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झांकी… सुभद्रा का संताप

‘छोडों’ मत!
अथाह दुख की घड़ी है। पीएम ने सामाजिक मंच के हर पटल को छोड़ने की इच्छा भर जाहिर की कि देश की फिक्रमंद मीडिया संस्थाएं इस विषय पर मंथन में जुट गर्इं। हाय! ऐसा हुआ तो उनसे संपर्क के सारे माध्यम ही खत्म हो जाएंगे। गरीब की आवाज उन तक वैâसे पहुंचेगी। खबर बन गई हैश टैग `नो सर’ ट्रेंड कर रहा है। हे भक्तवत्सल! ऐसा न कीजिए। आप हैं तो सोशल मीडिया की रौनक है। जब आप नहीं होगे तो मनोरंजन से लेकर ज्ञानवर्द्धन तक के सारे मार्ग अवरुद्ध हो जाएंगे। वैâसे पता चलेगा आप आम खाते हो या नहीं? सोचिए आपके कारण अनुसरणार्थी कितने विकल हो जाएंगे? मत छोडिए, बने रहिए। मंच छोड़ना पलायनवाद है। आप घनघोर राष्ट्रवादी ठहरे। ऐसे वैâसे भाग सकते हो। अब तक आप छोड़ते रहे, छोटी-बड़ी-लंबी जैसी भी छोड़ी किसी ने मना किया? अब कौन-सी बात से आहत होकर इतना निष्ठुर निर्णय की ओर बढ़ रहे हो? वैसे इस विषय पर आपको मार्गदर्शक मंडली से सलाह लेना चाहिए, जिन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। जानते हैं उनकी राय क्या होगी? बस आप छोड़ना छोड़ दो और मंच पर बने रहो। वैसे सच्ची बताना यह भी नई वाली छोड़ी है न! कि सचमुच छोड़ रहे हो!
बांग्लार गोरबो….!
ओडिशा के मुख्यमंत्री आवास पर ममता बनर्जी के साथ अमित शाह का दोपहर भोज इतना अच्छा नहीं रहा, जितनी उम्मीद की जा रही थी। दो दिन बाद ही कोलकाता की सड़कों पर शाह के मजमे में ‘गोली मारो’ के उद्घोष गूंजे। दीदी भी कहां चुप रहनेवाली थीं, अगले ही दिन ‘बांग्लार गोरबो ममता’ (बंगाल की गौरव ममता) नामक अभियान का श्री गणेश करते ही हुंकार भरी, `यह दिल्ली नहीं है जहां हम कोलकाता में गोली मारो सरीखे.. नारों को बर्दाश्त करें।’ पश्चिम बंगाल में आगामी नगर निगम चुनाव २०२० और २०२१ के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जनसंपर्क अभियान ‘बांग्लार गोरबो ममता’ शुरू किया गया है। अभियान के तहत तृणमूल कांग्रेस के करीब एक लाख कार्यकर्ता शहर के विभिन्न हिस्सों में जाएंगे और लोगों को समझाएंगे कि बनर्जी पश्चिम बंगाल के विकास एवं प्रगति के लिए तथा राज्य के सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए कितनी जरूरी हैं। कार्यक्रम का पहला चरण ७५ दिनों तक चलेगा। पिछले साल ‘दीदी के बोलो’ नामक अभियान की शृंखला में यह दूसरा अवतार है।
तब सोचेंगे..
बिहार में संशोधित नागरिकता कानून लागू न करने और पुराने जनसंख्या पंजीकरण के प्रारूप लागू करने के बाद अब झारखंड में इस मुद्दे पर बहस तेज होनी है। फिलहाल दिल्ली शाही से फरमान आने का इंतजार किया जा रहा है। अभी बिहार में इस मुद्दे पर खुद राजग के खेमे में बहस के दो सुर हैं मतलब पक्ष-विपक्ष की स्थिति है। ऐसे में दिल्ली आधारित एक अंग्रेजी दैनिक ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से इस संदर्भ में जानना चाहा तब उन्होंने अति दार्शनिक अंदाज में उत्तर दिया, ‘हमारे पास जब ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स आएंगे तब हम देखेंगे कि कितने लोगों को मारना पड़ेगा, इसको लागू करने के लिए। कितने परिवारों को उजाड़ना पड़ेगा, इसको लागू करने के लिए। कितने बच्चों को अनाथ करना पड़ेगा, कितनी महिलाओं को विधवा करना पड़ेगा! उसके बाद मैं सोचूंगा कि करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए। ‘मतलब बातों-बातों में हेमंत ने नागरिकता कानून की भयावहता पर व्यंग्य तो कर ही दिया है।
सुभद्रा का संताप
भारतीय जनता पार्टी में रहकर `सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का दिल्ली दंगों में असली चेहरा देखने के बाद सुभद्रा मुखर्जी के ज्ञान चक्षु खुल गए और उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा अमित शाह की कोलकाता यात्रा से ठीक पहले उछला, लिहाजा मीडिया को दिखाई नहीं पड़ा। सुभद्रा ने कहा है कि वह उस पार्टी में नहीं रह सकतीं, जिसमें कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर जैसे नेता हैं। सुभद्रा मुखर्जी ने कुछ बांग्ला फिल्मों और टीवी सीरियल्स में काम किया है। बहुत उम्मीद के साथ भाजपा में शामिल हुर्इं सुभद्रा हाल के घटनाक्रमों से निराश हैं। उनको लगता है कि भाजपा अपनी विचारधारा से दूर जा रही है। नागरिकता संशोधन अधिनियम के साथ होने के बावजूद इसे बढ़ावा देने के भाजपा के तरीके को लेकर वे अब विरोध में हैं। उनका सवाल है कि हम सबको इतने सालों बाद स्वतंत्र भारत में अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अपने दस्तावेज क्यों दिखाने चाहिए?