ठोकतंत्र

हमारे देश में ठोकतंत्र है। यह शक्तिशाली लोगों द्वारा, अशक्त लोगों के लिए चलाया जाता है। कुछ लोगों को ऐसी गफलत होती है कि देश में लोकतंत्र है लेकिन वे भारी भूल करते हैं। इस देश में सब कुछ हो सकता है लेकिन लोकतंत्र कभी नहीं हो सकता। हमलोग कभी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के आदी नहीं हो सकते। आदि काल से हमारी जनता व्यक्ति पूजा की आदी रही है। व्यक्तिपूजा की आदत हम सभी के व्यक्तिगत ईश्वरों की निर्मात्री है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोग खुद अपना शासक चुनते हैं पर मानसिकता यही होती है कि ऐसा व्यक्ति चुना जाए जो लोकतंत्र की आड़ में ठोकतंत्र को सुचारु रूप से क्रियान्वित कर सके। गालों पर तमाचे खाते ही हम मारनेवाले के प्रति आदर और भय के भाव से भर जाते हैं। अगर सामनेवाला विनम्र भाव से बोले और सरल स्वभाव का हो तो उसे दो कौड़ी का समझने में हम तनिक भी देर नहीं लगाते। दबंग और अपराधी प्रवृत्ति के लोग जल्दी ही हमारे नेता बन जाते हैं क्योंकि वे हमें अपने तारणहार लगते हैं।
जिसकी लाठी उसकी भैंस का फलसफा हमारे दिलों दिमाग पर ऐसे ही छाया रहता है, जैसे नेताओं के दिमाग पर घोटालों की योजनाएं! किसी के हाथ में लाठी देखते ही हमारा मन भैंस होने के लिए मचलने लगता है। कर्तव्य परायण भैंस वह होती है, जो मालिक के खूंटे के साथ अपना अनन्य भाव और तारतम्य बनाए रखे और दुहे जाते समय कृतज्ञ मुद्रा बनाए रखे। ठोकतंत्र मालिक और भैंस के इन्हीं ठोस संबंधों की परिणति है। कभी-कभी भैंसों का मालिक नितांत गऊ टाइप का इंसान होता है लेकिन उसे भी दूध देने में भैंस एतराज करे या दुहाई में अड़चन उत्पन्न कर तो वह उसके मुंह पर दो हत्थड़ जड़ने में विलंब नहीं करता। आदर्श भैंस इसका बुरा भी नहीं मानती क्योंकि वह ठोकतंत्र की समर्थक होती है।