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तनाव बढ़ाता ईएमआई …नहीं तो बहुत देर हो जाएगी

जबसे कोरोना का कहर बढ़ा है तबसे देश का मध्यवर्ग सबसे अधिक परेशान है। मध्यवर्ग में सिर्फ नौकरी पेशे वाले ही नहीं शामिल हैं, इसमें वह सूक्ष्म लघु और मध्यम वर्ग के व्यापारी भी शामिल हैं जो भयंकर नकदी संकट से परेशान हैं। आसपास अब लोगों से सूचनाएं प्राप्त हो रहीं हैं कि किसी को अप्रैल महीने की आधी सैलरी प्राप्त हुई है तो किसी को कुछ नहीं प्राप्त हुआ है। देश का एक बहुत बड़ा नौकरीपेशा वर्ग ऐसा है जिसकी नौकरी का डेटा नहीं है और वह अस्थायी जॉब में हैं। ऐसे लोगों के जॉब पर ही संकट आ गया है। कई लोग तो उम्र के ऐसे पड़ाव पर है कि यदि उनकी नौकरी छूट जाती है तो वह अपने आपको किसी भी स्वरोजगार में असमर्थ पा रहे हैं क्योंकि उनके जीवन भर की अनुभव की कमाई दूसरे फिल्ड में है। एक प्रिंट मीडिया के मित्र ने बताया कि यदि हम लोगों की नौकरी गई तो हम लोग क्या करेंगे, जिन्दगी भर पत्रकारिता की है किसी और स्किल और व्यवसाय की तरफ देखा तक नहीं, ऐसे में यदि कोरोना ने मजबूर किया और नौकरियां जाने लगेंगी तो उन्हें स्वरोजगार के भी विकल्प नहीं सूझ रहें हैं और यह हाल लगभग बहुसंख्य में हर नौकरी वालों का है। मॉल और मल्टीप्लेक्स लगातार बंद होने से, ग्राहक व्यवहार में भी लगातार परिवर्तन होने से दुकानदार और उत्पादन इकाइयां अब खर्चे कम करने की सोच रहीं हैं। खर्च करने की सबसे पहली मार सबसे पहले स्थायी खर्चों पर पड़ रही है और उसमें भी सबसे पहले स्टाफ की छंटनी पर, व्यापारियों का कहना है कि ग्राहक कम होने से अब उन्हें कम आदमियों की जरूरत है और वैसे भी व्यापार का कुछ प्रतिशंत अब ऑनलाइन व्यापार में भी शिफ्ट हो गया है।
व्यापार के डायनामिक्स में यह बदलाव व्यापारियों एवं नौकरीपेशा वालों के कैश फ्लो को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। लोगों ने अपने जीवनस्तर में बदलाव करते हुए बहुत से खर्चों एवं पूंजीगत वस्तुवों के लिए गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों से ऋण ले लिया था और अब यही  गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान इनके गले पड़ गए हैं। ऐसे सैकड़ों प्रमाण हैं जिनमें गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के रिकवरी स्टाफ बुरी तरह से बैंक से ऋण लिए हुए इन समय के मारों को जिनके पास ना तो पैसे बचे हैं, ना नौकरी की गारंटी है। जो व्यापारी हैं, उनकी उम्मीद भी डाउन है कि पता नहीं भविष्य में माहौल कब नॉर्मल हो, के पीछे पड़ गए हैं। ऐसी महामारी में भी बैंक और गैरबैंकिंग वित्तीय संस्थान अपने आय का मीटर फुल स्पीड से चालू किये हुए हैं जबकि पूरे देश यहां तक कि सरकार के भी आय का मीटर काफी डाउन है। अगर इन पर लगाम नहीं लगाई गई, सरकार की तरफ से कोई नोडल ओफ्सर नियुक्त नहीं हुआ, जो यह देखे की सरकार और रिजर्व बैंक ने जो राहत प्रदान किए हैं, उसके लागू होने में ये गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों कोई अड़चन तो नहीं पैदा कर रहें तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है।
सरकार और रिजर्व बैंक लगातार कोशिश कर रहे हैं कि राहत मध्य वर्ग एवं नौकरीपेशा लोगों को नगदी राहत दी जाए इसलिए सरकार और रिजर्व बैंक ने २७ मार्च, १७ अप्रैल को, २० लाख करोड़ का पैकेज और दिनांक २२ मई को पुनः रिजर्व बैंक के गवर्नर आगे आकर प्रेस कांफ्रेंस कर पैकेज की घोषणा करते हैं। दुःख की बात यह है की ये सारे पैकेज बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान के द्वारा ही क्रियान्वित होने हैं और ये बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों एक गाढ़ी छननी हो गए हैं जो सरकार द्वारा दी गई राहत को अपनी छननी में ही रोक ले रहे हैं और नीचे तक पहुंचने ही नहीं दे रहे हैं।
लोगों से बातचीत में पता चला कि गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों ने बाकायदा अपने टीम को लगा रखा है जिन्हें यह लक्ष्य दिया गया है कि उन्हें येन- केन प्रकारेण किश्त की वसूली करनी ही करनी है। ये कर्मचारी तरह-तरह से लोगों को डराकर पैसे वसूल रहे हैं। लोगो से बातचीत में पता चला कि ये कर्मचारी बोलते हैं कि यह सुविधा सभी को नहीं मिली है। वह लोगों से बोलते हैं कि आपको वेतन मिला है या नहीं और यदि मिला है तो देना पड़ेगा नहीं तो बाउंस चार्ज लगेगा सिबिल खराब होगा। जिनके खाते में पैसे थे उनके किश्त ऑटोमेटिक ही काट लिए जबकि उन्होंने मोरेटेरियम के लिए अप्लाई किया था, जिनके किश्त नहीं जा पाए क्योंकि लोगों ने पैसे दूसरे खाते में हस्तांतरित कर लिए थे, उनके पास बाउंस चार्ज का मैसेज आ रहा है। बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान के रिकवरी स्टाफ का कहना है कि मोरेटेरियम जब तक बैंक या बैंकिंग वित्तीय संस्थानों द्वारा मान्य नहीं होते हैं तब तक यह मोराटेरियम माना नहीं जायेगा, आपको कारण बताना ही पड़ेगा आदि आदि। ये गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान अपने पास आये मोरेटेरियम आवेदन का उत्तर भी काफी देर से कर रहे हैं और उसी बीच इनका रिकवरी स्टाफ फ़ोन कर ग्राहकों से कहता है कि यदि आपके पास मोरेटेरियम स्वीकार होने का मेल नहीं आया है तो आपको ईएमआई देना ही पड़ेगा क्योंकि मेल नहीं आने का आशय है कि आपका मोरेटेरियम स्वीकार नहीं हुआ है। जबकि अगर आप रिजर्व बैंक का २७ मार्च का नोटिफिकेशन , अप्रैल एवं मई का प्रेस कांफ्रेंस और नोटिफिकेशन देखें तो कहीं ऐसी बात कही ही नहीं गई है जो ये बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान के रिकवरी स्टाफ बता रहे हैं। यह सरासर गलत है और लोगों को बेवकूफ बनाकर इस संकट की घड़ी में उनके साथ अन्याय किया जा रहा है, रिजर्व बैंक के  के २७ मार्च के नोटिफिकेशन के अनुसार रिजर्व बैंक का यह आदेश बैंक एवं गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान को समान रूप से आदेश देता था कि उन्हें इसका अनुपालन करना ही है और उन्हें किसी भी मोरेटेरियम आवेदन को अस्वीकार नहीं करना था क्योंकि यह संकट के समय एक मानवीय और दयालु सहायता के रूप में दी गई थी लेकिन यहां भी बैंक और खासकर के गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान ने अपना महाजनीय चरित्र ही उजागर किया। रिजर्व बैंक ने पहले इसे मार्च, अप्रैल और मई की ईएमआई और सीसी ओवरड्राफ्ट के ब्याज के लिए लागू किया था उसे अब बढ़ा कर अगस्त कर दिया है। मतलब राहत की अवधि को छः माह का कर दिया है। गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान को भी पर्याप्त तरलता प्रदान की है, स्ट्रेस एसेट्स के लिए भी अलग से प्रावधान किया है, सीसी और ओवरड्राफ्ट वालों को इकट्ठे ६ माह का ब्याज देने में एकसाथ दिक्कत नहीं आये उसकी भी व्यवस्था दी है कि उसे यह किश्त रूप में दें। लेकिन लगता है रिजर्व बैंक, जनता के बीच बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान का मनमानापन रवैया आ जाने के कारण  ठीक से यह लागू नहीं हो पा रहा है। ठीक से और सरकार की मंशा के अनुसार यदि रिजर्व बैंक की घोषणा को लागू करना है तो रिजर्व बैंक को अपनी घोषणाओं के लिए एक नोडल अफसर और एक केन्द्रीयकृत विशेष ग्रीवांस फोरम खोलना पड़ेगा ताकि इस विशेष समय के लिए दिया गया विशेष पैकेज विशेष नोडल अफसर के निगरानी में लागू हो पाए नहीं तो शायद बहुत देर हो जाएगी।