" /> तेल का तिकड़म क्या है?, कसौटी पर है तेल की कीमतों में वृद्धि,

तेल का तिकड़म क्या है?, कसौटी पर है तेल की कीमतों में वृद्धि,

देश में पेट्रोल और डीजल की कीमत लगातार उछाल पर है। फिर भी, यह बड़ा मुद्दा नहीं बन पा रहा है, जबकि महंगाई से सभी त्रस्त हैं। इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) की वेबसाइट के अनुसार २४ जून २०२० को कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में एक लीटर पेट्रोल की कीमत क्रमश: ८१.४५, ८६.५४ और ८३.०४ रुपये प्रति लीटर थी, जबकि एक लीटर डीजल की कीमत इन महानगरों में क्रमश: ७५.०६, ७८.२२ और ७७.१७ रुपये थी. वहीं, दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत ७९.७६ रुपये थी जबकि एक लीटर डीजल की कीमत ७९.८८ रुपये। गौरतलब है कि मुंबई में पेट्रोल और डीजल की कीमत देशभर में सबसे ज्यादा है, जिसका कारण राज्य सरकार द्वारा पेट्रोल एवं डीजल पर ज्यादा कर आरोपित करना है।

देशभर में २४ जून, २०२० को डीजल की कीमत में लगातार १८वें दिन बढ़ोत्तरी हुई है और दिल्ली में पहली बार २४ जून को यह पेट्रोल से ज्यादा महंगी हो गई। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. विगत १८ दिनों में डीजल की कीमत कुल १०.४८ रुपये प्रति लीटर बढ़ी है, जबकि पेट्रोल ८.५० रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ है।

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि होने का कारण इनपर ज्यादा कर आरोपित करना है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि हुई है। कोरोना महामारी के दौरान वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत में मार्च और अप्रैल में भारी गिरावट आई थी। उस दौरान भारत में कच्चे तेल का बास्केट वर्ष २०१९-२० के औसत ६०.६ डॉलर प्रति बैरल स्तर का एक तिहाई यानी २० डॉलर प्रति बैरल रह गया था। इसलिये, तेल की कीमत को नियंत्रित करने के लिये तेल उत्पादक देशों द्वारा इसके उत्पादन में योजनाबद्ध तरीके से कमी करने का फैसला लिया गया। इसी वजह से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में फिलहाल मामूली वृद्धि हुई है।

भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है। यहां ७५ से ८० प्रतिशत कच्चा तेल आयात किया जाता है, जबकि २० से २५ प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन भारत खुद करता है। भारत में कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली ऑयल इंडिया, ओएनजीसी, रिलांयस इंडस्ट्री,केयर्न इंडिया आदि कंपनियां हैं। सरकार ने २०१० में पेट्रोल की कीमत को और वर्ष २०१४ में डीजल की कीमत को नियंत्रणमुक्त कर दिया गया था। पुनश्चः पेट्रोल एवं डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य (आरएसपी) के रोज मूल्य निर्धारण की व्यवस्था को १६ जून, २०१७ से देशभर में लागू किया गया। इसका यह अर्थ हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में उतार-चढ़ाव के अनुरूप तेल की कीमत का निर्धारण भारत में होगा। यानी जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत ज्यादा होगी तो भारत में भी तेल की कीमत में बढ़ोतरी होगी। इसी तरह, जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत कम होगी तो भारत में भी तेल की कीमत में कटौती की जायेगी।

रोज पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आवश्यक वस्तुओं जैसे, खाद्य पदार्थों, अनाज, फल और सब्जियों की कीमतों पर पड़ता है। पेट्रोल एवं डीजल की कीमत बढ़ने पर कारोबारी भी वस्तुओं, अनाजों एवं सब्जियों की कीमत को बढ़ा देते हैं। सरकार को पेट्रोल एवं डीजल से मुख्य तौर पर दो तरह के फायदे हो रहे हैं। पहला, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कम कीमत होने के कारण इसके आयात पर विदेशी मुद्रा कम खर्च करना पड़ रहा है, क्योंकि भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है। दूसरा, पेट्रोल एवं डीजल पर अधिक कर आरोपित करके केंद्र एवं राज्य सरकारें ज्यादा राजस्व कमा रही हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग आधा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकार के करों का होता है। पेट्रोल की कीमत में केंद्र और राज्य सरकारों का करों में ५० प्रतिशत हिस्सा होता है, जबकि डीजल की कीमत में करों में इनका ४६ प्रतिशत हिस्सा होता है। मौजूदा समय में तेल के बाजार पर ९५ प्रतिशत हिस्सा तीन सरकारी कंपनियों यथा, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन का है, जिसके कारण तेल कंपनियों को मिलने वाला फायदा भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को मिल रहा है।

कच्चे तेल के गणित को समझने के लिये अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कैसे उतार-चढ़ाव होता है को समझना जरूरी है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के लेन-देन में खरीदार, बेचने वाले से निश्चित तेल की मात्रा पूर्व निर्धारित कीमतों पर किसी विशेष स्थान पर लेने के लिये सहमत होता है। ऐसे सौदे नियंत्रित एक्सचेंजों की मदद से संपन्न किये जाते हैं। कच्चे तेल की न्यूनतम खरीदारी १,००० बैरल की होती है। एक बैरल में करीब १६२ लीटर कच्चा तेल होता है। चूंकि कच्चे तेल की कई किस्में व श्रेणियां होती हैं। इसलिए, खरीदार एवं विक्रेताओं को कच्चे तेल का एक बेंचमार्क बनाना होता है। इसके बरक्स ‘ब्रेंट ब्लेंड’ कच्चे तेल का सबसे प्रचलित वैश्विक मानदंड है। इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्सचेंज (आइपीई) के अनुसार दुनिया में दो तिहाई कच्चे तेल की कीमतें ‘ब्रेंट ब्लेंड’ के आधार पर तय की जाती है। इसी तरह अमेरिका का मानदंड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआइ) है। १५ विभिन्न कच्चे तेल की कीमत से ओपेक बॉस्केट की कीमत का निर्धारण किया जाता है। ओपेक, बाजार में तेल पर नियंत्रण रखता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल प्रति बैरल के हिसाब से खरीदा और बेचा जाता है। ओपेक द्वारा निर्धारित जिस कीमत पर भारत पेट्रोल खरीदता है का लगभग ४८ प्रतिशत उसका आधार मूल्य होता है, जो काफी कम होता है।

पेट्रोल और डीजल की कीमत की नई दरें देश में सुबह ६ बजे से लागू होती है। पेट्रोल एवं डीजल के आधार कीमत में कच्चे तेल की कीमत, प्रोसेसिंग चार्ज और कच्चे तेल को शोधित करने वाली रिफाइनरी चार्ज शामिल होता है। अमूमन, रिफाइनिंग चार्ज प्रति लीटर चार रुपये आरोपित किया जाता है। आधार कीमत पर केन्द्र सरकार उत्पाद शुल्क आरोपित करती है। इसके बाद, ओएमसी कंपनी डीलर को तेल बेच देती है और डीलर तेल की कीमत पर अपना कमीशन और राज्य सरकार द्वारा लगाया जाने वाला कर वैट जोड़ता है। फिर, इसपर सेस (पर्यावरण उपकर) जोड़कर पेट्रोल एवं डीजल की अंतिम कीमत का निर्धारण किया जाता है। तदुपरांत, तेल की कीमत के निर्धारण में परिवहन भाड़ा, कमीशन, दूसरे प्रभार आदि आधार कीमत में जोड़े जाते हैं। इसतरह, पेट्रोल एवं डीजल की कीमत मूल कीमत से बढ़कर दोगुनी से अधिक हो जाती है।

कोरोना महामारी के कारण करोड़ों लोग अपने रोजगार से हाथ धो बैठे हैं। लॉकडाउन को अनलॉक करने से लोग पुनः रोजगार की तलाश में या नौकरी पर जाने के लिये यात्रायें कर रहे हैं, लेकिन पेट्रोल और डीजल की कीमत रोज बढ़ने से उनकी परेशानियां बढ़ रही हैं, लेकिन इससे राजस्व की कमाई हो रही है, जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है।