" /> ताशकंद, ११ जनवरी १९६६. शास्त्री जी सोए, सुबह उठे ही नहीं!

ताशकंद, ११ जनवरी १९६६. शास्त्री जी सोए, सुबह उठे ही नहीं!

५४ वर्षों के बाद भी हम लाल बहादुर शास्त्री की मौत का रहस्य ढूंढ़ रहे हैं। इसमें राजनीति ज्यादा है। शास्त्री जी की वामनमूर्ति ताशकंद में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष प्रे. अयूब को भारी पड़ गई। ताशकंद करार में कुछ धाराओं से शास्त्री जी विचलित थे। उसी तनाव में वे सोने गए। ११ जनवरी, १९६६ की सुबह वे उठे ही नहीं।
ताशकंद में कड़ाके की सर्दी के बीच लोग रूस की तरह ‘वोडका’ नहीं पीते हैं बल्कि कड़क कॉफी के घूंट का मजा लेते हैं। रूस की ‘वोडका’ संस्कृति से उजबेक बाहर निकल गया है। लेकिन उजबेक की नई पीढ़ी ‘ताशकंद’ में मूर्ति के रूप में खड़े लाल बहादुर शास्त्री को भी भूल गई है क्या? ऐसा सवाल उठता है। ताशकंद दौरे के दौरान मैं शास्त्री जी के स्मृति स्थल पर गया था। स्मृति स्थल की देखभाल अच्छे से की जा रही है, परंतु पाकिस्तान को टक्कर देनेवाले वामनमूर्ति शास्त्री जी निश्चित तौर पर कौन हैं, इस बारे में वहां की नई पीढ़ी को कुछ भी जानकारी नहीं है। ५४ वर्ष पूर्व पाकिस्तान के साथ ‘ताशकंद समझौता’ हुआ और उसी रात शास्त्री जी की ताशकंद में मौत हो गई। शास्त्री जी का निधन संदिग्ध होने की बात कही गई और आज भी इस पर आशंका जताई जाती है लेकिन शास्त्री जी की मौत प्राकृतिक थी। ‘ताशकंद’ तब रूसी महासत्ता का हिस्सा था। १९६५ के युद्ध में रूस के तत्कालीन अध्यक्ष एलेक्सी कोसिजिन ने तब मध्यस्थता की थी। पाकिस्तान के अध्यक्ष अयूब व हिंदुस्थान के प्रधानमंत्री शास्त्री जी को ताशकंद में बुलाया। वहां पर शांति पर चर्चा हुई लेकिन उसके बाद शास्त्री जी का तिंरगे में लिपटा मृतदेह ही हिंदुस्थान आया।
वामनमूर्ति की जीत
१९६५ का युद्ध पाकिस्तान ने हिंदुस्थान पर लादा था। लेकिन उसे ‘वामनमूर्ति’ लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में हिंदुस्थान ने जीत लिया। २६ सितंबर, १९६५ को रामलीला मैदान पर विजय सभा हुई। उसमें शास्त्री जी आत्मविश्वास से बोले, ‘पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने कहा था कि वे दिल्ली तक आराम से चलते हुए पहुंच जाएंगे। वे इतने बड़े नेता हैं, बलशाली हैं। मैंने सोचा इतने बड़े आदमी को दिल्ली में पैदल चलकर आने की तकलीफ क्यों दें? हम ही लाहौर के लिए कूच करके उन्हें सलामी देते हैं!’ शास्त्री जी का ये आत्मविश्वास मतलब हिंदुस्थानी नेतृत्व का आत्मविश्वास था। शास्त्री जी की वामनमूर्ति, उनकी आवाज की अयूब ने सरेआम खिल्ली उड़ाई थी। अयूब लोगों की परख उनके बाहरी स्वरूप से करते थे लेकिन छोटे कदवालों का हृदय भी फौलादी हो सकता है, ये उन्हें नहीं पता था। शास्त्री जी ने उन्हें ये दिखा दिया।
अयूब का अनुमान चूक गया
प्रे. अयूब पाक के अध्यक्ष और सेनाप्रमुख भी थे। उनका दिमाग फौजवाला था। चीन ने हिंदुस्थान को परास्त किया था। उस सदमे से ग्रस्त पंडित नेहरू का निधन हो गया। हिंदुस्थानी फौज का मनोबल क्षीण हुआ था। लड़ने की उम्मीद खत्म हो गई थी। दिल्ली में राजनैतिक नेतृत्व कमजोर हो गया था। प्रे. अयूब का दिल्ली दौरा तय हुआ था लेकिन नेहरू के निधन से उन्होंने दौरा रद्द कर दिया। अब दिल्ली जाकर क्या लाभ? चर्चा आखिर किससे की जाए, ऐसा अयूब को लगता था। उसी दौरान शास्त्री जी ने उन्हें संदेश भेजा- ‘आप क्यों आते हो, हम ही आ रहे हैं वहां।’ शास्त्री जी वैâरो गए थे। एक दिन के लिए वे कराची में रुके। शास्त्री जी को हवाई अड्डे पर छोड़ने के लिए प्रे. अयूब आए थे। तब अपने सहयोगियों को इशारा करते हुए अयूब बड़बड़ाए, इनके साथ चर्चा करके कुछ लाभ नहीं है। ये बेहद कमजोर नेता हैं। शास्त्री जी की हिम्मत का अनुमान लगाने में प्रे. अयूब ने गलती की। कश्मीर पर हमले के बाद हिंदुस्थान अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार नहीं करेगा। अयूब का ये अनुमान भी गलत सिद्ध हुआ। ये उनकी दूसरी भूल थी। शास्त्री जी ने यह युद्ध प्रे. अयूब पर ही पलट दिया। कमजोर शास्त्री जी को हम पीछे धकेलते ले जाएंगे, अयूब का ये अंदाज साफ-साफ गलत सिद्ध हुआ। हिंदुस्थानी फौज लाहौर तक कब पहुंच गई, ये अयूब समझ ही नहीं पाए और वो महाशय हाथ मलते रह गए।
ताशकंद मुलाकात
उजबेकिस्तान से शास्त्री जी का संबंध पाकिस्तान से युद्ध के बाद ही बना और वह मृत्यु के बाद भी बरकरार रहा। युद्ध के बाद धुआं कम करने के लिए रूस के तत्कालीन अध्यक्ष कोसिजिन ने अगुवाई की। दो देशों में समझौता अथवा शांति समझौता हो। इसके लिए पाकिस्तान के प्रे. अयूब व प्रधानमंत्री शास्त्री जी को ताशकंद में मुलाकात का न्यौता दिया। रूस तब पूरी तरह से हिंदुस्थान के समर्थन में था। दो देशों के बीच तनाव खत्म हो और तटस्थ जगह पर चर्चा हो इसके लिए रूस ने ‘ताशकंद’ का चयन किया। ताशकंद में तब एक ही बड़ा होटल था। होटल ‘उजबेकिस्तान’। वहीं शास्त्री जी एवं प्रे. अयूब मिले। आज उस होटल की रौनक साफतौर पर खत्म हो गई है और विगत ५ वर्षों में ताशकंद में ३५ नए होटल बन गए हैं। रूसी साम्राज्य से बाहर निकलने का ये परिणाम है। होटल उजबेकिस्तान के जिस दलान में प्रे. अयूब और प्रधानमंत्री शास्त्री जी मिले थे, उस दलान में मैं गया था। शास्त्री जी जिस ‘सूट’ में ठहरे थे, वहां भी गया था। दो नेताओं के शांति समझौते में जो तय हुआ, रूसी अध्यक्ष उसके गवाह थे।
हिंदुस्थान और पाकिस्तान एक-दूसरे के खिलाफ शक्ति का उपयोग नहीं करेंगे। आपसी विवाद चर्चा से हल करेंगे।
दोनों देश २५ जनवरी, १९६६ तक अपनी-अपनी सेना को सीमा से हटाएंगे।
हिंदुस्थान और पाकिस्तान एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
दोनों देश अपने-अपने देश से आए शरणार्थियों के बारे में विचार करेंगे और निर्णय लेंगे। एक-दूसरे की ‘संपत्ति’ लौटाने के बारे में विचार किया जाएगा।
सामान्यत: ‘ताशकंद’ समझौते में यही मुद्दे थे। शास्त्री जी विचलित थे तो इन दो मुद्दों के कारण। उसमें एक था संपत्ति लौटाने की शर्त, जिसमें हमारी फौज द्वारा जीता गया ‘पीर पंजाब’ का इलाका भी शामिल था। शास्त्री जी को ये मंजूर नहीं था परंतु रूस के अध्यक्ष के सामने वे ज्यादा विरोध नहीं कर सके। उसी तनाव में वे अंत तक रहे।
प्राकृतिक मौत
शास्त्री जी के निधन पर कुछ लोगों ने रहस्य और संशय के बादल निर्माण किए। बीच में ‘ताशकंद डायरी’ नामक फिल्म इसी पर आई थी। शास्त्री जी के निधन के पीछे गांधी परिवार का अदृश्य हाथ दिखाने की कसरत इसमें थी। लेकिन शास्त्री जी की मौत प्राकृतिक थी। तनाव के कारण हृदयविकार का झटका आया और उसी में वे दुनिया को छोड़ गए। ‘ताशकंद’ समझौते में पाकिस्तान का जीता हुआ हिस्सा छोड़ने का दबाव उन पर था। ये मैंने ऊपर कहा ही है।
उसी तनाव में उन्होंने ‘शांति’ समझौते पर हस्ताक्षर किए, उसके बाद उसी तनाव में रात को सोने गए लेकिन ११ जनवरी, १९६६ की सुबह नींद से उठे ही नहीं। शास्त्री जी ने ताशकंद में ही आखिरी सांसें लीं। ताशकंद में ही शास्त्री जी का पोस्टमार्टम किया गया। उसमें भी उनकी मौत प्राकृतिक व हृदयविकार के कारण होने की बात स्पष्ट हुई।
दोनों को भारी पड़े
शास्त्री जी के निधन को ५४ वर्ष से ज्यादा समय बीत चुका है। इतने वर्षों बाद भी हम उनके निधन का रहस्य ढूंढ़ रहे हैं, जिस ताशकंद में उनका निधन हुआ वहां तीन पीढ़ियां बदल चुकी हैं। रूस का साम्राज्य नष्ट हो चुका है लेकिन उजबेक जनता ने शास्त्री जी की स्मृतियों का जतन किया है। उजबेक में बहुसंख्य मुसलमान लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन अध्यक्ष प्रे. अयूब का नामोनिशान ताशकंद में कहीं नहीं है। ताशकंद समझौते के समय मौजूद रहे प्रे. एलेक्सी कोसिजिन भी वहां नाम के लिए नहीं बचे हैं। वहां खड़े हैं सिर्फ लाल बहादुर शास्त्री। पाकिस्तान का जीता हुआ हिस्सा पुन: देना पड़ेगा, इस तनाव में उनका स्वास्थ्य नींद में ही बिगड़ गया। एक तरफ रूस के अध्यक्ष प्रे. कोसिजिन तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के अध्यक्ष प्रे. अयूब नामक सैन्य शासक। ताशकंद में वामनमूर्ति शास्त्री जी इन दोनों पर भारी पड़े। फिर भी वे अस्वस्थ थे। ताशकंद के शास्त्री स्ट्रीट स्थित चौकवाला उनका पुतला मुस्कुराता है। ताशकंद से सांस्कृतिक संबंध जोड़ो, ऐसा वे मुस्कुराते चेहरे से हिंदुस्थानवासियों को सुझाव देते हैं। बर्फ की चादर से ढंका उजबेकिस्तान, ताशकंद उस बर्फ पर उगा मयूर पंख की तरह पर्यटकों को लुभाता है। स्वागत के लिए शास्त्री जी हैं ही!