तीसरे विश्वयुद्ध का अखाड़ा हिंद महासागर?

तीसरे विश्व युद्ध की आहटें साफ सुनाई दे रही हैं। जैसे दूसरे विश्व युद्ध की आहटें १९३० में ही सुनाई पड़ने लगी थीं। अबकी बार यह विश्व युद्ध एशिया में लड़ा जाएगा। हिंदुस्थान को बहुत ज्यादा सावधान रहने की आवश्यकता है लेकिन हम बदकिस्मत हिंदुस्थानी इन आहटों को सुन नहीं रहे। सिर्फ मोदी हैं जिनको समझ में आ रहा है थोड़ा सा लेकिन हिंदुस्थानी चरित्र की खासियत रही है, वह स्थिर नहीं रहता। चाहे इसी वजह से हम पर हजार साल से तुर्कों का, मुगलों का राज रहा। इतिहास की कुछ बातें जो सुना नहीं सकता मैं। इतिहास के वह पन्ने जो गायब कर दिए गए, जिनमें हिंदुस्थान के दोहरे चरित्र ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई! सोचता हूं तो खून के आंसू रोने पड़ते हैं। लेकिन मैं कह नहीं सकता, न इतिहास वह लिखे गए। फिर अ-लिखा रह जाता है। अ-लिखे इतिहास को जानना यानी अपनी भावनाओं के साथ जुगाली करना है।
चीन ने दक्षिण चीन सागर में चार नए द्वीप तैयार कर लिए। जहां ऊंची जगह देखी, उन्होंने वहां चीन से मिट्टी लाकर डाल दी। लोगों को समझ में नहीं आया कि क्यों चीन के जहाज मिट्टी भरकर लाते हैं और उन खास जगहों पर डाल देते हैं। इस तरह चार द्वीप उन्होंने बना लिए। एक द्वीप पर तो बाकायदा हवाई अड्डा भी बना लिया। चारों द्वीपों पर उन्होंने अपने जलपोत तैनात कर दिए और दक्षिणी चीन सागर के एक बड़े हिस्से पर अपनी दावेदारी जता दी। सबसे पहले इसका विरोध फिलीपीन ने किया था। दक्षिण चीन सागर में जापान, फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया वगैरह देशों ने इस पर बहुत कड़ी आपत्ति जताई। अब चीन कह रहा है कि दक्षिण चीन सागर पर उसका अधिकार है जबकि चीन से लगे १५० कि.मी. के क्षेत्र पर ही उसका अधिकार होना चाहिए। जापान और फिलीपीन ने यह बात अमेरिका को बताई। दक्षिणी चीन सागर में अमेरिका का एक विमान वाहक पोत पहले से तैनात था। उन्होंने दूसरा विमान वाहक पोत वहां भेज दिया। जापान को दो और विमान वाहक पोत बनाने की इजाजत दे दी उन्होंने। जापान द्वितीय विश्व युद्ध की हार के बाद अपनी सेना नहीं बढ़ा सकता था, अमेरिका की अनुमति के बिना। चीन के पास एक विमान वाहक पोत है। जापान को दो और विमान वाहक पोत बनाने की इजाजत मिलने के साथ ही चीन में जापान का भय समा गया क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध में उन्होंने जापान की देशभक्ति देखी थी। अगर अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम न गिराए होते तो यह युद्ध खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। अमेरिका और जापान की वजह से डरे हुए चीन ने अपनी मिसाइलें तैनात कर दीं और कहा कि हम मिसाइलों से युद्ध पोतों को मार गिराएंगे, जिसमें दस हजार सैनिक अमेरिका के मरेंगे। अमेरिका को जिसकी वजह से युद्ध बंद करना पड़ेगा।
यह सब शुरू ताइवान में परमाणु पनडुब्बियां बनाने की बात सुनकर हुआ। अमेरिका ने ताइवान को यह टेक्नोलॉजी दी, जिसमें वह परमाणु पनडुब्बियां बना सकते थे। चीन ने जब यह सुना तो उसने बाकायदा ताइवान पर हमला करने की धमकी दे दी। अमेरिका ने यह सुनते ही उनका सातवां बेड़ा तो वहां था ही, छठवें बेड़े के साथ जुड़े और ३०० जहाज दक्षिणी चीन सागर में भेज दिए। चीन जितने बड़े इलाके पर दक्षिणी चीन सागर में दावा करता है, उसका दावा इसीलिए भी खोखला साबित हो जाता है। वियतनाम और फिलीपींस को बहुत कम समुद्री क्षेत्र में जाने की इजाजत देता है। दक्षिण की तरफ इंडोनेशिया और मलेशिया है। वे भी इसके खिलाफ हैं। दक्षिणी एशिया का एक ही मुल्क म्यांमार इनका साथ देता है, जिसने हिंद महासागर में बंगाल की खाड़ी में चीन को बंदरगाह दिया है। इसके अलावा बांग्लादेश ने चीन को चटगांव बंदरगाह सौंप दिया है। श्रीलंका ने हंबनटोटा बंदरगाह ९९ साल की लीज पर दिया है। इधर पाकिस्तान ने ग्वादर का बंदरगाह चीन को सौंप दिया है। चीन हिंद महासागर में ‘स्ट्रिंग्स ऑफ पर्ल’ नामक एक रणनीति पर काम कर रहा है, जिससे हिंदुस्थान को चारों तरफ से घेर लिया है। हालांकि चीन व्यापारिक जहाजों के लिए ही है लेकिन इसका उपयोग वह अपनी इस रणनीति के तहत जिसे ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ कहा जाता है। वह अपने लड़ाकू जहाजों को भी भेज सकता है या पनडुब्बियों को भेज सकता है। पिछले दिनों हंबनटोटा बंदरगाह पर एक चीनी पनडुब्बी दिखाई दी थी, जिस पर भारत सरकार ने श्रीलंका सरकार से कड़ा एतराज जताया था। श्रीलंका सरकार ने चीन को एतराज का पत्र भेजा, जिसका चीन ने कोई भी जवाब नहीं दिया। इधर पाकिस्तान में ग्वादर से ५० किलोमीटर दूर पाकिस्तान ने एक और बंदरगाह बनाने के लिए चीनियों को सहमति दी है। इस बंदरगाह का उपयोग चीनी नौसेना के लिए होगा। इस बंदरगाह का नाम जवानी है।
साउथ चायना सी में हिंदुस्थानी जलसेना को एक बंदरगाह वियतनाम ने दिया है। साउथ चायना सी से मलक्का की खाड़ी के लिए बहुत छोटा-सा प्रवेश है, जहां से दुनिया के ६५ प्रतिशत जहाज गुजरते हैं। ८० प्रतिशत जहाज हिंद महासागर से होकर गुजरते हैं, जिसमें चीन का ५ ट्रिलियन डॉलर का व्यापार होता है। इधर मलक्का खाड़ी के मुंह पर हिंदुस्थान का निकोबार द्वीप समूह है। जिस पर इंदिरा पॉइंट नामक द्वीप पर भारत सरकार ने अपनी जलसेना और वायुसेना का अड्डा बना रखा है। मलक्का जल डमरू मध्य चीन के लिए बहुत ज्यादा महत्व रखता है। फिलहाल निकोबार में एक और द्वीप को नौ सैनिक अड्डा और वायु सैनिक अड्डा बनाने का प्लान है, जिससे मलक्का जल डमरू मध्य से कोई जहाज बिना हिंदुस्थानी नौसेना की अनुमति के नहीं गुजर सकेगा। चीन ने इंडोनेशिया को अपने कर्ज के जाल में फांसकर एक बंदरगाह लिया था, जहां उसकी जलसेना तैनात होती थी लेकिन इंडोनेशिया ने उनका पैसा चुका दिया और उनसे नमस्ते कर लिया।
फिलहाल चीन की जलसेना के लिए मालद्वीप में एक अड्डा मिला है। दूसरा अड्डा पाकिस्तान के नए जवानी में है। तीसरा अड्डा अप्रâीका के तंजानिया में है। यहां चीनी जलसेना बेड़े डाल सकती है। लेकिन हंबनटोटा, म्यांमार का बंदरगार, बांग्लादेश का चटगांव, पाकिस्तान का ग्वादर इसके अलावा फारस की खाड़ी में एक बंदरगाह है। यहां वे अपनी जलसेना ले भी जाएं तो ये देश कुछ भी नहीं कर सकते।
सन् १९७१ की जंग में चीन को रोकने के लिए एक ही धमकी काफी थी कि मलक्का जल डमरू मध्य से हम उनकी आवाजाही रोक देंगे इसीलिए चीन चुपचाप बैठ गया। वरना वह जरूर हिंदुस्थानी सीमाओं पर युद्ध के दौरान तनाव पैदा करता।
मलक्का जल डमरू मध्य से चीन, जापान, कोरिया, फिलीपींस, वियतनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलाया, सिंगापुर का व्यापार होता है। यह दुनिया का ६५ फीसदी व्यापार है। चीन जल डमरू मध्य के बीच से व्यापार भी करता है और खाड़ी देश में से तेल भी ले जाता है, जिसकी चीन में बहुत ज्यादा कमी है क्योंकि चीन में तेल एक प्रतिशत भी नहीं निकलता। चीन अपनी इस कमजोरी को समझता है। अगर उसकी तेल की सप्लाई लाइन बंद हो जाए तो वह युद्ध करने की स्थिति में नहीं रह सकता इसीलिए उसने ग्वादर- पाकिस्तान से तेल ले जाने का रास्ता खोला है। चीन ने इसीलिए तेल भंडारण बढ़ा लिया है। किसी युद्ध की स्थिति में उसके पास ४५ दिनों का तेल भंडारण रहता है लेकिन यह तेल भंडार ६० दिनों तक का हो सकता है मगर दूसरी व्यापारिक गतिविधियों और आम लोगों के लिए तेल उपलब्ध न कराया जाए तो ही।
रूस इस स्थिति में चीन के साथ खड़ा है क्योंकि रूस का बहुत सारा अच्छा सामान चीन लेता है लेकिन रूस एक तरह से अपनी आर्थिक कमजोरियों के चलते चीन के साथ है, यह साथ कितने दिनों तक रहेगा? कहा नहीं जा सकता। कुल मिलाकर अगले विश्व युद्ध का अखाड़ा हिंद महासागर बनकर तैयार खड़ा है। अमेरिकी विरोध स्वरूप रूस और ईरान भी उसका साथ दे सकते हैं। यूरोपियन यूनियन और सारा विश्व करीब-करीब अमेरिका के साथ खड़ा है। चीनी सेना जो कि दूसरी बड़ी सेना है जमीन पर तो बहुत ज्यादा प्रभावशाली है लेकिन आकाश और पानी में उसकी सेना बिल्कुल अप्रभावशाली है क्योंकि इसके लिए तकनीक की जरूरत होती है, जो चीन के पास घटिया ह्यूमन मटीरियल होने की वजह से एकदम कमतर है।
बहुत मजेदार किस्सा है। एक भाजपा समर्थक व्यक्ति ने मुझे व्हॉट्सऐप पर एक मैसेज भेजा- ‘बर्फ में भारतीय सेना के जवान खड़े थे और उन्होंने लिख रखा था कि चीन का कोई भी सामान न खरीदें।’ एक दिन मैंने उनसे पूछा ये टेलीफोन आपके पास वैâसे है? चीन का बना। वे बोले- ‘मेरे दामाद की इसी की दुकान है।’ वे जानते थे मेरे घर में कोई विदेशी वस्तु नहीं आती है। मुझे सैमसंग का एक फोन मिला, मेरे भतीजे ने गिफ्ट में दिया। मेरे घर में अधिकांश सामान हिंदुस्थान का बना ही आता है।
आम हिंदुस्थानी को नहीं मालूम तीसरे विश्व युद्ध की आहटें आ रही हैं। चीन की अर्थव्यवस्था विशाल से विशालकाय होती चली जा रही हैं। चीन अप्रâीकी देशों में जो पैसा लगा रहा है, उस पर ८ प्रतिशत ब्याज लेगा यानी चीन ने तंजानिया, केनिया, मोंजाबिक के साथ ही बहुत सारे अप्रâीकी देशों को अपने शिकंजे में जकड़ रखा है और मजेदार बात यह है कि हिंदुस्थान से अलग हुआ पाकिस्तान इस शिकंजे में जकड़ चुका है। यहां ८ प्रतिशत की ब्याज दर पर उन्होंने सड़क बनाई ग्वादर तक और उस पर चीनी ट्रक दौड़ेंगे। चीन के फायदे के लिए वह सड़क है। पाकिस्तान को अगले साल ६ अरब डॉलर ब्याज चुकानी है। पाकिस्तान आईएमएफ के पास पैसे मांगने गया। आईएमएफ ने कहा- आप चीन का ब्याज देने के लिए कर्ज नहीं ले सकते। पाकिस्तान तो डूबती नैया है उसके बारे में बोलना ही बेकार है। तीसरा विश्व युद्ध एशिया की जमीन पर लड़ा जाएगा और हिंद महासागर इसका अखाड़ा होगा।