झारखंड के झोलरों का रिपोर्ट कार्ड, 2018 में 500 करोड़ का माल पार

डिजिटल इंडिया के नारे के बाद बैंकों का कामकाज ऑनलाइन तो हो गया लेकिन इसके साथ ही ठगी के मामले भी बेतहाशा बढ़ गए हैं। डिजिटल के बदलते युग में साइबर सेंधमारों की बल्ले-बल्ले हो गई है। एक अनुमान के अनुसार साइबर अपराध २०० फीसदी की दर से बढ़ा है जिससे पिछले एक साल में झोलरों का ५०० करोड़ तक का व्यापार हुआ है। मुख्य रूप से झारखंड और बिहार के सीमावर्ती जिले साइबर सेंधमारों का गढ़ बनकर उभरे हैं, जहां से ट्रेनिंग लेकर झारखंडी झोलर (साइबर सेंधमार) पूरे देश में लोगों के बैंक खाते में जमा गाढ़ी मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं। झारखंड के झोलरों का रिपोर्ट कार्ड चर्चा का विषय बना हुआ है। बता दें कि मुंबईकर इन झोलरों का सबसे ज्यादा शिकार बन रहे हैं। इस काम में पकड़े जाने या खून-खराबे का जोखिम कम होने के कारण झारखंड के गरीब एवं शिक्षित बेरोजगार युवक तेजी से अपराध की इस दुनिया में शामिल हो रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार झारखंड के सीमावर्ती जिलों से ही २००० से ज्यादा युवक इन दिनों ऑनलाइन फ्रॉड का काम कर रहे हैं। साइबर सेंधमारों की इस टोली में १२ वर्ष से ४० वर्ष की उम्र तक के लोग शामिल हैं। झोलरों की यह टोली तीन स्तर पर काम करती है। इसमें ग्राहकों की जानकारी जुटाने से लेकर ठगी के पैसे ठिकाने लगाने तक का कार्य किया जाता है।

नई-नई तरकीब ढूंढ़ते हैं साइबर के सेंधमार

‘मैं आपके बैंक का मैनेजर बोल रहा हूं, आपका एटीएम कार्ड बंद होनेवाला है, इस तरह लोगों से उनके एटीएम डेबिट / क्रेडिट कार्ड की जानकारी पूछकर ऑनलाइन ठगी का तरीका अब पुराना हो चुका है। ऐसे लोगों से बचने के लिए बैंक और पुलिस लोगों से अपील करती है कि अपने बैंक खाते की कोई भी जानकारी फोन पर किसी से साझा न करें। लेकिन अब ठग फोन पर जानकारी नहीं पूछते। वे मिस कॉल दे कर ही सिम स्वाइप सिस्टम के जरिए लोगों के खाते से पैसे उड़ा लेते हैं। बीते सप्ताह माहिम निवासी एक कपड़ा व्यवसायी को ऐसे ही ठगों ने १ करोड़ ८६ लाख रुपए की चपत लगा दी। इस तरह मुंबई सहित पूरे देश में ठग प्रतिदिन हजारों लोगों को ठगते हैं। मुंबई में तो हाल ही में एक ऐसा मामला भी सामने आया जिसमें पीड़ित ने अपना डेबिट कार्ड एक्टिवेट भी नहीं करवाया था लेकिन ठगों ने उनके खाते से पैसे निकाल लिए।

एनसीआरबी के आंकड़े

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो देश में साइबर अपराध की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। तमाम कोशिशों के बावजूद इन पर नकेल कसने में पुलिस नाकाम सिद्ध हो रही है। वर्ष २०१४ में ९,६२२, २०१५ में ११५९२ तो वहीं २०१६ में १२३१७ मामले देश भर में दर्ज हुए थे। वर्ष २०१७ में सिर्फ महाराष्ट्र में ४१७२ मामले ऑनलाइन फ्रॉड के मामले दर्ज हुए थे जिनमें ९८० मामले मुंबई में ही दर्ज हुए थे। मुंबई में १९०८ मामले वर्ष २०१७ में लंबित थे।

झारखंड-बिहार के युवा हैं अव्वल

अब तक इस अपराध में पुलिस द्वारा पकड़े गए ज्यादातर आरोपी झारखंड-बिहार के ही पाए गए हैं। ये दिल्ली के नोएडा व आसपास के इलाकों में फर्जी साइबर कैफे से ठगी का कारोबार करते हैं।

प्रत्यक्ष अपराधों की जगह साइबर क्राइम का कर रहे हैं रुख

साइबर पुलिस के एक अधिकारी की मानें तो साइबर अपराधियों के पकड़े जाने की गुंजाइश बहुत कम होती है। अपराधी प्राय: दूसरे राज्य के लोगों को शिकार बना रहे हैं। इस अपराध से जुड़े गिरोह के लोग देश भर में फैले हैं। ऐसे ही एक गिरोह के सरगना रामकुमार मंडल उर्फ सीताराम मंडल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है। रामकुमार उर्फ सीताराम २०१० में दूसरे नौजवानों की तरह काम की तलाश में मुंबई आया था। उसने पहले सड़क किनारे के एक ढाबे में और उसके बाद रेलवे स्टेशन पर बिचौलिये के तौर पर काम किया। इसी दौरान उसने कुछ कॉल सेंटरों में भी काम किया। इसी कॉल सेंटर ने उसकी जिंदगी बदल दी। मंडल से पूछताछ में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। मंडल ने बताया कि इस मामले में पकड़े जाने का खतरा कम होता है। आसानी से एकमुश्त मोटी कमाई हो जाती है और खून-खराबे का खतरा भी कम होता है इसलिए लोग बड़ी संख्या में इस अपराध में आ रहे हैं। अकेले रामकुमार अब तक ५०० से ज्यादा लोगों को ठगी की ट्रेनिंग दे चुका है।

फर्जीवाड़े का होता है डिग्री कोर्स

झारखंड के सीमावर्ती जिले जामताड़ा, करमाटांड, देवघर, मधुपुर में डिजिटल डकैती की क्लास चलती है जहां बैंक के पूर्व कर्मचारी एवं साइबर विशेषज्ञ छात्रों को ठगी की ट्रेनिंग देते हैं। हर साल सैकड़ों छात्र यहां ठगी की डिग्री लेने पहुंचते हैं। गिरोह के लोग त्रिस्तरीय स्ट्रेटेजी पर तीन टीमों में बंट कर काम करते हैं। पहला डाटा कलेक्टर्स, दूसरा फोन कर फंसाने वाला और तीसरा पैसे की निकासी करने वाली टीम। जो ट्रेनिंग लेने के बाद देश भर में लोगों के खाते साफ करने का काम करते हैं। रामकुमार ने खुलासा किया था कि तीनों टीमों के लिए अलग-अलग कमीशन फिक्स है। डाटा कलेक्टर्स को ३० प्रतिशत, बात करके फंसाने वाले को ५०प्रतिशत और पैसा निकालने वाली टीम को २०प्रतिशत कमीशन मिलता है।

आलीशान मकान से निशानदेही

पुलिस अब साइबर सेंधमारों की मांद यानी उनके इलाकों में उनका मकान देखकर सेंधमारों की पहचान करने का प्रयास कर रही है। पुलिस के अनुसार इस अति पिछड़े इलाके में पिछले एक-दो वर्षों में कुछ लोगों ने आश्चर्यजनक रूप से उन्नति की है। उन्होंने ठगी के पैसे से आलीशान मकान बनवाए हैं। पुलिस अब उनकी कमाई के जरिए को जानने का प्रयास कर रही है। जामताड़ा साइबर पुलिस के अनुसार साइबर अपराध की दुनिया का बड़ा नाम रामकुमार उर्फ सीताराम मंडल है। उसने अक्तूबर २०१५ से १५ मई २०१६ के बीच देश भर के १५० से अधिक खाताधारकों को झांसा देकर उनके एटीएम का गुप्त नंबर लिया और लगभग एक करोड़ की ठगी की।

जांच एजेंसियां चाहती हैं आधार से लिंक हो सिमकार्ड

ऑनलाइन फ्रॉड से जुड़े लोगों के लिए फर्जी नाम से खरीदे गए सिमकार्ड सबसे बड़ा हथियार सिद्ध हो रहे हैं। अत: इस अपराध पर नकेल कसने व अपराधियों की धरपकड़ के लिए पुलिस चाहती है कि सिम कार्ड को आधार कार्ड से लिंक किया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे अपराधियों को फर्जी सिम कार्ड नहीं मिलेंगे और फिर भी यदि कोई इस तरह का अपराध करता होगा तो उसकी शिनाख्त  और गिरफ्तारी आसान हो जाएगी।