" /> तनाव के शिकार

तनाव के शिकार

मराठी में एक कहावत है ‘मन चिंती ते वैरी न चिंती’ इसका भावार्थ ये है कि मन ऐसी चिंता करता है कि दुश्मन भी वैसी चिंता न करे। कोरोना के बढ़ते संकट काल में जीना असहनीय होने के कारण आम जनता इस कहावत का लगातार अनुभव ले रही है। असहनीय तनाव से अवसाद का जन्म होता है और आत्महत्या के रूप में मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। इसे कोरोना का साइड इफेक्ट कहें या कुछ और, लेकिन काम न होने और उससे बनी आर्थिक कमी ने बहुत मानसिक तनाव पैदा किया। इस तनाव के कारण न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश में आत्महत्या का दौर शुरू हुआ दिख रहा है। पुणे में भी यही हुआ। पुणे के सुखसागर नगर इलाके में रहनेवाले एक ही परिवार के चार सदस्यों ने बुधवार की रात अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर दी। छह और तीन साल की उम्र के दोनों बच्चों के गले में फंदा डालकर उनकी हत्या करने के पश्चात उनके माता-पिता ने भी आत्महत्या कर ली। इस दंपति में अपने बच्चों का गला घोंटने की क्रूरता कैसे आई होगी? मन ही क्या, दुश्मन भी ऐसा विचार कभी नहीं करेगा। पुलिस ने जब दरवाजा तोड़कर देखा तो चारों के शव घर में लटके हुए थे। परिवार के कमाऊ व्यक्ति का स्कूल के पहचान पत्र बनाने का व्यवसाय था। लेकिन लॉकडाउन के कारण व्यवसाय ठप पड़ गया और उसने जीवन की पहचान ही समाप्त कर दी! इस तरह की ये एकमात्र घटना नहीं है। पुणे में धायरी क्षेत्र के एक मंडप व्यापारी ने भी इसी तरह फंदे से लटक कर जान दे दी। लॉकडाउन के कारण एक भी पैसे का व्यापार नहीं हो रहा था। समारोह, उत्सव और शादियां सब बंद हैं। जैसे-जैसे वित्तीय संकट गहराता गया, उसने आत्महत्या का रास्ता चुना। पुणे के पास वाकड़ में, एक ही दिन में तीन आईटी इंजीनियरों ने अपनी जान दे दी। उन्होंने हताशा के कारण आत्महत्या कर ली, ऐसा कहा गया। यह भयानक है। कोरोना संक्रमण के कारण देश में लॉकडाउन होने से सभी राज्यों में आर्थिक संकट बढ़ा और अवसाद से आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि हुई है। अमदाबाद में एक ही परिवार के छह सदस्यों के शव मिले। केरल में एक १४ वर्षीय छात्रा ने ऑनलाइन कक्षा में भाग लेने के लिए कंप्यूटर या स्मार्ट फोन नहीं होने के कारण आत्महत्या कर ली। मध्य प्रदेश के खंडवा के एक व्यापारी ने अपने ही गोदाम में अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। उत्तर प्रदेश के भामौरा गांव के एक २४ वर्षीय व्यक्ति ने क्वारंटाइन काल में ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। लॉकडाउन के दौरान भविष्य की चिंताओं के कारण पिछले एक-दो महीनों में कुछ लोगों ने नहीं, बल्कि ३०० से अधिक लोगों ने आत्महत्या की। इसमें बड़ी संख्या में गरीब लोग हैं। कोरोना के कारण देश में लॉकडाउन होने से पूरा आर्थिक व्यवहार ही ठप हो गया। भविष्य में मुनाफे का सपना देखनेवाले व्यापारियों की आशाएं और आकांक्षाएं चकनाचूर हो गर्इं। गरीब और मध्यम वर्ग ने खुद को आर्थिक तंगी के दुष्चक्र में पाया। गरीबों पर जो मिले वही खाने की नौबत आ गई। लॉकडाउन का संकट एक महीने में खत्म हो जाएगा, कहते-कहते ये तीन महीने तक चला। परिणामस्वरूप पहले से ही असहाय लोग और भी निराश हो गए। अब अनलॉक के बाद भले ही आर्थिक चक्र चल पड़ा हो, लेकिन कई व्यावसायिक क्षेत्र अभी भी ठप पड़े हैं। आगामी छह महीनों में व्यापार गति पकड़ेगा, इसको लेकर अब भी अनिश्चितता है। कारखानों के मालिक, व्यवसायी और उन पर आश्रित करोड़ों लोगों को ‘कल’ की चिंता सता रही है। अपना सब-कुछ खोने का डर एक भयानक मोड़ ले रहा है और कई परिवार अवसाद की गर्त में गिरते जा रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान ३०० लोगों ने आत्महत्या की, लेकिन कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि कितने हजार या लाखों लोगों ने आत्महत्या के बारे में सोचा होगा। कहीं घर के खर्चों के प्रबंधन का सवाल तो कहीं किराया देने की चिंता। लाखों लोगों को अपनी नौकरी जाने का डर है। इसलिए कोरोना के बिना भी लोग मौत को गले लगा रहे हैं। मानसिक तनाव के शिकार इन लोगों को कैसे रोका जाए? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। मानसिक तनाव दूर कैसे करें, इसके बारे में सोशल मीडिया पर आनेवाले संदेशों को पढ़ने से ये दूर नहीं होगा। प्रयासों के बावजूद कोरोना के कारण जानें जा ही रही हैं, लेकिन अगर कोरोना अपनी आजीविका से वंचित कर रहा है तो इसे कैसे रोकें, इस पर भी राष्ट्रीय स्तर पर मंथन होना चाहिए।