‘डार्क’ शीट के अच्छे दिन

इन दिनों परीक्षा परिणामों का दौर जारी है। छात्र मार्कशीट के साथ अभिभावकों के समक्ष हैं। किसी को उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए प्रशंसा मिल रही है तो किसी को अपेक्षित सफलता न मिल पाने पर नसीहत। मेरे मित्र के साहबजादे भी अपनी ‘हस्तलिखित’ मार्कशीट लेकर पिता के समक्ष पेश हुए। मार्कशीट देखते ही मित्र का माथा ठनका। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, गणित और भाषा की जगह वहां स्पोर्टिंग, फीलगुड, हेल्पफुल, एंटरटेंनिंग और कॉन्फिडेंट जैसे विषय दर्ज थे। अंकों के स्थान पर अजीबो-गरीब ग्रेड दिए गए थे। इस पर आगबबूला मेरे मित्र ने जब सुपुत्र से कारण पूछा तो उसने प्रफुल्लता से बताया कि इम्तिहान में फेल होकर भी असफलता को ‘खेल भावना’ से लेने पर दोस्तों ने उसे बतौर स्पोर्टिंग पर्सन ‘एस’ ग्रेड दिया। अन्य फेल हुए निराश दोस्तों को अपने टेलेंड से फीलगुड कराया तो उसे ‘एफ-प्लस’ ग्रेड मिला। पिछली छमाही भर दोस्तों को लिफ्ट देकर या बेस्ट मूवी-रेस्त्रां की हेल्पफुल सलाह देकर उसने ‘एच-प्लस’ ग्रेड हासिल किया। सालभर वो उदास मित्रों का एंटरटेनमेंट करता रहा, इस नाते उसे एंटरटेनिंग कैटेगिरी में ‘ई’ ग्रेड मिला। उसने बीसियों मित्रों में आत्मविश्वास जगाने के लिए ‘स्टंट स्किल’ से उनका कॉन्फिडेंस बढ़ाया तो वो ‘सी-प्लस’ का हकदार बना। इतना ही नहीं उसने बताया कि उसकी इस उपलब्धि से कॉलेज की ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ भी बेहतर हो गई। पुत्र की इस बेतुकी ग्रेडिंग और ऊटपटांग जवाब पर मित्र का माथा भन्नाया। खिसियाहट में वे उसे पीटने दौड़े। पिता की झल्लाहट देख तब माहौल को साधते हुए पुत्र ने धीरे से पूछा, ‘‘जब कोई राजनैतिक दल ‘चुनावी परीक्षा’ में अलग-अलग विषय चुनकर, उसी के पर्चे देने का आभास कराकर परीक्षा परिणाम में ऐसी ही ‘अलौकिक-काल्पनिक’ मार्कशीट से पास कहला सकता है तो मेरी इस मार्कशीट पर झल्लाहट क्यों? जब १२५ करोड़ लोगों को सरकार की इस ‘कलाकारी’ पर आपत्ति नहीं होती तो एक छात्र की मार्कशीट पर अभिभावक को क्यों?’’ छात्र का सवाल सीधा था और बेहद तर्कसंगत भी। जिसका जवाब मेरे मित्र को अब तक नहीं मिला है। निश्चित तौर पर देश को भी नहीं मिला होगा।
२०१४ में भारतीय जनता पार्टी ने भी लोकसभा की चुनावी परीक्षा ‘सार्थक’ विषयों पर देने का ही वादा किया था, पर उसकी चार सालाना ‘सरकारी मार्कशीट’ में उन विषयों पर प्रगति के अंक ही नहीं दिखे। इस बार भी मार्वâशीट ‘फीलगुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ की तरह काल्पनिक ग्रेडिंग से पटी है। १०० नए शहर, अति पिछड़े १०० जिलों का विकास, हरेक को घर-बिजली-शौचालय व नल का पानी, गांवों का समग्र विकास, उनमें शहरों जैसी सुविधाएं, कुटीर-लघु उद्योगों के पारंगत कारीगरों व असंगठित क्षेत्र के विकास की गारंटी, मनरेगा की उत्पादकता, राष्ट्रीय गैस ग्रिड, राष्ट्रीय वाईफाई नेटवर्वâ, हीरक चतुर्भुज रेल परियोजना, कृषि और पर्यटन के लिए रेल नेटवर्वâ बनाने जैसे संकल्पित विषयों पर ‘पारदर्शी प्रगति’ सरकार इस मार्कशीट में दर्ज करना ही शायद भूल गई। महंगाई पर नियंत्रण के लिए अलग कोष, जमाखोरी-कालाबाजारी रोकने के लिए विशेष अदालतें व त्वरित दंड, भ्रष्टाचार निर्मूलन, व्यवस्था सरलीकरण, रोजगार केंद्रों को कैरियर केंद्र में बदलने, उद्यमिता विकास और कारगर ऋण सुविधा देने जैसे तमाम विषय भी मार्कशीट में ‘सफाई’ से साफ हो गए। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, बलात्कार व एसिड पीड़िताओं के कॉस्मेटिक-मेडिकल खर्च उठाने का भरोसा, व्यवस्था में महिलाओं का प्रमाण बढ़ाने, उनके सशक्तीकरण और संसद तक में ३३ फीसदी आरक्षण की प्रतिबद्धता, चुनाव पूर्व भाजपा के ही तो मुख्य विषय थे। इसी तरह एससी/एसटी/ओबीसी और आदिवासी-अल्पसंख्यक कल्याण विषय में तो मेरिट के वादे थे। सीमा क्षेत्र पर विशेष ध्यान, आतंक के खिलाफ कठोर नीति, वरिष्ठ नागरिकों-शारीरिक अक्षमों व युवाओं पर विशेष ध्यान, स्वास्थ्य, टैक्स सरलीकरण, किसानों का उत्थान, राष्ट्रीय ऊर्जा नीति, औद्योगिक विकास, पूर्व सैनिकों समेत देश के हर वर्ग-हर हिस्से को खुशहाल करना उन्हीं के चुनावी विषय थे न? तो फिर उन्हें मार्कशीट में जगह क्यों नहीं मिली? क्या उनके भी पर्चे गुम हो गए?
आज ४ साल बाद विज्ञापन की शक्ल में जिन ५४ सरकारी उपलब्धियों की मेगा मार्कशीट आई है, उसमें से भाजपाई परीक्षार्थियों के मूल विषय ही गायब हैं। हां, मार्कशीट में शामिल नए विषयों में पुरजोर ढंग से मोदी सरकार को अच्छे अंकों से पास दिखाया गया है। हालांकि विषय मात्र वही मित्र के सुपुत्र की मार्कशीट जैसे ही हैं। मसलन, ‘भारत में पहली बार एसी ट्रेनों की तुलना में हवाई यात्रियों की संख्या बढ़ी’, ‘पूरे विश्व में योग को उत्साह से अपनाया गया’, ‘नोटबंदी से अब तक के सबसे ज्यादा काले धन का पर्दाफाश’, ‘किसान की संपन्नता हमारी प्राथमिकता’, ‘किसानों की आय दोगुनी करने के बहु-आयामी प्रयास’, ‘२०१७-१८ रेल सुरक्षा की दृष्टि से सबसे अच्छा साल’, वगैरह…वगैरह। इन विषयों के मूल्यांकन का मापदंड क्या था, यह तो सरकार ही जाने पर उनकी ‘उन्नति’ छात्र की ग्रेडिंग की तरह ही है। अटपटे विषय और भी हैं, जैसे ‘दुनिया देख रही है एक न्यू इंडिया’, ‘युवा ऊर्जा से बदलता देश’, ‘पब्लिक, प्राइवेट और पर्सनल सेक्टर में युवाओं को आगे बढ़ने के मजबूत अवसर’। इनके अलावा कुछ अन्य विषयों में भी सरकार को ‘ए’ ग्रेड से पास दिखाया गया है, जैसे, ‘मोदीजी के नेतृत्व में देश नई ऊंचाइयों को छू रहा है’, ‘युवाओं को आगे बढ़ने के मजबूत अवसर’, ‘भारत बना विकास का वैश्विक केंद्र’, ‘हर गांव तक बिजली पहुंचाई’, ‘स्वच्छ भारत मिशन सफल’, ‘कामयाब उज्ज्वला स्कीम’ और ‘प्रधानमंत्री आवास योजना में एक करोड़ घर’ अब इन विषयों पर सरकार कितनी पास है और कितनी फेल, यह तो जनता ही बेहतर जानती है। शायद इसीलिए सरकार भी मार्कशीट में इनकी ग्रेडिंग से बचती दिखी। असल में विकास के पैमाने पर ऐसे ‘हवाई’ दावों की असलियत को मापा नहीं जा सकता। परंतु कुछ सच्चाइयां ऐसी होती हैं, जिन्हें लाख छिपाने के बावजूद उनकी गंध आ ही जाती है। केंद्र सरकार की ४ सालाना मार्कशीट भी इससे अलहदा नहीं है। सरकार ‘स्वच्छ भारत’ के दावे ठोंक रही है और लोग शौचालय की खोज में पटरियां रंग रहे हैं। मार्कशीट में सरकार के तमाम ‘कागजी’ दावों का कोई ‘आधार’ नहीं है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘नमामि गंगे’, ‘स्मार्ट सिटी’, ‘५ करोड़ रोजगार’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ जैसे सभी बड़े विषयों में सरकार जनता की परीक्षा में फेल हो चुकी है। इसीलिए उनके मार्क छिपाए जा रहे हैं। इस ‘पारदर्शक’ सरकार को ‘पारदर्शिता’ से मार्कशीट में इन विषयों की प्रगति छापनी चाहिए थी। वैसे भी विज्ञापनबाजी में इस सरकार का प्रदर्शन अन्य सरकारों से कहीं बेहतर है। केवल केंद्र सरकार ने ही इस मद में ४ वर्षों में ३,७५० करोड़ का अधिकृत खर्च कर दिया। पार्टी और प्रदेश सरकारों का खर्च अलग से। उन्हें भी जोड़ लिया जाए तो भाजपा का इस चुनावी वर्ष का अंदाजित विज्ञापन खर्च १० हजार करोड़ से कम नहीं होगा। इतने पैसे जनता के किसी एक विषय को परवान चढ़ा सकते थे।
देश को हर्ष होता यदि मार्कशीट में विषयों पर प्रगति कुछ इस प्रकार होती। जैसे पीओके वापस लिया गया, बलोचिस्तान बना, सीमा पर सैनिक सुरक्षित, भारतीय सेना का दबदबा पूरी दुनिया में कायम, कश्मीर में शांति बहाल, कश्मीरी पंडित वापस लौटे, आपसी जल-सीमा विवाद निपटे, २० नए बांध बनाए, १,५०० किलोमीटर नहरें बनीं, ५ हजार फैक्ट्रियां-कारखाने खुले, ४५ एम्स, आईआईटी और आईआईएमएस खुले, ५५ विश्वविद्यालयों की नींव रखी गई, नवरत्न कंपनियां और ताकतवर बनीं, उनमें और सेक्टर जोड़े गए, इसरो जैसे ५ कामयाब संगठनों की नींव रखी, पिंक रेवोल्यूशन खत्म हुआ, ग्रीन और वाइट रेवोलुशन बुलंदी पर, देश में उद्योग-धंधों का नेटवर्क मजबूत, बैंकों की स्थिति सुदृढ़, १० लाख करोड़ विदेशी निवेश आया, खाद्यान्न में आत्मनिर्भर, कुपोषण खत्म, गरीबी का समूल नाश, आयात घटा, निर्यात बढ़ा, रुपया मजबूत, देश में हवाई जहाज-हेलिकॉप्टर और तमाम अत्याधुनिक चीजें बनने लगीं, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में हिंदुस्थान आने की होड़, चंद्रयान-मंगलयान मिशन जैसे बीसियों मिशन कामयाब, अंतरिक्ष पर दबदबा कायम, जीएसएलवी-पीएसएलवी जैसे तमाम ताकतवर रॉकेट बनाए गए, नासा को पीछे छोड़ा, निजी स्पेस एजेंसियां हिंदुस्थान में, मेट्रो-हाई स्पीड रेलों का जाल बिछा, न्यूक्लियर पनडुब्बियां, विमानवाहक पोत हम खुद बनाने लगे, हमारी मिसाइलें-ड्रोन और टैंक खरीदने की वैश्विक होड़ मची, सब ‘मेक इन इंडिया’ हुआ इसी के साथ शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार का जिम्मा सरकार का, प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री और उनके तमाम मंत्रियों ने राजनीतिक प्रचार-प्रसार से तौबा की, न्याय व्यवस्था अप्रभावित, चुनाव व्यवस्था निष्पक्ष, कुल मिलाकर ‘राम-राज’ आ गया। ऐसा कुछ भी हुआ? नहीं।
विगत सरकारों के नाम जिस तरह की उपलब्धियां दर्ज हैं, वैसी एक भी उल्लेखनीय उपलब्धि ‘अच्छे दिनों’ वाली इस सरकार के पास गिनाने को नहीं है। हां, अच्छे दिनों की बात ४ सालों तक लगातार होती रही पर एक ही झटके में नोटबंदी से जनता की जेब खाली हो गई। अच्छे दिनों का सपना दिखाया जाता रहा पर रोजगार किसी को नहीं मिला। अच्छे दिनों के बड़े-बड़े दावे हुए पर जीएसटी ने बुरी तरह जकड़ लिया। अच्छे दिनों का ढोल पिटता रहा पर महंगाई ने गिरेबान छोड़ा ही नहीं। चार वर्षों तक जनता सरकार से वादापरस्ती की अपेक्षा ही करती रही और न जाने कब ‘अच्छे दिन’ की सरकारी परिभाषा ही बदल गई। जनता को समझा दिया गया कि तमाम मोर्चों पर आपके त्याग और बलिदान के बूते ही तो ‘अच्छे दिन’ आएंगे, त्याग ही अच्छे दिनों का ‘आधार’ है। इसलिए आधार कार्ड बनवाया गया, पर जनता तब भी निराधार ही रही। उसे बैंक खातों से जोड़ा गया, पर बचत के सारे रास्ते बंद कर दिए गए। एलपीजी कनेक्शन, मोबाइल फोन, पैन कार्ड भी ‘आधार’ की निगरानी में आ गए, पर कहानी तब भी नहीं बदली। तमाम सरकारी कामकाज को ‘आधार’ दे दिया गया, पर डाटा की सुरक्षा नहीं हो सकी। बच्चों की शिक्षा, ऑफिस का कामकाज सब ‘आधार’ आधारित हो गया, पर अच्छे दिनों की झलक तक नहीं दिखी। जनता को लगा कि केवल नोट बदलवाना, बदले नोटों का हिसाब देना, सारे पैसे बैंक में रखना, जरूरत के समय निकाल न पाना, एटीएम का सीमित उपयोग करना, ज्यादा रकम निकासी पर दंड भरना, बैलेंस कम हो तो पेनाल्टी देना, ज्यादा हुआ तो टैक्स देना, बैंक डूबी तो जेब से नुकसानभरपाई करना, अपने ही पैसों के लिए गिड़गिड़ाना, आमदनी न हो तब भी सख्ती से रिटन्र्स भरना, गैस सब्सिडी सरेंडर करना, हर सेवा-सर्विस पर कर देना, जीवन बीमा-मेडिक्लेम की राशि पर भी जीएसटी भरना, अपने ही जीवन को सुरक्षित व निरोगी रखने के प्रयासों पर भी जबरन ‘जजिया कर’ देना, शायद यही सब ‘अच्छे दिन’ होते होंगे। खैर, तमाम वादाखिलाफी के बावजूद सफलतापूर्वक ४ साल का कार्यकाल पूरा करना भी ‘अच्छे दिनों’ वाली इस सरकार के लिए अच्छे दिनों से कम नहीं है। जिस सरकार ने ४ वर्षों तक ‘अच्छे दिनों’ का कोई अच्छा मुकाम हासिल न किया हो, फिर भी जनता उससे ‘अच्छे दिनों’ की उम्मीद पाले रखे, ये भी क्या किसी सरकार के लिए ‘अच्छे दिन’ से कम है। अच्छे दिन-अच्छे दिन के जुमले पेंâकते-पेंâकते यह सरकार कब केंद्र से तमाम राज्यों तक अच्छे से पैâल गई, इसका अंदाजा तो ‘अच्छे दिनों’ वाली इस ‘डार्वâ’शीट में अच्छे से ढूंढ़ने पर भी जनता को नहीं मिल पाया है।