डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जन्मस्थान स्मारक के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ा?

फिलहाल इंदु मिल में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का भव्य स्मारक बनाने के लिए भीमसैनिक प्रतिबद्ध हैं। उसी प्रकार का संघर्ष डॉ. बाबासाहेब आंबडेकर के महू स्थित जन्म स्थान के लिए भी करना पड़ा लेकिन जब सरकार ने इस संदर्भ में तैयारी दिखाई तब तक आर्मी वैंâटोनमेंट-महू स्थित सील किया हुआ उनका घर पूरी तरह से ढह चुका था। उस समय भीमसैनिक बाबासाहेब पर श्रद्धा जताते हुए उनके घर की पवित्र र्इंट और पवित्र मिट्टी पूजन हेतु वहां से ले गए और अब सरकार ने वहां १०० करोड़ रुपए खर्च करके भव्य स्मारक तैयार किया है। हालांकि दुर्भाग्यवश इस स्मारक के लिए लड़नेवाले भंते धैर्यशील इस स्मारक को देखने के लिए जीवित नहीं रहे।
मध्य प्रदेश स्थित महू मंडालेश्वर राज्य महामार्ग से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित तत्कालीन ब्रिटिश इंडियन आर्मी के महार रेजीमेंट में सूबेदार पद पर कार्यरत रामजी मालोजी सकपाल के आर्मी वैंâटोनमेंट के फलटन वसाहत में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का १४ अप्रैल १८९१ को जन्म हुआ। लगभग दो साल बाद रामजी सकपाल सेवानिवृत्त हो गए और सातारा चले गए। बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण के बाद कई वर्ष उनका महू स्थित जन्मस्थान अनदेखा रहा। वर्ष १९४२ में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एक केस के संदर्भ में इंदौर गए थे। उस समय महू सात रास्ता में एक महासभा को संबोधित करते समय कई लोगों ने उनसे पूछा कि बाबासाहेब आपका जन्म कहां हुआ था? उस वक्त बाबासाहेब ने उत्तर दिया कि इस वैंâटोनमेंट में कहां हुआ है, यह नहीं पता। डॉ. बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण के बाद देश में कई जगहों पर उनकी प्रतिमाएं और स्मारक बनाए गए लेकिन उनका मूल जन्मस्थान महापरिनिर्वाण के बाद भी कई सालों तक दुर्लक्षित था। महू के आर्मी वैंâटोनमेंट में नागपुर के मूल निवासी डी.जी. खेवले गैरेजिन इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। वर्ष १९७१ में उन्हें बौद्ध परंपरानुसार अपने घर एक भिक्षुक की आवश्यकता थी। उन्होंने पूरे महू और इंदौर में बौद्ध भिक्षुक को खोजा लेकिन उन्हें एक भी भंते नहीं मिला। तब उन्होंने नागपुर-भंडारा से भंते धैर्यशील को बुलाया। बौद्ध परंपरानुसार उन्होंने अपने घर पर अनुष्ठान करवाया। इसके पश्चात जब खेवले भंते को धम्मदान (दक्षिणा) देने लगे तब भंते धैर्यशील ने कहा कि मुझे आप से धम्मदान नहीं चाहिए बल्कि आप मेरी एक इच्छा पूरी करो। आप मुझे आर्मी वैंâटोनमेंट के उस स्थान पर ले चलो, जहां बाबासाहेब का जन्म हुआ था। इस पर खेवले ने कहा कि मैं गत १५ वर्षों से यहां रह रहा हूं लेकिन मुझे इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। जिस बाबासाहेब ने पूरे समाज का उद्धार किया, उस बाबासाहेब का जन्मस्थान यदि दुर्लक्षित रह गया तो मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं है, ऐसा संकल्प करते हुए भंते धैर्यशील ने इस संदर्भ में केंद्र सरकार से पत्र व्यवहार शुरू किया। ६ महीने में तीन बार दिल्ली जाकर उन्होंने रक्षा विभाग से बातचीत की। इस दौरान उन्हें पता चला कि आर्मी के तत्कालीन काली फलटन महार बटालियन बस्ती में बाबासाहेब का जन्म हुआ था। इस जानकारी के पश्चात उन्होंने महू में रहनेवाले बौद्ध धर्मावलंबियों को एकत्रित किया और एक बोर्ड तथा नीला झंडा बाबासाहेब के जन्मस्थान पर ले गए। उस वक्त वहां मौजूद सैनिकों ने वह बोर्ड व झंडा निकालकर फेंक दिया और भंते को भगा दिया। तत्पश्चात भंते धैर्यशील बीमार पड़ गए। यह जानकारी जब डी.जी. खेवले को मिली तब उन्होंने तत्कालीन बिग्रेडियर से मिलकर सारी बातें बतार्इं। इस पर काले ने क्षमा मांगते हुए उन्हें बताया कि यह जगह सेना के अधीन है। यहां पर कोई भी शहरी व्यक्ति किसी भी प्रकार का अतिक्रमण नहीं कर सकता। उन्होंने सलाह दी कि नियमानुसार संस्था को पंजीकृत कर रक्षा विभाग से इस जगह को अपने कब्जे में लेने की मांग की जा सकती है। तब तक जिस घर में बाबासाहेब ने जन्म लिया था, उस घर को नासिक के बिग्रेडियर काले ने सील कर दिया। लगभग १८ सालों तक बाबासाहेब का घर सेना ने सील कर रखा था। वर्ष १९८३ में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने २२ हजार ५०० वर्ग फुट जगह ३६ वर्ष के अनुबंध पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मेमोरियल सोसायटी के नाम पर देने का आदेश रक्षा विभाग को दिया। इस संस्था के अध्यक्ष भंते धैर्यशील थे। १४ अप्रैल १९९१ को बाबासाहेब का अभिवादन करने के लिए कई लोग भंते धैर्यशील के नेतृत्व में महू स्थित बाबासाहेब के जन्मस्थान पर उपस्थित थे। इस दौरान १८ सालों से बंद पड़े घर की छत और दीवारें गिर चुकी थीं। उस समय वहां उपस्थित एक अनुयायी ने वहां की मिट्टी और र्इंट पूजन के उठा ली। थोड़ी ही देर में वहां उपस्थित सभी लोग टूटी हुई छत के टुकड़े, र्इंट और मिट्टी पूजा के लिए उठाने लगे। इसके बाद वहां केवल एक पेड़ और छोटा स्नानघर रह गया था। उसे तोड़कर आज महू स्थित मिलिट्री वैंâटोनमेंट में बाबासाहेब का भव्य स्मारक तैयार हो चुका है।