तमिल-संस्कृत का उद्गम समझो!

भारतीय संस्कृति का आदि स्रोत वैदिक दर्शन है। इसी दर्शन से संस्कृति का विकास हुआ। ऋग्वेद में दर्शन, संस्कृति व सभ्यता के महत्वपूर्ण सूत्र हैं। इनका उद्भव शून्य से नहीं हो सकता। ऋग्वेद के रचनाकाल के पहले भी एक संस्कृति थी, सभ्यता थी और दर्शन भी था। ऋग्वेद में उपलब्ध संस्कृति व सभ्यता के तत्व पूर्व वैदिक काल का विस्तार हैं। कुछ विद्वान आर्यों को बाहर से हिंदुस्थान आनेवाला मानते हैं। उनके अनुसार आर्यों के हिंदुस्थान आने के पहले भी यहां आर्यों से भिन्न आर्येतर संस्कृतियां थीं। वे कहते हैं कि भारतीय संस्कृति का विकास आर्य व आर्यों से भिन्न संस्कृति के मिलन से हुआ। डॉ. रामधारी सिंह दिनकर ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ (पृष्ठ ५८) में ऐसा ही लिखा है, ‘हिंदू संस्कृति का आविर्भाव आर्य व आर्येत्तर संस्कृतियों के मिश्रण से हुआ।’ प्रश्न है कि ऐसा मिश्रण करनेवाले जन कौन थे? आगे दिनकर जी के विवेचन में आर्येत्तर संस्कृति धारकों के उल्लेख हैं। इस उल्लेख के लिए उन्होंने पुराणों को आधार बनाया है। पुराणों का आधार अनुचित नहीं है। लेकिन उन्होंने पौराणिक परंपरा को वेदों के समय तक पीछे ले जाने का प्रयास किया है। उन्होंने लिखा है, ‘पुराणों का उल्लेख धर्म सूत्रों में भी है। मनुस्मृति, विष्णु स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति में भी। रामायण और महाभारत तो पुराणों के नाम कई बार लेते हैं। इन सारे प्रमाणों से यह अनुमान अत्यधिक सुदृढ़ हो जाता है कि पुराणों की परंपरा वैदिक परंपरा से कम प्राचीन नहीं है।’ (वही) ऋग्वेद और पुराणों के रचनाकाल के बीच समय का लंबा फासला है।
ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम ज्ञान अभिव्यक्ति है। दिनकर जी संभवत: पुराणों को वैदिक काल से पहले रखना चाहते थे। आगे लिखते हैं ‘पुराणों में यक्ष, राक्षस, नाग किरात आदि का जो उल्लेख है, वह स्पष्ट ही आर्येतर जातियों की सूचना देता है। पुराणों के अनुसार देवों की अपेक्षा असुरों का प्राचीन होना अधिक संभव दिखता है।’ यहां उनके मन में झिझक है। लेकिन वे निष्कर्ष निकालते हैं ‘इससे भी सूचित होता है कि हिंदुस्थान में आर्यों से भिन्न और भी बहुत से लोग थे।’ (वही पृष्ठ ५९) ऋग्वेद में अनेक जन हैं। पांच जनों का उल्लेख कई बार है। अन्य जन भी रहे होंगे। पुराणकाल तक अन्य जातियां भी आई होंगी। आर्य अभिजनों के बीच श्रम विभाजन से भी अनेक जातियां विकसित हुई होंगी। देवों को असुरों के बाद बताना सही नहीं है। ऋग्वेद में देवों को सृष्टि सृजन के साथ ही उत्पन्न हुआ बताया गया है। असुर मनुष्य हैं, देवता प्रकृति की शक्तियां हैं।
आधुनिक हिंदुस्थान में भी उत्तर दक्षिण की दूरी और अलगाव की बातें चलती हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि आर्यों को दक्षिण हिंदुस्थान का ज्ञान नहीं था, वैदिक साहित्य में दक्षिण हिंदुस्थान का उल्लेख नहीं है। लेकिन सच दूसरा है। ऋग्वेद काल के कम से कम एक ऋषि अगस्त्य दक्षिण हिंदुस्थान से प्रत्यक्ष परिचित थे। वे उत्तर हिंदुस्थान से दक्षिण हिंदुस्थान गए थे। तमिल परंपरा के अनुसार अगस्त्य के दक्षिण पहुंचने के पूर्व पूरा तमिल क्षेत्र वन आच्छादित था। जनसंख्या कम थी। एक तमिल कथा के अनुसार शिव विवाह में दक्षिण के अधिकांश लोग उत्तर स्थित हिमालय क्षेत्र आए। पृथ्वी का संतुलन गड़बड़ा गया। देवों ने शिव को बताया। उनसे प्रार्थना की कि आप किसी तेजस्वी को दक्षिण भेजिए। शिव ने इस कार्य के लिए ऋषि अगस्त्य को चुना। शिव ने अगस्त्य को दक्षिण जाने का निर्देश दिया। उन्होंने शिव के सामने भाषा की समस्या रखी कि मैं दक्षिण की भाषा नहीं जानता। इस पर शिव ने अपने बार्इं तरफ अगस्त्य को और दक्षिण की तरफ पाणिनि को खड़ा किया। फिर वे डमरू बजाने लगे। बाई तरफ से निकली डमरू ध्वनि से तमिल भाषा बनी और दार्इं तरफ से निकली ध्वनि से संस्कृत का विकास हुआ। कथा का संदेश प्रेम पगा है। दोनों भाषाओं का उद्गम एक है। तमिल का प्राचीनतम व्याकरण अगस्त्य ने लिखा। उसका नाम ‘अगस्त्यम’ है।
उत्तर दक्षिण दिशा बोधक हैं। दिशाएं स्वतंत्र नहीं होतीं। मूल प्रश्न है कि हम कहां बैठकर उत्तर दक्षिण का विचार कर रहे हैं। तमिलनाडु में बैठकर दक्षिण की ओर देखे तो महासमुद्र है। भूगोल के अनुसार उत्तर दक्षिण की भौगोलिक सीमा के बीच विंध्य पर्वत था। अगस्त्य ऋग्वेद के ऋषि हैं। वे दक्षिण यात्रा पर गए। विंध्य पर्वत ने उन्हें झुक कर प्रणाम किया। अगस्त्य ने उसे आशीष दिए और कहा कि जब तक मैं दक्षिण से न लौटूं तब तक तुम ऐसे ही झुके रहना। इस पारंपरिक कथा में बहुत कुछ छुपा हो सकता है। उत्तर दक्षिण का विभाजक विंध्य पहाड़ था। विभाजक शक्तियां और भी रही होंगी। इन दोनों को अलग बतानेवाले लोग भी रहे होंगे। अगस्त्य तेजस्वी थे। उनके तेज के सामने सब झुके हों तो आश्चर्य क्या है?
अगस्त्य दक्षिण की यात्रा पर अकेले नहीं गए। डॉ. रामधारी सिंह दिनकर ने तमिल परंपरा के हवाले से लिखा है, ‘अगस्त्य दक्षिण जाने लगे, पहले वे गंगा के पास गये। फिर कावेरी को साथ कर लिया, जमदग्नि ऋषि के पुत्र तृण धमगनि, पुलस्त्य की बहिन लोपामुद्रा और द्वारिका जाकर वृष्णिवंश के १८ राजाओं को भी उन्होंने अपने साथ लगा लिया। पश्चिमी घाट पर उन्होंने आश्रम बनाया।’ (वही पृष्ठ ६४) अगस्त्य और उनकी मंडली दक्षिण पहुंची। अगस्त्य और इस संस्कृति मंडली ने भारतीय सांस्कृतिक एकता पर ही काम किया होगा। अगस्त्य व्यापार के उद्देश्य से दक्षिण नहीं गए थे और न ही वे पर्यटक थे।
ऋग्वेद में तमिलनाडु का उल्लेख नहीं है। लेकिन अगस्त्य और लोपामुद्रा ऋग्वेद के प्रतिष्ठित ऋषि है। वैदिक संस्कृति के विकास में उत्तर दक्षिण का पूरब-पश्चिम सहित सभी अभिजनों का कर्म तप है। ऋग्वेद का विश्व प्रसिद्ध भाष्य लिखनेवाले महान तत्ववेत्ता सायण दक्षिण के थे। हिंदुस्थान की सांस्कृतिक एकता के नायक व दार्शनिक शंकराचार्य केरल के थे। आचार्य शंकर के शारीरिक भाष्य पर ‘भामिती’ वाचस्पति मिश्र ने मिथिला में लिखी थी। दक्षिण के ही विद्वान भारवि ने किरातार्जुनीयम् लिखी। प्राक् ज्ञान दर्शन के विद्वान भट्टोजि दीक्षित, मल्लिनाथ, जगन्नाथ आदि दक्षिण के थे। आर्य और द्रविण कोई नस्ल नहीं है। उत्तर दक्षिण की अलग-अलग सभ्यता व संस्कृति नहीं है। उत्तर दक्षिण का राज विवाद राजनैतिक कारण से ही उठता है। पहले संस्कृत और तमिल के बीच प्रीति थी। तब समूचा हिंदुस्थान ज्ञान दर्शन की अभिव्यक्ति के लिए संस्कृत को ही प्रिय भाषा मानता था।
आर्य और द्रविण की अलग-अलग संस्कृतियां नहीं थी। आर्यों को किसी अन्य देश से हिंदुस्थान आया हुआ माननेवाले विद्वान ही दक्षिण संस्कृति को प्राचीन और वैदिक संस्कृति को परवर्ती बताते हैं। दिनकर जी ने यही लिखा है ‘द्रविण सभ्यता में आर्यों से आगे यानी आर्यों की अपेक्षा वे अधिक प्राचीन थे।’ (वही ६८) लेकिन यह तथ्य सही नहीं है। आर्यों का रचा ऋग्वेद दुनिया का प्राचीनतम साक्ष्य है। ऋग्वेद के पहले की संस्कृति का सांकेतिक वर्णन भी ऋग्वेद में है। आर्य हिंदुस्थान में बाहर से नहीं आए थे। दिनकर जी भी आर्यों को विदेशी मानते हैं लेकिन उनकी प्रशंसा करते हैं, ‘आर्यों ने आकर यहां भी जीवन की धूम मचा दी। प्रवृत्ति और आशावाद के स्वर से समाज को पूर्णकार दिया।’ (वही पृष्ठ ६८) आर्यों ने आशावाद भरा, जीवन में घूम मचा दी। मूलभूत प्रश्न है कि क्या कोई विदेशी समूह किसी अन्य देश में जाकर सहज ही ऐसी धूम मचा सकता है? आर्य हिंदुस्थान के ही मूल निवासी थे। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले दर्शन का विकास किया। उत्तर-दक्षिण के भेद आर्यों को विदेशी माननेवालों ने गढ़े हैं।