" /> डरने नहीं लड़ने की जरूरत! कोरोना का कहर

डरने नहीं लड़ने की जरूरत! कोरोना का कहर

पूरी दुनिया में कोरोना वायरस की ही चर्चा है। देश-विदेश, शहर, गांव-देहात हर जगह सिर्फ और सिर्फ कोरोना ही सुर्खियों में छाया है। पिछले दिसंबर से चीन के वुहान से उत्पन्न हुए इस वायरस की जड़ें अब पूरे संसार में पैâल चुकी हैं। हजारों लोगों को लील चुका है, लाखों को चपेट में लिए हुए है। हिंदुस्थान में भी दस्तक देकर चारों तरफ खलबली मचा दी है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब किसी बीमारी ने रंगोत्सव यानी होली त्यौहार में खलल डाला हो। होली के मौके पर राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री से लेकर कई मंत्रियों, पक्ष-विपक्ष के नेताओं, अधिकारियों, कॉर्पोरेट व सामाजिक स्तर के लोगों द्वारा होली मिलन कार्यक्रम आयोजित होते आए हैं। लेकिन इस बार इन सबने अपने-अपने कार्यक्रमों को निरस्त कर दिया है। कारण, कोरोना वायरस का घनघोर रूप से पैâला हौवा! इस वायरस ने पूरे संसार में हंगामा काटा हुआ है। हमारा देश बचा हुआ था, पर अब इस तरफ भी कोरोना अपना रुख कर चुका है। हिंदुस्थान में भ्रम ऐसा पैâला हुआ है कि कोरोना का वायरस हाथ मिलाने मात्र से इंसानी शरीर में प्रवेश कर जाता है। हम हिंदुस्थानियों के लिए इतना ही डर काफी है? होली मिलन समारोह में लोग हाथ भी मिलाते हैं और गले भी लगते हैं। इसी डर से लोगों ने होली समारोह को टाल दिया।
सरकारी स्तर पर जबसे प्रोग्रामों के वैंâसिल होने की खबर बाहर आई है। तब से माहौल और गर्मा गया है। वायरस ने सबसे बड़ी मार होली के त्यौहार पर मारी है। फागुन माह उल्लास से भरा होता है लेकिन उस उल्लास के रंग में भंग कमबख्त कोरोना ने डाल दिया है। भय ऐसा बैठा हुआ है, जिससे बाजारों से रंग-गुलाल व पिचकारियां सभी गायब हैं। अभिभावक अपने बच्चों को रंग नहीं खेलने की सलाह दे रहे हैं। होली हम हिंदुस्थानियों का बड़ा त्यौहार माना जाता है। यही एक ऐसा त्यौहार है जो रूठे हुए लोगों को आपस में मिलाने का काम करता है। होली के आगमन से कुछ दिनों पहले ही लोग तैयारियों में जुट जाते हैं। लेकिन इस बार सब कुछ फीका-फीका हो गया है। शहरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी कोरोना ने खलबली मचाई हुई है। वहां भी कमोबेश ऐसा ही माहौल है। दिल्ली के बड़े बाजारों के रंग व्रिकेता भी परेशान हैं। उनकी ब्रिकी ठप्प हो गई है। दुकानदार बताते हैं कि सरकार ने कोरोना का ऐसा हव्वा बना दिया है कि लोग रंगों का ऑर्डर नहीं कर रहे, जबकि हर साल लोग होली से पहले ही रंगों का ऑर्डर करते थे। रंगों का बाजार करोड़ों-अरबों में होता था पर इस बार सूना है। कइयों की रोजी-रोटी पर भी बात आन पड़ी है।
एक वक्त था, जब काला बुखार और अचानक जन्मी बीमारियों से वैद्य-हकीमों के झांड़-फूंक से निजात मिल जाता था। लेकिन इस बार बात उससे आगे निकल चुकी है। बहरहाल, वायरस पर काबू पाने के लिए दिल्ली में मंत्री समूहों के बीच बैठकों का दौर युद्धस्तर पर जारी है। इसके बावजूद कोरोना का कहर रुकने का नाम नहीं ले रहा। रोजाना वायरस के संक्रमण के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। पिछले सप्ताह दिल्ली और तेलंगाना में एक-एक मामले सामने आए, लेकिन दूसरे एक साथ दो दर्जन मामले दर्ज हुए। उसके बाद हेल्थ विभाग के भी हाथ-पांव फूल गए। कोरोना से पहले भी कई वायरसों का हमने मुकाबला किया। पिछले साल निपोह वायरस ने भी तांडव मचाया था, जो कुछ दिनों बाद शांत हो गया था। हिंदुस्थान में बीते शनिवार तक ३४ मामले दर्ज हुए, जिसका सिलसिला जारी है। रंगोत्सव के माहौल में वायरस के लगातार बढ़ते मामलों को देखकर देशवासियों की चिंता बढ़ गर्इं है। दिल्ली में प्राइमरी स्तर के स्कूलों को बंद कर दिया गया है। फिलहाल, बीमारी पर काबू पाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें अपने स्तर पर हर कोशिश कर रही हैं और कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहीं। सभी राज्यों के मुख्यमंत्री अलर्ट पर हैं, गहन निगरानी कर रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हालात पर नजरें बनाए हुए हैं। इस बावत उन्होंने टीवी पर जागरूकता संदेश भी दिया है। केंद्रीय मंत्रियों के साथ उनकी लगातार समीक्षा बैठकें हो रही हैं। दिल्ली में उनके नेतृत्व में सात-आठ मार्च को दो आपात बैठकें भी हुर्इं। बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे और संबंधित विभागों के बड़े अफसर शामिल थे। बैठक में सभी मंत्रियों ने पीएम को एक-एक करके रिपोर्ट दी। मंत्रियों ने बताया कि कोरोना की रोकथाम और संक्रमित लोगों के उपचार के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जा रहे हैं।
पिछले तीन-चार दिनों में मैंने खुद दिल्ली के बड़े अस्पतालों का दौरा किया। अपनी आंखों से सब कुछ देखा। जो देखा वह बहुत दुखद और भयावह था। दरअसल, कोरोना के चपेट में जो लोग आए हैं उनका हाल बहुत बुरा है। उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया जा रहा है। दिल्ली के तकरीबन सभी बड़े सरकारी अस्पतालों में कोरोना से ग्रस्त मरीजों के लिए अलग वॉर्ड बनाए गए हैं। जिन अस्पतालों में कोरोना के पीड़ित भर्ती हैं उन्हें लोग दूर से ही देखते हैं, कोई पास नहीं जाता। तीमारदारों का अपने मरीजों से मिलने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। मेडिकल स्टॉफ के लोग भी डर-डर कर उनके पास जाते हैं। इंजेक्शन, बोतल लगाकर तुरंत बाहर भाग आते हैं। दिन हो या रात, मरीज वॉर्डों में अकेले ही होते हैं। किसी चीज की जरूरत होने पर मरीज आवाजें देते रहते हैं, कोई उनके पास नहीं जाता। मरीजों को कब दवा देनी है, उसका बाकायदा चार्ट बना हुआ है। तय वक्त पर मेडिकल स्टॉफ मरीजों के पास जाते हैं, वरना नहीं? ऐसा लगता है वह अपनी डयूटी मजबूरी में निभा रहे हैं। जैसे किसी भूत से लोग डरते हैं वैसे ही कोरोना के पीड़ितों से डर रहे हैं। दरअसल, कोरोना वायरस का डर लोगों के भीतर जबरदस्त बैठ गया है। कोरोना के भय के चलते ही सभी हवाई अड्डों, बंदरगाहों और दूसरे देशों को जोड़नेवाली सड़कों पर निरंतर सतर्कता और निगरानी बरती जा रही है। हम सभी देशवासियों को इस समय थोड़ा संयम बरतने की जरूरत है। जनता और सरकार के बीच प्रभावी समन्वय भी हो, इसकी भी आवश्यकता है। वायरस से डरने की बजाय लड़ने की जरूरत है। सरकार के अलावा जनता की भी जिम्मेदारी बनती है कि जहां तक संभव हो सामूहिक समारोहों में जाने से बचें और क्या करें और क्या ना करें को लेकर दूसरे लोगों में जागरूकता पैâलानी चाहिए। निश्चित रूप से इंसानी जीवन त्यौहारों से बढ़कर होता है। खुद को और दूसरों को बचाने का प्रयास ही मानवीय धर्म है इसलिए कोरोना से बचाव के जो सुझाव हुकूमतों द्वारा दिए जा रहे हैं, उनका पालन करना चाहिए।