" /> ताला-कुंडी खुली!, आगे क्या?

ताला-कुंडी खुली!, आगे क्या?

ढाई महीनों तक देश ताला-कुंडी में बंद था। कोरोना संकट के कारण स्वास्थ्य आपातकाल की जो स्थिति बनी, उसके कारण सरकार ने तालाबंदी घोषित की थी। कड़े नियम लागू कर दिए गए थे। हालांकि महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में जनजीवन पर लगे तालों को सोमवार से खोल दिया गया है। मानो ढाई महीने बाद सूर्योदय हुआ है। जनता खुली हवा में सांस ले रही है। बाजारों में थोड़ी हलचल दिखनी शुरू हो गई है। हालांकि, इससे कोरोना का खतरा बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। लॉकडाउन के दौरान कोरोना पीड़ितों की संख्या में कोई कमी नहीं आई थी। गत २४ घंटों में ही देश में लगभग १० हजार नए मरीजों की संख्या बढ़ी है। रविवार को महाराष्ट्र में ३ हजार नए मरीज पाए गए। उनमें से १३०० मरीज सिर्फ मुंबई शहर के हैं। कुल मरीजों की संख्या में महाराष्ट्र ने चीन को पीछे छोड़ दिया है, ऐसी खबरें प्रकाशित हुई हैं। कोरोना पीड़ितों का आंकड़ा नीचे नहीं आने के दौरान ही सरकार ने तालाबंदी में भी कुछ हद तक ढील दी है। उद्योग जगत ने तालाबंदी हटाने का स्वागत किया है। लेकिन ताले खुलते ही चुनौतियां बढ़नेवाली हैं। रविवार की सुबह मुंबई के सभी अखबारों में जो तस्वीरें प्रकाशित हुर्इं, वह तस्वीरें मनमोहक तो हैं ही लेकिन उतनी ही मायावी भी हैं। मरीनलाइंस के समुद्र तट पर हजारों लोग एक ही समय ‘मॉर्निंग वॉक’ या ‘जॉगिंग’ करते दिखे और वे लोग किसी भी प्रकार की सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते नहीं दिखे। मुंह पर मास्क लगाकर वे खूब कसरत कर रहे हैं। भविष्य में मुंबई की यही तस्वीर रही तो हालात बुरे हो सकते हैं। माना कि ढाई महीनों से तालाबंदी के दौरान घरों में रहना लोगों के लिए कठिन हो गया था। लेकिन अब बाहर निकलते समय नियमों का पालन नहीं किया गया तो कोरोना संक्रमण बढ़ेगा। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इस खतरे को भांप लिया है और इसीलिए वे जल्दबाजी में तालाबंदी हटाकर संकट बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। मुंबई, ठाणे, नई मुंबई, पुणे, पिंपरी-चिंचवड़ औद्योगिक व व्यापारी शहर हैं। लेकिन इन शहरों में जानवर नहीं, बल्कि इंसान रहते हैं। उनकी जान की परवाह करना मुख्यमंत्री का पहला काम है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अन्य नेता व राजनीतिक दलों का मत तालाबंदी को शिथिल करने के पक्ष में हो सकता है और उसके कारण ही सोमवार से कुछ नियमों में ढील दी गई। मुंबई में कोरोना का आंकड़ा ५० हजार पार कर रहा होगा तो यह तस्वीर अच्छी नहीं है। महाराष्ट्र में यह आंकड़ा लाख को स्पर्श करने जा रहा है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने ‘मिशन बिगन अगेन’ अर्थात ‘पुनश्च हरिओम’ का नारा दिया और लोग गैर अनुशासित ढंग से बाहर निकले। दक्षिण मुंबई में भीड़ ज्यादा हुई। दुकानें, रिक्शा-टैक्सी शुरू हुए। कार्यालयों में १० प्रतिशत उपस्थिति की बात कही गई। बेस्ट की बसें सड़कों पर दौड़ेंगी लेकिन उपनगरीय रेल सेवा व मेट्रो ३० जून तक बंद रहेंगी। मजे की बात यह है कि धार्मिक स्थलों को खोलने की अनुमति दी गई है लेकिन प्रसाद, नारियल, हार-फूल आदि पर बंदिश है। देवताओं का नियोजन इंसानों ने किया हुआ है। भगवान के दरवाजे पर भी भीड़ नहीं होनी चाहिए। सरकार ने ऐसा तय किया तो भक्तों की जान बचाने के लिए ही किया। कल रायगड पर शिवराज्याभिषेक समारोह गिने-चुने लोगों की उपस्थिति में ही संपन्न हुआ। इसी दौरान सऊदी सरकार ने हज यात्रा को भी रद्द करने की घोषणा की। कोरोना काल में भीड़ सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए जो लोग भीड़ के लिए पागल हैं, उन्हें पागलपन का दौरा आ सकता है, फिलहाल ऐसा माहौल है। रविवार को श्री अमित शाह ने बिहार चुनाव का शंखनाद डिजिटल माध्यम से किया। अमित शाह ने पहली चुनावी सभा ली जोकि ‘वर्चुअल रैली’ थी। बिहार विधानसभा प्रचार का नारियल इस प्रकार फूटने से अन्य लोगों की भीड़ के लिए खेल का मौका नहीं रह गया। अमित शाह की ‘वर्चुअल रैली’ के विरोध में राष्ट्रीय जनता दल ने पटना में थाली बजाकर विरोध जताया। वर्तमान स्थिति में विरोध की थाली पीटने का काम ‘वर्चुअल’ तरीके से ही किया जाना चाहिए क्योंकि कोरोना ने सबका जीवन बदल दिया है। मुंबई जैसे शहर देश की जीवनदायिनी हैं। लेकिन यह जान पर न बन आए और हटाई गई तालाबंदी का ‘बूमरंग’ न होने पाए, इसका ध्यान सबको रखना होगा। काम-धंधे पर जाना ही है। लेकिन यदि सभी ने नियमों का पालन करते हुए खुद को सुरक्षित रखा तो परिवार, मित्र, समाज और देश सुरक्षित रहेगा। फिलहाल इसी अनुशासन की आवश्यकता है। अन्यथा ढाई महीनों के लॉकडाउन की ताला-कुंडी खोलने के बाद क्या? यह सवाल कायम रह जाएगा। जिन्होंने नियम तोड़े, उन्होंने अपनी जान गंवाई। सरकार के लिए कठोर बन जाना आसान है। लोग सरकार पर यह नौबत ना लाएं।