्ठित पार्टी के अध्यक्ष जी से अगर आप यह पूछते हैं कि १०० स्मार्ट सिटी कौन और कहां हैं तो निश्चित ही आप विभिन्न उपालंभ भरे विशेषणों के अधिकारी होंगे। अगर आप उनसे यह पूछेंगे कि केंद्र और झारखंड में आप ही की सरकार थी, क्या विकास हुआ तो राज्य नाम की संज्ञा अर्थहीन नजर आएगी लेकिन पार्टी का विकास लोहरदगा, सिमडेगा, चाईबासा, सरायकेला खरसावां, रामगढ़, पलामू, गिरिडीह और धनबाद जिलों में पार्टी के नवनिर्मित कार्यालयों की शक्ल में जरूर नजर आएगा, जिसका अध्यक्ष जी वर्चुअल उद्घाटन कर चुके हैं। अब उद्घाटन जैसा टनाटन मुहूर्त हो और भाषण न हो, यह वैâसे हो सकता है? इसलिए झारखंड सरकार को निशाने पर लेना ही था। राष्ट्रीय अध्यक्ष जी बोले आज राज्य में लॉ लेसनेस (कानून विहीनता सरल शब्दों में जंगलराज) की स्थिति है। प्रदेश में नक्सलवाद का प्रकोप बढ़ गया है। आए दिन मीडिया में हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण की घटनाएं छाई रहती हैं। इसके बाद उन्होंने जो बात कही वह ‘आपके वचन आपको सत्य हों’ को प्रतिष्ठित करती है। वे बोले, `यह सब तब होता है जब शासक कमजोर होता है, बेपरवाह होता है। शासक को जनता की समस्याओं की कोई चिंता नहीं होती है।’ भाषण का यह अंश सुनकर एक वर्चुअल श्रोता की प्रतिक्रिया थी, ‘लगता है आज अध्यक्षजी उत्तर प्रदेश की खबरें देख, सुन, पढ़कर भाषण दिए हैं जी।’
नंबर १६ कौन?
आज यानी ३१ जुलाई को उत्तराखंड के १५वें मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह रिटायर हो रहे हैं। सचिवालय में कनबतियां, चर्चाएं, खुसपुसाहटें बढ़ गई हैं कि किस वरिष्ठ आईएएस की किस्मत चमकेगी और राज्य को १६वां मुख्यसचिव मिलेगा। लॉटरी किसकी खुलती है इस पर फुल वाला सस्पेंस बना हुआ है। उत्तराखंड कैडर के आईएएस अधिकारियों की सूची में १९८५ बैच के अनूप वधावन केंद्र में उद्योग व वाणिज्य मंत्रालय में सचिव हैं। उनका कार्यकाल अगले साल जून में खत्म होगा और इसीलिए शायद ही वे राष्ट्रीय राजधानी छोड़कर उत्तराखंड में आना चाहें। १९८६ बैच के एस रामास्वामी इसी साल ३० अप्रैल को रिटायर हो चुके हैं। इसके बाद जिन दो आईएएस अफसरों का नंबर है वे दोनों उत्तराखंड शासन में अपर मुख्य सचिव यानी अतिरिक्त मुख्य सचिव पद पर तैनात हैं। दिक्कत यह है कि पद एक है और स्वाभाविक दावेदार दो हैं। इनमें १९८७ बैच के ओमप्रकाश और १९८८ बैच की राधा रतूड़ी हैं। वरिष्ठता क्रम में अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी से एक साल वरिष्ठ होने के नाते आईएएस ओमप्रकाश की ताजपोशी मुख्य सचिव के पद पर हो सकती है। मई २०२२ में उनकी सेवानिवृत्ति होनी है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी अभी कोई संकेत नहीं दिया है सिवा इसके कि राज्य में दो अपर मुख्य सचिव हैं और एक अगस्त को राज्य में नए मुख्य सचिव होंगे।
बकरा डायन
बड़ा अजीब लगेगा कि जिसकी जान की खैर उसकी अम्मा मनाती हो और फिर भी जो न बच पाता हो वह बकरा डायन बनकर सैकड़ों लोगों को परेशान करे। उस पर भी बकरा स्त्रीलिंग हो। नेपाल के सीमावर्ती सिकटी प्रखंड के पड़रिया कौवाकोह पंचायत से होकर आनेवाली बकरा नदी की टेढ़ी चाल से वर्षों से जूझते आ रहे हैं लोग। किसानों की सैकड़ों एकड़ की खेती की जमीन और कच्चे मकानों को यह नदी हर साल अपने में समा लेती है। बड़ी संख्या में लोग बेघर हो जाते हैं। जमींदार और किसान नदी के पेट में खेती की अपनी जमीन को गवां कर दूसरे के खेतों में काम करने को मजबूर हैं। पांच साल पहले यह नदी पुल के नीचे से होकर बहती थी। लेकिन अब नदी ने एक किलोमीटर तक अपनी धारा बदल ली और गांव से बिल्कुल सटकर बह रही है। इस वजह से किसानों की सैकड़ों एकड़ खेती की जमीन और कच्चे मकान नदी के पेट में समा चुके हैं। नदी में पैर रखने पर महसूस होता है मानो बर्फ के पानी में पैर रख दिया हो। कहने के लिए नदी के कटान को रोकने के लिए काम जारी है लेकिन जब तक नदी को पुल के नीचे से नहीं बहाया जाता तब तक यह समस्या बनी रहेगी। टेढ़ी चाल से बहने वाली इस नदी को वक्र नदी कहा जाता था, जिसका अपभ्रंश बकरा नदी ज्यादा प्रचलित हो गया है।