" /> झांकी… माया का गम!

झांकी… माया का गम!

फिलहाल यह स्तंभ लिखे जाने तक राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गिरने की गुंजाइश बहुत कम है, जिसका गम भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को है। इसलिए रविवार को जैसे ही यह खबर आई कि राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट कोपभवनवाली मुद्रा में दिल्ली पहुंचे हैं और उनके साथ २२ विधायक भी हैं, जिनको गुरुग्राम के रिसोर्ट में रखा गया है, मायावती का दिल खुशी से उछल रहा था। कारण यह है कि २०१८ में राजस्थान विधानसभा चुनाव में बसपा के ६ विधायक जीत कर आए थे। उस समय गहलोत सरकार के पास १०० विधायक थे और बसपा ने सरकार को बाहर से समर्थन दे रखा था। लेकिन इसी बीच प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में दलितों को अपने पाले में करने की रणनीति बना चुकीं थी और मायावती को यह नागवार गुजर रहा था तो दूसरी ओर गहलोत ने सभी ६ बसपा विधायकों को तोड़कर पार्टी में शामिल कर लिया। तब से कांग्रेस से भिन्नाई मायावती का गुस्सा सातवें आसमान पर है। इसलिए जब-जब जहां भी कांग्रेस संकट में होती है मायावती को विशेष खुशी होती है। मगर सोमवार दोपहर तक यह साफ हो गया था कि पायलट भाजपा में नहीं जा रहे हैं, मायावती की खुशी भी काफूर हो चुकी थी। ऊपर से मामले को संभालने की कमान जैसे ही प्रियंका गांधी ने संभाली पायलट के खेमे से नरमी के संकेत मिले। इस पूरे प्रहसन में शामिल होकर भी न शामिल होने का अभिनय भाजपा ने किया। वैसे नंबरों का खेल भाजपा को खुलकर सामने आने से रोक रहा था। दूसरी वजह यह थी कि पायलट जिस पद के लिए भाजपा में आने की शर्त रख रहे थे, उससे राजस्थान भाजपा में बवाल हो जाता। इसलिए भाजपा ने पायलट के सामने शर्त रखी कि पहले सरकार गिराओ। स्थितियां ऐसी थीं कि तुरंत गहलोत सरकार गिराना संभव नहीं था। इसलिए बगावत में तनी तलवारें आहिस्ता-आहिस्ता म्यानों में जगह बना रही थीं।
कर्म से पहले फल
बदलते युग का संकेत यह है कि कर्म बाद में फल पहले मिल जाएगा। गीता में कहा गया है कि कर्म किए जा, फल की चिंता मत कर। मगर भारत की आधुनिक राजनीति की महाभारत में गीता का संदेश बदल गया है। इस आधुनिक गीता का शिल्पकार आप भारत की चाल, चरित्र और चेहरेवाली पार्टी से न जोड़ें। मध्य प्रदेश में कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होते ही कुंवर प्रद्युम्न सिंह लोधी को प्रसाद मिल गया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देते हुए नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बना दिया है। उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा रहेगा। छतरपुर जिले की बड़ा मलहरा सीट से विधायक रहे लोधी का भाजपा में शामिल होना कांग्रेस के लिए एक और झटका है। सही अर्थों में कहा जाए तो कांग्रेस ने खुद अपने विधायक को भाजपा में जाने के लिए मजबूर किया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी होने के कारण कांग्रेस ने लोधी को हाशिये पर रख दिया था। दिसंबर २०१९ में विधानसभा चुनाव में लोधी ने भाजपा प्रत्याशी ललिता यादव को हराया था। प्रद्युम्न सिंह को भाजपा में लाने का काम २००३ में पहली बार मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं उमा भारती ने किया। तब वे बड़ा मलहरा सीट से ही विधायक चुनी गर्इं थीं। इसलिए भाजपा में शामिल होने से लोधी पहले उमा भारती के बंगले पर पहुंचे। बाद में वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिले, जहां मिठाई खिलाकर पार्टी में उनका स्वागत किया गया। २ जुलाई को मंत्रिमंडल विस्तार के बाद उमा भारती ने बुंदेलखंड और लोधी समाज की अनदेखी के आरोप लगाए थे।
घरवाली बाहरवाली
कहानी में ट्विस्ट यह है कि एक भाई ने घरवाली से पहले ही बाहरवाली चुन ली और उसी को घरवाली बनाने का इरादा भी था। मगर परिवारवालों ने उसके लिए दूसरी घर वाली को पसंद किया। आज्ञाकारी बेटे की तरह भाई ने परिवार की पसंद से शादी के लिए भी हां कर दी और अपनी पसंद को भी। नतीजा एक मंडप में एक दूल्हे के संग दो वधुओं ने फेरे लिए। मामला मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से ४० किमी दूर डाडोंगरी तहसील के केरिया गांव का है। गांव के आदिवासी युवक संदीप उईके भोपाल में पढ़ाई कर रहा था, इस दौरान होशंगाबाद की लड़की से उसकी दोस्ती हो गई। दोस्ती प्यार में बदल गई और फिर बात शादी तक पहुंच गई। इस बीच संदीप के घरवालों ने कोयलारी गांव की दूसरी लड़की के साथ उसकी शादी तय कर दी। इसके बाद पूरा मामला पंचायत तक पहुंच गया। विवाद को खत्म करने के लिए तीनों परिवारों ने पंचायत बुलाई। इसमें पैâसला लिया गया कि अगर दोनों लड़कियां संदीप के साथ, एक साथ रहने के लिए तैयार हैं, तो दोनों की शादी लड़के से करा दी जाए। इस पैâसले पर दोनों लड़कियां राजी हो गईं। संदीप भी दोनों के साथ शादी करने के लिए तैयार हो गया। यह पहला मौका था जब किसी लड़के ने एक साथ दो लड़कियों के साथ सात फेरे लिए हों। शादी के जोश में कोरोना को भूल गए कि आपदाकाल में शादी के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। स्थानीय तहसीलदार मोनिका विश्वकर्मा ने कहा है कि फिलहाल मामले की जांच चल रही है।
चैंपियन को मनरेगा का सहारा!
तस्वीर में जो प्रमाणपत्र दिख रहे हैं वे राष्ट्रीय वुशु (चीनी मार्शल आर्ट) खिलाड़ी शिक्षा को विभिन्न खेल प्रतियोगिताएं जीतने पर मिले हैं। लेकिन इनसे शिक्षा और उसके परिवार का पेट भर जाए, यह संभव नहीं है। इसलिए हरियाणा की यह खिलाड़ी रोहतक जिला स्थित अपने गांव इंदरगढ़ में मनरेगा के तहत मजदूरी कर रही है। विडंबना यह है कि खुद का मनरेगा कार्ड न बनने के कारण शिक्षा को माता-पिता के साथ जुटना पड़ता है ताकि शाम को घर में दो रोटियां सेंकीं जा सकें। यह हाल है तीन बार अखिल भारतीय, नौ बार राष्ट्रीय और २४ बार प्रदेश स्तर पर वुशू खेल में चैंपियन रह चुकी शिक्षा का। आपदा ने उसे किसी अच्छे महकमें में तो नहीं बल्कि दिहाड़ी मजदूर बनने का अवसर जरूर प्रदान किया है। यह तस्वीर गत वर्ष दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की १५०वीं वर्षगांठ के मौके पर अपने आवास पर फिल्म नायिकाओं के साथ फोटो खिंचवाने वाले प्रधान को जरूर देखनी चाहिए ताकि बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के उद्घोष को तिलांजलि देने में समय न लगे। सुबह ६ बजे से कंधों पर कस्सी लादकर माता-पिता के साथ मनरेगा में मजदूरी का काम करने जानेवाली शिक्षा को जब मनरेगा के तहत काम नहीं मिलता या मनरेगा का काम बंद हो जाता है तब वह दूसरे मजदूरों की तरह ही खेत में धान लगाने का काम करती है। माता-पिता ने दिहाड़ी मजदूरी कर बेटी को चैंपियन बनाया और इस मुकाम तक पहुंचाया है। वुशु में हरियाणा की गोल्ड मेडलिस्ट शिक्षा शायद गलत परिवार-जाति में जन्मी है अन्यथा वह भी खेल कोटे से किसी सरकारी दफ्तर में अफसर जरूर होती।