तिल-गुड़ और खिचड़ी खाने का है महत्व

मकर संक्राति हिंदू धर्म के कुछ मुख्य त्योहारों में से एक है। इस साल ये त्योहार १५ जनवरी यानी आज है। इस रोज भगवान सूर्य को खिचड़ी का भोग लगाकर खिचड़ी खाने की परंपरा है। साथ ही तिल-गुड़ का भोग लगाया और तिल के लड्डू बड़ी निष्ठा और शौक से खाए जाते हैं। देश के पूर्वी हिस्से में दही-चूड़ा खाकर दिन की शुरुआत की जाती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि खास इसी दिन ये चीजें खाने का नियम क्यों बना? इसके पीछे सेहत से जुड़ी कई वजहें हैं।
मकर संक्राति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है। कालगणना के मुताबिक जब सूर्य मकर से मिथुन राशि की ओर भ्रमण करता है तो इस वक्त को उत्तरायण माना जाता है। ये समय छह महीने का होता है। इसके बाद सूर्य कर्क से धनु राशि की ओर जाता है, जिसे दक्षिणायन कहा जाता है। मान्यता है कि सूर्य का उत्तरायण होना काफी शुभ होता है और इसी वजह से सारे शुभ कामों की शुरुआत इसी दौरान की जाती है। ये भी माना जाता है कि इस दौरान किसी पुण्य या सेहत की दिशा में किए गए किसी काम का फल १०० गुना होकर मिलता है।
इस दिन की मान्यता इतनी ज्यादा है कि ये त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है, जैसे तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाते हैं। कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे संक्रांति कहते हैं। गोआ, ओडिशा, हरियाणा, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और जम्मू में इस दिन को मकर संक्रांति कहते हैं।
मकर संक्रांति को दिन चावल और उड़द दाल की खिचड़ी खाने और इसके दान का काफी महत्व है। यहां तक कि इस दिन को कई जगहों पर खिचड़ी पर्व भी कहते हैं। खिचड़ी खाने की वजह ये है कि इसमें चावल को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और उड़द दाल को शनि का। इसमें डलने वाली हरी सब्जियां बुध ग्रह से जुड़ी हैं। इन सबका मेल मंगल और सूर्य से सीधा ताल्लुक रखता है। इसी दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं इसलिए खिचड़ी खाने से इन सारे ग्रहों का सकारात्मक प्रभाव बढ़ता है।
खिचड़ी खाने को लेकर ही एक और मान्यता के अनुसार मुगल आक्रांता खिलजी के आक्रमण के दौरान भगवान शिव का अवतार कहे जाने वाले बाबा गोरखनाथ के योगियों के पास राशन की कमी हो गई थी। इसे देखते हुए गोरखनाथ ने योगियों को चावल और दाल में सब्जियां मिलाकर खाने की सलाह दी। इससे उनकी सेहत में भी सुधार हुआ और ग्रहों के प्रभावी होने की वजह से आध्यात्मिक ऊर्जा भी बढ़ी। इसके बाद से संक्रांति के मौके पर उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी का भोग चढ़ता है। खिचड़ी मेला भी यहां लगता है, जो कई दिनों तक चलता है।
संक्रांति पर तिल खाने को लेकर भी एक पौराणिक मान्यता है। श्रीमद्भागवत एवं देवी श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार शनिदेव का अपने पिता सूर्यदेव से बैर था क्योंकि उन्होंने हमेशा पिता को अपनी माता और पहली पत्नी संज्ञा के बीच और खुद दोनों संतानों के बीच भेदभाव करता पाया। नाराज शनि ने पिता को कुष्ठरोग का श्राप दे डाला। रोगमुक्त हुए सूर्यदेव ने शनि के घर यानी कुंभराशि को जला दिया। बाद में अपने ही पुत्र को कष्ट में देखकर सूर्य शनि से मिलने उसके घर पहुंचे। वहां यानी कुंभ राशि में तिल के अलावा बाकी सबकुछ जला हुआ था। शनि ने तिल से ही सूर्यदेव को भोग लगाया, जिसके बाद शनि को उनका वैभव दोबारा मिल गया। तभी से इस दिन तिल दाल और तिल खाने का महत्व है।
मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी और तिल खाना वैज्ञानिक महत्व भी रखता है। इस वक्त देश के ज्यादातर हिस्सों में भारी ठंड होती है और सूर्य का एक से दूसरी राशि में जाना मौसम में बदलाव लाता है। इसकी वजह से बीमारियों का डर बढ़ जाता है। तिल और खिचड़ी में वे सभी पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर को गर्मी दें और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं। यही कारण है इस त्योहार पर तिल-गुड़ की चीजें और दाल-सब्जी वाली खिचड़ी खाई जाती है।
शुभ मुहूर्त-
पुण्य काल मुहूर्त- सुबह ०७.१४ बजे से १२.३६ बजे तक।
महापुण्य काल मुहूर्त- सुबह ०७:१४ बजे से ०९.०१ बजे तक।
पूजा विधि-
मकर संक्रांति के दिन सुबह किसी नदी, तालाब या शुद्ध जलाशय में स्नान करें। इसके बाद नए या साफ वस्त्र पहनकर सूर्य देवता की पूजा करें। चाहें तो पास के मंदिर में भी जा सकते हैं। इसके बाद ब्राह्मणों, गरीबों को दान करें। इस दिन दान में आटा, दाल, चावल, खिचड़ी और तिल के लड्डू विशेष रूप से लोगों को दिए जाते हैं। इसके बाद घर में प्रसाद ग्रहण करने से पहले आग में थोड़ी सा गुड़ और तिल डालें और अग्नि देवता को प्रणाम करें।
स्नान-दान का शुभ मुहूर्त
इस बार मकर संक्रांति पर सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहा है। १४ जनवरी २०१९ की रात को ८:०८ बजे सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर गये हैं जो मंगलवार को १५ जनवरी दोपहर १२ बजे तक इसमें ही रहेंगे इसलिए १५ जनवरी २०१९ को दोपहर १२ बजे से पूर्व ही स्नान-दान का शुभ मुहूर्त है। मकर संक्रांति पर स्नान और दान का विशेष योग आज ही है।
बांस के कागज से हुआ था पतंग का आविष्कार
पतंग का इतिहास लगभग २००० साल से भी अधिक पुराना है। आविष्कार को लेकर मान्यताएं भी अलग-अलग हैं। माना जाता है कि सबसे पहले पतंग का आविष्कार चीन के शानडोंग में हुआ। इसे पतंग का घर के नाम से भी जाना जाता है।
एक कहानी के मुताबिक एक चीनी किसान अपनी टोपी को हवा में उड़ने से बचाने के लिए उसे एक रस्सी से बांध कर रखता था, इसी सोच के साथ पतंग की शुरूआत हुई।
मान्यता ये भी है कि ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व में चीन दार्शनिक मोझी और लू बान ने बांस के कागज से पतंग का आविष्कार किया था। ५४९ एडी से कागज की पतंगों को उड़ाया जाने लगा था क्योंकि उस समय पतंगों को संदेश भेजने के रूप में इस्तेमाल किया गया था। ज्यादातर लोगों का मानना है कि चीनी यात्री हीएन और हुइन सैंग पतंग को हिंदुस्थान में लाए थे। वायुमंडल में हवा के तापमान, दबाव, आर्द्रता, वेग और दिशा के अध्ययन के लिए पहले पतंग का ही प्रयोग किया जाता था। १८९८ से १९३३ तक संयुक्त राज्य मौसम ब्यूरो ने मौसम के अध्ययन के लिए पतंग केंद्र बनाए हुए थे, जहां से मौसम नापने की युक्तियों से लैस बॉक्स पतंगें उड़ा कर मौसम संबंधी अध्ययन किए जाते थे।
 त्यौहार में  व्यापार
एसोचैम के मुताबिक हिंदस्थान में पतंग का बाजार १,२०० करोड़ रुपए का है। देशभर में ७० हजार से ज्यादा कारीगर पतंग बाजार से जुड़े हैं। बाजार में एक पतंग की कीमत २ से १५० रुपए तक होती है लेकिन काइट फेस्टिवल्स में उड़ाई जाने वाली पतंगें महंगी होती हैं। यह उसके आकार, बनावट और मैटेरियल पर निर्भर करता है। पतंग कारोबार के लिए उत्तर प्रदेश के कई जिले मशहूर हैं। बरेली, अलीगढ़, रामपुर, मुरादाबाद और लखनऊ में तैयार होनेवाला मांझा और पतंग राजस्थान समेत कई राज्यों में भी सप्लाई किया जाता है। एक बड़े आकार की चरखी में मांझे की ६ रील भरी जा सकती है। एक रील में ९०० मीटर लंबा मांझा होता है। एक औसत क्वालिटी वाली ६ रीलवाली चरखी लेने पर ४००-६०० रुपए का खर्चा आता है।