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झांकी… मामा ने बढ़ाई टेंशन

मामा ने बढ़ाई टेंशन
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कोरोना का इलाज करा रहे हैं। मगर जब से उनके कोरोना संक्रमित होने की खबर आम हुई है, वे सब लोग तनाव में हैं जिनका किसी न किसी रूप में मुख्यमंत्री से संपर्क हुआ था। संपर्क की यह श्रंखला भोपाल से लखनऊ तक पैâली है, इससे और ज्यादा दिक्कत आ रही है। कोरोना पाजिटिव पाए जाने से पहले १० दिनों में मुख्यमंत्री ने उज्जैन, ग्वालियर, विदिशा और लखनऊ का दौरा किया है। इस दौरान सरकारी अफसरों सहित कम से कम ५०० से ज्यादा लोगों से उनका निकट संपर्क हुआ है। मुख्यमंत्री के साथ हेलिकॉप्टर में यात्रा करनेवालों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा, संगठन मंत्री सुहास भगत, वैâबिनेट मिनिस्टर मोहन यादव, भूपेंद्र सिंह और मीडिया प्रभारी लोकेंद्र पाराशर शामिल रहे हैं। १७ जुलाई को मुख्यमंत्री शिवराज विधानसभा में सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए थे। तब पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, प्रोटेम स्पीकर रामेश्वर शर्मा भी बैठक में हुए शामिल थे। इसी दिन मोहन यादव के साथ वे उज्जैन महाकाल मंदिर के दर्शन करने गए थे। २० जुलाई को ग्वालियर में उन्होंने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की थी। २१ जुलाई को राज्यपाल लालजी टंडन के निधन पर श्रद्धांजलि देने प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा व सुहास भगत के साथ लखनऊ गए थे। सबसे ज्यादा वे लोग टेंशन में हैं जो इस दौरान मुख्यमंत्री से एक पर एक मिले थे। इनमें बृजेंद्र प्रताप सिंह, तुलसीराम सिलावट, मीना सिंह, कमल पटेल, एंदल सिंह कंसाना, गोविंद सिंह राजपूत, ओमप्रकाश सकलेचा, विश्वास सारंग, प्रभु राम चौधरी, महेंद्र सिंह सिसोदिया, प्रदुम सिंह तोमर, उषा ठाकुर, मोहन यादव, हरदीप सिंह डंग, इंदर सिंह परमार आदि शामिल थे।
सियासी शोर से परे
एक तरफ राजस्थान में कांग्रेस को दो बड़े नेता अपनी-अपनी राजनीतिक फसल बचाने के लिए होटल, रिसोर्ट, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, राजभवन की परिक्रमा कर रहे हैं दूसरी तरफ इस राजनीतिक हंगामे से दूर एक विधायक खेत में थाली बजा रहा है। यह थाली कोरोना भगाने के लिए नहीं बल्कि अपना खेत टिड्डियों से बचाने के लिए बजा रहे हैं। सूबे में सियासी संकट की तस्वीरों के बीच यह तस्वीर पूरे राज्य पर मंडरा रहे टिड्डी दल के हमले के खतरे को रेखांकित करती है। बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ विधानसभा क्षेत्र से माकपा विधायक गिरधारी महिया इन बीते दिनों अपने खेत में टिड्डियां उड़ाते दिखाई दिए हैं। वर्तमान की भागमभाग वाली जिंदगी से परे और प्रदेश में चल रही सियासी उठापटक से दूर अपने गांव स्थित अपने ही खेतों में टिड्डियां उड़ा कर अपनी फसल को बचाने की कोशिश में लगे विधायक महिया अपने खेत में कभी थाली बजाकर तो कभी ट्रैक्टर पर तेज संगीत बजाकर टिड्डियां उड़ाते नजर आ रहे हैं। राज्य की सियासी तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है सत्तारूढ़ पार्टी और उनके समर्थक व बागी विधायक पांच सितारा होटलों और रिसोर्ट में वैâद की आजादी को भोग रहे हैं। विधायक गिरधारी महिया एक प्रतीक मात्र हैं क्योंकि अपने खेत में टिड्डी दल को लेकर प्रदेश के अधिकांश किसान काफी परेशान दिखाई हैं।
फिर अखाड़ा बना राजभवन
कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है। राजस्थान में जिस तरह सत्ता का संघर्ष राज्यपाल निवास अर्थात राजभवन तक पहुंचा है, वह २७ साल पहले हुए ऐसे ही प्रहसन की पुनरावृत्ति है। बस पार्टी और किरदार बदल गए हैं। उस समय केंद्र में पीवी नरसिंहराव की सरकार थी। विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी थी मगर उसके पास भी पूर्ण बहुमत नहीं था। इसकी नींव तब पड़ी जब १९९२ में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद केंद्र ने भैरोसिंह शेखावत की भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया था। इस सरकार में भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी और जनता दल (दिग्विजय सिंह) के साथ मिलकर उसने अपनी सरकार को बचाया था। १० महीने तक राज्य में राष्ट्रपति शासन के बाद नवंबर १९९३ में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे त्रिशंकु थे। तब राज्यपाल बलिराम भगत थे। ९५ सीटें लेकर भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। बहुमत से ०६ सीटें दूर। कांग्रेस को ७६ और निर्दलीयों को २१ सीटों पर जीत मिली थी। शेखावत ने निर्दलीयों की मदद से सरकार बनाने का दावा पेश किया। नंबर गेम में पिछड़ने के बाद भी कांग्रेस सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ में लगी थी। तब भैरोसिंह शेखावत ने राजभवन के सामने विधायकों की परेड कराई, धरना भी दिया, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल थे। एक सप्ताह की उठापटक के बाद कांग्रेस को महसूस हो गया कि वह शायद सरकार नहीं बना पाएगी। अंतत: भगत को शेखावत को सरकार बनाने के लिए बुलाना ही पड़ा।
अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो!
चार महीने की वह बेटी तो यह भी नहीं जानती कि ‘अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो’ के पीछे कितना और किसका दर्द छिपा है। दीपक ब्रह्मा से सहानुभूति की जाए या नफरत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि कोरोना ने क्या-क्या नजारे दिखाए हैं और दिखा रहा है। पांच ट्रिलियन इकोनॉमी की हुंकार भरने वालों को इस पर सोचना चाहिए। असम के कोकराझार के तोंतुला मंदारिया गांव में रहने वाला दीपक ब्रह्मा तालाबंदी से पहले गुजरात में मजदूरी करता था। लेकिन उसकी नौकरी चली गई। इस दौरान संघर्षों का सामने करते हुए वह घर तो पहुंचा लेकिन उसकी परेशानियां घर पहुंचने के बाद भी खत्म नहीं हुई। घर पहुंचने के बाद उसके सामने परिवार का भरण पोषण करना एक चुनौती बन गई, जिसके बाद उसने अपनी ४ महीने की बच्ची को ४५ हजार रुपए में बेच दिया। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने बच्ची को बचाकर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। मासूम बच्ची को बेचने वाले दीपक ब्रह्मा के परिवार का कहना है कि आर्थिक तंगी से परेशान उनके सामने बच्ची को बेचने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था। मामला सामने आने के बाद गांववालों की मदद से पुलिस और स्थानिक स्वयंसेवी संस्था ने बच्ची को बचा लिया। मासूम बच्ची के माता-पिता के साथ ही साथ तीन अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर कानूनी कार्रवाई जारी है।