" /> झांकी…. पासवान की गुगली!

झांकी…. पासवान की गुगली!

राजनीतिक मौसम विज्ञानी अपनी चाल में सफल रहे हैं। केंद्र में खाद्य मंत्रालय संभाल रहे रामविलास पासवान जैसा चाहते थे, वही हो रहा है। भले ही देश के गृहमंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह वर्चुअल रैली कर भाजपा के चुनाव अभियान का श्री गणेश कर चुके हों लेकिन शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पटना स्थित बिहार राज्य मुख्यालय में बिहार के पार्टी नेताओं को संबोधन किया तब भोजपुरी भाषा के बाद हिंदी में संवाद किया। तभी यह तय हो गया कि ऊपरी तौर पर भले नीतीश कुमार बिहार में राजग के नेता हों मगर चुनाव का नेतृत्व मोदी ही करेंगे। पासवान की कोशिश भी यही है कि राज्य में विधानसभा चुनाव में नेतृत्व का चेहरा मोदीजी बनें। इससे नीतीश नेतृत्व से तो खारिज होंगे ही साथ ही मोदी का विरोध भी नहीं कार पाएंगे। दूसरी तरफ राज्य में तबादला उद्योग के बहाने नीतीश कुमार को घेरने की रणनीति के तहत बिहार राजस्व और भूमि सुधार विभाग में ४०० अधिकारियों का तबादला भ्रष्टाचार और अनियमितता की शिकायत पर रोक दिया गया है। बिहार में तबादला एक उद्योग है, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में उनके भ्रष्टाचार पर तमाम अंकुश लगाने की कवायद के बाद भी फला फूला है। पासवान की सेना इस मुद्दे पर भीतर ही भीतर मुखर है और नीतीश पर हमलावर भी है। वजह है जीतनराम मांझी से नीतीश की बढ़ती नजदीकियां और राज्य स्तर पर श्याम रजक जैसे लोगों को दलित नेतृत्व के रूप में नीतीश की छत्रछाया में उभरना पासवान पिता-पुत्र को पसंद नहीं है।
शिवराज निशाने पर
बहुत चाहने के बाद भी मध्य प्रदेश विधानसभा उपचुनावों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चेहरा नहीं बन पा रहे हैं। चूंकि अधिकांश सीटें ग्वालियर-चंबल संभाग से हैं इसलिए नए भाजपाई ज्योतिरादित्य सिंधिया ज्यादा सुखिर्‍यां बटोर रहे हैं। इस बीच यह खबर भी मुख्यमंत्री को विचलित करने के लिए हवा में तैर रही है कि सिंधिया ने पहले मंत्रिमंडल में दबाव बनाया और अब विभागों के बंटवारे में दबाव बना रहे हैं, जिससे भाजपा में विभागों के बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है। विपक्ष ने भी शिवराज से ज्यादा निशाना सिंधिया पर ही साध रखा है जैसे राज्य के मुख्यमंत्री सिंधिया ही हों। यही वजह है कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसी कोशिश की जा रही है जैसे विपक्ष के लिए शिवराज से ज्यादा बड़ी चुनौती महाराज हैं। इससे भाजपा पर मानसिक दबाव यह बन रहा है कि अब मध्य प्रदेश में नेतृत्व बदल रहा है। इससे पार्टी फोरम पर एक तबका यह मान रहा है कि सिंधिया को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देना पार्टी के लिए नुकसानदेय हो सकता है। एक पूर्व मंत्री ने ज्योतिरादित्य सिंधिया पर सरकारी जमीनों को हड़पने का आरोप लगाते हुए कहा है कि सिंधिया समर्थकों को राजस्व के विभाग न दिए जाएं। क्योंकि सिंधिया परिवार सरकारी जमीनें हड़पने का काम करता है। राजस्व विभाग में सिंधिया के लोग रहेंगे तो प्रदेश की महत्त्वपूर्ण जमीन हड़प ली जाएंगी। शिवराज पर शिवपुरी, ग्वालियर, गुना में जो विवादित जमीन है इसकी जांच का दबाव बनाकर विपक्ष एक तीर से दो शिकार करने के चक्कर में है। अगर शिवराज जांच के आदेश देते हैं तो सिंधिया खेमा बिदकता है और न कराने की स्थिति में सिंधिया से डरने का आरोप। दोनों ही स्थितियों में शिवराज का नुकसान तय है
मंद होती ज्योति
गुडगांव से दरभंगा तक पिता को साइकिल पर ढोकर घर पहुंची ज्योति को मीडिया ने हाथो-हाथ उठा लिया और यही वजह है कि उसे विभिन्न माध्यमों से ईनाम व अन्य सहायता मिली। अब वही पिता-पुत्री मीडिया से भी मुंह छिपा रहे हैं। कारण यह है कि संघर्ष के इस जज्बे से प्रभावित होकर फिल्मकार विनोद कापड़ी ने भगीरथी फिल्‍म्‍स के बैनर तले ज्योति की कहानी पर फिल्म बनाने की योजना बनाई। अब कंपनी ने ज्योति के पिता पर करार तोड़ने पर आपत्ति जतायी है और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। २७ मई को दरभंगा के सिंहवाड़ा प्रखंड के सिरहुल्ली निवासी साइकिल गर्ल ज्योति के पिता मोहन पासवान ने भगीरथी फिल्म कंपनी के साथ फिल्म बनाने के लिए करार किया था। इसके लिए २ लाख ५१ हजार रुपए कंपनी ने देने का अनुबंध हस्ताक्षर किए और पहली किस्त ५१ हजार रुपए खाते में भेज दिए गए थे। कागजात पर दस्तखत कर फिल्म बनाने का अधिकार ज्योति के पिता मोहन पासवान ने विनोद कापड़ी को दिया था। ताजा विवाद सामने तब आया जब भगीरथी फिल्म ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि मोहन पासवान ने शाइन कृष्णा से भी फिल्म का करार कर लिया है जो अवैध और गैरकानूनी है। लॉकडाउन के बाद कापड़ी ने ज्योति और उसके पिता से मिलने की कोशिश की तो ज्योति के पिता ने शादी में व्यस्त होने और बाद में लखनऊ में होने का बहाना बनाकर कन्नी काट ली। अब पता चला है कि उन्होंने अन्य कंपनी शाइन कृष्णा से करार कर लिया है जो कि गैरकानूनी है। भागीरथी फिल्म्स ने इसी करार को चुनौती देते हुए एक ज्योति के पिता को नोटिस भेजा है। इधर मोहन पासवान का कहना है कि करार उन्होंने नहीं तोड़ा है, बल्कि कंपनी ने देरी की है। हद तो यह है शनिवार और रविवार को साइकिल गर्ल ज्योति पासवान की कथित हत्या की खबरें वायरल हुईं लेकिन फिर भी पिता-पुत्री मीडिया से दूर ही रहे। अलबत्ता पुलिस में उन्होंने इस अफवाह पर रिपोर्ट जरूर लिखाई।
ऐसे बनते हैं विकास दुबे
उत्तर प्रदेश में इन दिनों कानपुर शूट आउट की खबरें गर्म हैं और मुख्य अपराधी विकास दुबे अब तक पुलिस की पकड़ से दूर है। कोई भी सड़क छाप गुंडा विकास दुबे कैसे बनता है, भदोही जिले के सुरियांवा थाने में उसका प्रयोग चल रहा है। यह चित्र उस वीडियो का स्क्रीन शॉट है, जिसमें थाने के दीवान ओझा अपने सामने बैठे फरियादी से कह रहे हैं कि रिपोर्ट में चार नाम लिखे जाएंगे लेकिन मुख्य आरोपी अंकित मिश्रा का नाम नहीं लिखा जाएगा। क्योंकि ऐसा ‘ऊपर’ से आदेश है। घटना यह है कि घर के दरवाजे पर उगी हुए घास को उखाड़ते समय बटुकनाथ मिश्रा, पवन मिश्रा, विशाल मिश्रा पर अंकित मिश्रा और पंकित मिश्रा ने अपने पांच-छह साथियों के साथ मिलकर फावड़े और लाठियों से हमला कर दिया। जिसमें बटुकनाथ और उनकी पत्नी सुशीला देवी गंभीर रूप से घायल हो गए। सुरियावां थाने के एसएचओ विजय प्रताप सिंह ने शिकायत लिखते हुए दीवान ओझा जी को कहा कि चार से ज्यादा लोगों का नाम नहीं लिखा जाएगा। यह तो हुई ओझा के ‘ऊपर’ वाले की बात। अब इन ‘ऊपर’ वाले के ऊपर किसका दबाव है? यह समझना जरूरी है। जिस आरोपी अंकित का नाम पुलिस अपनी प्राथमिकी में नहीं लिखना चाहती वह अंकित मिश्रा अपने भाई पंकित के साथ फरार हो गया है। दिल्ली में रहने वाला अंकित वहां नशीले पदार्थों की सप्लाई नेटवर्क से जुड़ा है। यह बात खुद अंकित अपनी तारीफ में जारी एक वीडियो क्लिप में कहते हुए सुना जा सकता है। मतलब यह है कि एक अदना से ड्रग पेडलर को सुरियांवा पुलिस क्यों बचाना चाहती है? आज यह गली छाप शोहदा पुलिस की शह पाकर कल का विकास दुबे बन गया तो जिम्मेदार कौन होगा? भदोही के उच्च पुलिस अधिकारियों को इस घटना पर ध्यान देना चाहिये। हां, पुलिस ने इतनी कृपा जरूर की है कि हमले में घायल लोगों की मेडिकल जांच करा ली है। जिन्हें गिरफ्तार किया तथा वे जमानत पर छूटकर फिर से आतंक मचा रहे हैं।