" /> तहस-नहस न कर दे टीवी बहस

तहस-नहस न कर दे टीवी बहस

टीवी डिबेट्स में गाली-गलौज, थप्पड़बाजी, छुरा, तलवारें दिखाना, एक-दूसरे से मारपीट करना आम हो गया है। महिलाओं पर भी प्रतिभागी हाथ उठाने लगे हैं। स्वामी ओम नामक बाबा भी डिबेट से फेमस हुआ था। उसने लाइव डिबेट में एक महिला डिबेटर से हाथापाई की थी। उसके बाद उन्हें `बिग बॉस’ में बुलाया गया। डिबेट का स्तर अब मारपीट और गालीगलौज से भी आगे निकल चुका है। टीवी की बहसों पर खून होने लगे हैं। डिबेट से हुई पहली मौत ने कई तरह के सवाल खड़े किए हैं। घटना के बाद केंद्र सरकार व सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय पर गाइडलाइन तय करने का दबाव बढ़ा है। दबाव होना भी चाहिए। आखिरकार बेलगाम बहसों के लिए कम से कम कुछ मानक तय होने चाहिए ताकि प्रतिभागी कुछ संयम बरतें। लाइव तीखी बहसों का ही नतीजा है कि मुंह में जो आता है, वह सामने वाले के लिए बोल देता है। बोलने वाला ये भूल जाता है, उसे लाखों-करोड़ों लोग देख भी रहे हैं।

न्यूज चैनलोंं की बहसें, जिसे डिबेट कहा जाता है, अब पूरी तरह से चकल्लस लगने लगी है। डिबेटर एक दूसरे को गधा, बंदर, सूअर, ना जाने क्या-क्या बोलने लगे हैं। बोलने वालों पर किसी तरह की बंदिशें नहीं होतीं। डिबेट कराने वाले एंकर बीच में बैठकर उन्हें रोकने के बजाय मंद-मंद मुस्काते रहते हैं। पिछले सप्ताह इन डिबेटों की चकल्लसों ने बड़ी घटना को जन्म दिया। एक डिबेटर ने दूसरे डिबेटर को जयचंद कहा और उनके माथे पर लगे टीके का उपहास उड़ाया। नतीजा सबके सामने है। घटना के बाद से ही ‘जयचंद और टीका’ ये दोनों शब्द चर्चा में हैं। चैनल की लाइव डिबेट में बोले गए इन शब्दों के सदमे से एक डिबेटर को हार्टअटैक आ गया और उसके फौरन बाद उनकी मौत हो गई। घटना बेशक दिल्ली से सटे नोएडा में घटी हो, लेकिन चर्चा पूरे हिंदुस्थान में हैं। चर्चा दरअसल इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि डिबेट्स का स्तर अब इतना नीचे गिर चुका है जो देखने योग्य नहीं रहीं।
टीवी डिबेट्स में गाली-गलौज, थप्पड़बाजी, छुरा, तलवारें दिखाना, एक-दूसरे से मारपीट करना आम हो गया है। महिलाओं पर भी प्रतिभागी हाथ उठाने लगे हैं। स्वामी ओम नाम का पाखंडी भी डिबेट से फेमस हुआ था। उसने लाइव डिबेट में एक महिला डिबेटर से हाथापाई की थी। उसके बाद उसे बिगबॉस में भी बुलाया गया। डिबेट्स का स्तर अब मारपीट और गाली-गलौज से भी आगे निकल चुका है। टीवी की बहसों पर खून होने लगे हैं। डिबेट से हुई पहली मौत ने कई तरह के सवाल खड़े किए हैं। घटना के बाद केंद्र सरकार व सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय पर गाइडलाइन तय करने का दबाव बढ़ा है। दबाव होना भी चाहिए। आखिरकार बेलगाम बहसों के लिए कम से कम कुछ मानक तय होने चाहिए ताकि प्रतिभागी कुछ संयम बरतें। लाइव तीखी बहसों का ही नतीजा है कि जिसके मुंह में जो आता है, वह सामने वाले को बोल देता है जबकि बोलने वाला ये भूल जाता है उसे लाखों-करोड़ों लोग देख भी रहे हैं।
गौरतलब है प्रत्येक समस्याओं का समाधान बहस-वार्ता से ही निकलता है। लेकिन जब बहस चकल्लस बन जाए तो उसका विकल्प तलाशना जरूरी हो जाता है। कमोबेश, महसूस कुछ ऐसा ही होने लगा है। देश के कोने-कोने से लोग टीवी डिबेट पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। दूरदर्शन, लोकसभा-राज्यसभा चैनलों पर आज भी बहसें बड़ी शालीनता के साथ आयोजित होती हैं। वहां डिबेटर्स का चुनाव बड़े ज्ञान-गुणवत्ता, संयम और संतुलित ठंग से होता है। वहीं, निजी चैनलों में संपादक और गेस्ट कोऑडिनेटर अपने चाहने और चिर-परिचितों को ही आमत्रित करते हैं। मुद्दों की चाहे उन्हें समझ हो या न हो, बस संपादकों व गेस्ट कोऑडिनेटर को खुश करना आता हो। इस खेल में बहुत गंदगी है। मैं खुद तमाम चैनलों का पैनेलिस्ट हूं, इसलिए अंदरूनी सच्चाई से वाकिफ हूं। गेस्ट कोऑडिनेटर और नए-नवेले डिबेटर्स में कुछ गुप्त सौदेबाजियां होती हैं, जिसकी भनक चैनलों के मालिकों और संपादकों को भी नहीं होती। सत्ताधारी पार्टी से जुड़े नेताओं को चैनलों की डिबेट्स में प्रतिभागी बनाने से पहले गेस्ट कोऑर्डिनेटर खुलेआम उनसे अपने काम निकलवाने की मांगें रखते हैं।
टीवी की दुनिया दरअसल चकाचौंध से भरी हुई है, जिससे हर कोई जुड़ना और दिखना चाहता है। टीवी का पर्दा जितना सफेद है, सच उतना ही काला है! ये भी सच है कि टीवी की बहसों में भाग लेने के बाद ही कई सामान्य लोग बड़ी पार्टियों का हिस्सा बने। उदाहरण के तौर पर राकेश सिन्हा नाम लिया जा सकता है। इसी कतार में संबित पात्रा भी हैं। उनके बोलने की भाषा राकेश सिन्हा से फिलहाल जुदा है। शायद उनकी किस्मत उनका साथ नहीं दे रही। बीते लोकसभा में मोदी लहर के चलते जहां सभी उम्मीदवारों की जीत हुई, पर पात्रा गच्चा खा गए। प्रवक्ता डॉ पात्रा कभी-कभी आक्रोश की सीमाओं को भी पार कर जाते हैं। तथ्यों पर बोलते-बोलते कब अतथ्य हो जाते हैं पता ही नहीं चलता।
राजीव त्यागी की मौत पर संबित पात्रा फंसते नजर आ रहे हैं। उनपर एक एफआईआर दर्ज हुई है। आरोप है कि उनके कड़वे बोल ही राजीव की मौत का कारण बने। वैसे देखा जाए तो मौत कोई न कोई बहाना लेकर आती है। जैसे कोई बीमारी, दुर्घटना वगैरह- वगैरह। लेकिन राजीव प्रकरण ने कई तरह के सवाल पैदा कर दिए हैं। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी को लाइव डिबेट में कहा कि टीका लगाने से कोई हिंदू नहीं हो जाता, टीका लगाना है तो दिल में लगाओ, आप जैसा टीका तो जयचंद लगाते हैं। उसके बाद राजीव की तबियत डिबेट के बीच में ही बिगड़ने लगी। फौरन बाद ही उनकी मृत्य हो गई। उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर टीवी चैनलों पर होने वाली आक्रामक बहस पर प्रतिबंध लगाने की मांग जोर पकड़ रही है। उनकी पत्नी ने कसूरवार संबित पात्रा को ठहराया है। वे कहती हैं कि उनके पति के अंतिम बोल थे ‘इन लोगों ने मुझे मार डाला’। घटना को लेकर कांग्रेस पार्टी में भयंकर आक्रोश है। कई जगहों पर प्रदर्शन भी हो रहे हैं। राजीव त्यागी की मौत के बाद विधाशंकर तिवारी जैसे वरिष्ठ पत्रकार टीवी न्यूज चैनलों के उदय से पहले के जमाने को याद करते हुए कहते हैं कि टीआरपी की होड़ के लिए आखिरकार जहरीली बहसें, मारपीट कब तक चलती रहेंगी? क्या ये खूनी घटनाएं प्रतिबंध लगाने की ओर इशारा नहीं करतीं। इसे रोका जाए और तत्काल प्रभार से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को गाइडलाइंस बनानी चाहिए।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब चैनलों के स्टूडियो में बंदूकें चलनी शुरू हो जाएंगी और उनके टीवी के पर्दे इंसानी लहू से पुते नजर आएंगे। न्यूज चैनलों का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। चैनलों ने पत्रकारिता पेशे को रातों-रात ग्लैमर में तब्दील कर दिया। अच्छी तनख्वाह, स्मार्ट पत्रकार इलेक्ट्रानिक मीडिया की ही देन है। लेकिन इसका नकारात्मक असर पारंपरिक प्रिंट मीडिया पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ा। पर्दे की चकाचौंध ने गंभीर पत्रकारिता को खत्म ही कर दिया है। टीआरपी की होड़ में कंटेंट सेलिंग की होड़ सी लग गई। मीडिया क्षेत्र जब से व्यापार और कमाई का साधन बना, तभी से डिजाइनर संपादक-पत्रकार खाटी की पत्रकारिता के मौलिक मानदंड को ही भूल गए। मीडिया आज चिल्ल-पों और दिमाग चकराने का कारण बन गई है। सुधार होना समय की मांग है। केंद्र सरकार के पहल के बिना सुधार होना नमुमकिन है।