" /> तीब्बत की ताकीद, चीन पीछे हटा जरूर पर भारत रहे सतर्क -आचार्य येशी फुंटसोक

तीब्बत की ताकीद, चीन पीछे हटा जरूर पर भारत रहे सतर्क -आचार्य येशी फुंटसोक

तिब्बत की निर्वासित सरकार ने उन खबरों का पुरजोर विरोध किया है, जिनमें ये कहा जा रहा है कि तिब्बत का झुकाव चीन की तरफ बढ़ रहा है। तिब्बत ने इन खबरों के पीछे चीन की गहरी चाल बताई है। अपनी सफाई में वहां की निर्वासित संसद के डिप्टी स्पीकर आचार्य येशी फुंटसोक ने `दोपहर का सामना’ के साथ खुलकर बात की। प्रस्तुत है रमेश ठाकुर के साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

तिब्बत, चीन की हां में हां मिला रहा है, ऐसी खबरें सुनने को मिल रही हैं?
तिब्बत का रुझान चीन की तरफ है, ऐसी खबरें चीनी मीडिया ने अपने सरकार के आदेश पर प्लांट की और पैâलाई। हम ऐसी सभी खबरों को अधिकृत रूप से खंडन कर चुके हैं। अफवाह मात्र है, कोई सच्चाई नहीं। हमारा स्टैंड साफ है, जो दशकों से रहा है वह अभी है और आगे भी रहेगा? वैसे आप जिस संदर्भ में पूछना चाह रहे हो, मुझे आभास है। चीन की चालबाजी है, पैंतरेबाजी है। हमारे रिश्ते खराब कराना चाहता है। भारत सरकार अच्छे से जानती है हमारा रुख किस तरफ है। हमें बिलावजह सफाई नहीं देनी।

गलवान मामले को लेकर हिंदुस्थान की तरफ से कुछ छुपाया गया क्या?
भारत की सेना कमजोर नहीं है उन्हें जवाब देना आता है और दिया भी। भारत से ज्यादा वहां के सैनिक हताहत हुए। यह अलग बात है चीन की मीडिया पर वहां की सरकार का पूर्ण नियंत्रण है। चीनी सैनिकों के मरने की खबर को उन्होंने उजागर नहीं किया। उनको पता था, सच्चाई सार्वजनिक करने से उनकी ग्लोबल स्तर पर थू-थू जो हो जाएगी। भारत जैसी आजादी वहां की मीडिया को नहीं है। मैं दावे से कह सकता हूं कि भारत से ज्यादा वहां के सैनिक हताहत हुए हैं।

चीन, तिब्बत का लंबे समय से सांस्कृतिक नरसंहार करता आया है, क्या इसका कभी अंत होगा भी या नहीं?
देखिए, हम उनसे आजादी नहीं, बल्कि स्वायत्तता मांगते हैं। इसके लिए दुनिया से भी मदद की गुहार लगाते हैं। लेकिन चीन अपनी हरकतों से बाज आए तब ना? हमें तो इस बात की हैरानी होती है कि वर्ष १९९३ से लेकर भारत चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर १७ बार बैठकें कर चुका है पर नतीजा हमेशा पीठ में छुरा घोंपने जैसा आया। गलवान में भी यही सब कुछ देखने को मिला। निहत्थे सैनिकों पर उन्होंने हमला करके अपनी दुर्दांत सोच से परिचय कराया है। चीन पीछे हट गया है पर हिंदुस्थान को सतर्क रहने की जरूरत है। जो बौद्ध भिक्षु हमेशा न सिर्फ स्वयं अहिंसा के अनुयायी रहे बल्कि दुनिया को भी हमेशा अहिंसा के रास्ते पर चलने का संदेश दिया, आज वे निर्वासितों जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं, ये सब चीन की वजह से।

भारत सरकार ने उनके कई ऐप बंद किए हैं और चीन से निर्मित सामानों का बहिष्कार शुरू कर दिया है। इस कदम को आप वैâसा समझते हैं?
किसी दुश्मन को जब उसकी औकात दिखानी हो तो सबसे पहले उसको आर्थिक दंड देना चाहिए। भारत सरकार का पैâसला निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। भारत का बाजार चीन की कमाई का बड़ा जरिया रहा है। करोड़ों की आमदनी खाता है। इस पर चोट पड़नी जरूरी है। चीन खुलेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है, धार्मिक आजादी पर पाबंदी और धार्मिक मुद्दों का राजनीतिककरण करने का माहिर खिलाड़ी है। भारत का आशीर्वाद तिब्बत पर रहता है, ये बात उसे हमेशा से अखरती रही है। वह कभी नहीं चाहता कि दोनों देशों के संबंध मधुर हों लेकिन दोनों मुल्कों के रिश्ते बहुत अटूट हैं। तिब्बत का बच्चा-बच्चा भारत के उपकारों का गुण गाता है। भारत को हम अपना दूसरा घर मानते हैं। सार्वजनिक मंचों पर ये बात दलाई लामा भी कई मर्तबा बोल चुके हैं।

क्या आपको लगता है चीन कभी तिब्बत की बात मानेगा?
चीनी का तिब्बत पर सन १९५१ से कब्जा है, जिसकी स्वायत्तता की मांग हम करते आ रहे हैं। देखिए, हम अलग देश की मांग नहीं कर रहे हैं, सिर्फ अपनी उस स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं जिससे हम खुली फिजा में सांस ले सकें। अपने धर्म, संस्कृति और रीति-रिवाजों की रक्षा कर सकें। मैंने खुद हमेशा चीन सरकार से ऐसी नीति अमल में लाने की अपील की है, जो दोनों के निहितार्थ हो और ऐसा आम सहमति से ही मुमकिन है। सन २००२ से लेकर अब तक हमारे प्रतिनिधियों ने चीन गणराज्य की सरकार से इस मुद्दे पर कई राउंड की वार्ताएं की। इससे चीन सरकार के कुछ संदेह तो साफ हुए मगर मूल मुद्दे पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।

भारत-चीन का मसला अब इतना पेंचीदा हो गया है, जिससे युद्ध होना निश्चित हो गया है। आप क्या महसूस करते हैं?
बौद्ध सभ्यता शांति-अमन का प्रचार करती है। हिंसा का समर्थन कभी नहीं किया। हम कभी नहीं चाहेंगे कि दोनों देशों के दरमियान युद्व हो। मसला शांति से सुलझे, यही उम्मीद करते हैं। चीन अपनी छल-कपट वाली नीतियों की वजह से न सिर्फ अपना नुकसान कर रहा है बल्कि तिब्बतियों और भारत को भी नुकसान पहुंचाने लगा है। इससे उनकी भी एकता और अखंडता पर असर पड़ रहा है। पूर्वी लद्दाख में दोनों तरफ से सेनाओं की तैनाती हो चुकी है। कुछ भी हो सकता है। लेकिन पूरा विश्व बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से चीनी नेतृत्व की ओर देख रहा है कि वह किस तरह से सामाजिक एकता और शांति को बढ़ावा देगा या फिर सब दरकिनार करके सिर्फ अपनी मूर्खता का ही परिचय देगा।