टेंशन और प्रदूषण बढ़ा रहा है बांझपन

देश में बांझपन की समस्या बढ़ रही है। बढ़ते प्रदूषण तथा तनाव के कारण ही देश में करीब १५ से २० प्रतिशत की आबादी आज इस समस्या से परेशान है। ऐसी जानकारी देते हुए फर्टिलिटी सलाहकार डॉ. ऋचा जगताप बताती हैं कि १८ से ३० साल की उम्र मातृत्व हासिल करने की सही उम्र होती है। ३० साल के बाद मातृत्व प्राप्त करने की समस्या बढ़ जाती है तो ३७ साल की उम्र में यह काफी जटिल हो जाती है।
आज देश में अधिकांश युवा अपना भविष्य बनाने की चिंता में समय पर शादी नहीं कर पाते हैं। अपने करियर के प्रति युवा पीढ़ी इतनी व्यस्त रहती है कि कई बार शादी की सही उम्र वह पार कर जाती है। देर से होनेवाली शादी के साथ ही युवा पीढ़ी में बढ़ते तनाव और प्रदूषण के चलते उन्हें अपने वैवाहिक जीवन में मातृत्व के सुख की समस्या का सामना करना पड़ता है।
मातृत्व का सुख प्राप्त करने के लिए फिर आईवीएफ तकनीक का सहारा लिया जाता है। नोवा इवी फर्टिलिटी की डॉ. जगताप बताती हैं कि आईवीएफ तकनीक से १०० फीसदी बांझपन से मुक्ति मिल जाएगी, ऐसा कहा नहीं जा सकता है। कई बार दो-दो बार आईवीएफ का सहारा लेने के बाद भी पति-पत्नी को मातृत्व का सुख नहीं मिल पाता है क्योंकि उनमें रिकरेंट इंप्लांटेशन की असफलता पाई जाती है। आईवीएफ का सहारा लेने के बाद भी बांझपन दूर नहीं हो पाता है क्योंकि सही समय पर भ्रूण को स्थानांतरित नहीं किया जाता है। इस सही समय की जानकारी के लिए अब एक और नई तकनीक का प्रयोग किया जाता है। पिछले तीन-चार साल से इंडोमेट्रियल रिसेप्टिविटी एरे तकनीक का इस्तेमाल कर उनकी परेशानी का निदान किया जाता है। इट्रोमेट्रियल की ग्रहणशीलता के लिए सही समय की जानकारी मिलती है। इसे ‘विंडो ऑफ इंप्लांटेशन’ कहते हैं। ईआरए की जांच के बाद आईवीएफ तकनीक में गर्भधारण की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। बांझपन को दूर करने के लिए आजकल इस नई तकनीक का इस्तेमाल देश में किया जा रहा है। हालांकि यह समस्या युवा पीढ़ी खुद भी दूर कर सकती है यदि वह शादी की उम्र में ही शादी कर ले क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ यह समस्या बढ़ती है।