…तो वापस अयोध्या मंदिर बनाने की जिद के साथ आना पड़ेगा!

राम मंदिर में राम भक्त के रूप में प्रभु रामचंद्र का दर्शन करूं, ऐसी मेरी इच्छा है लेकिन यदि मंदिर नहीं बना, बनाया नहीं गया तो मजबूरन यहां फिर मंदिर बनाने की जिद के साथ आना पड़ेगा, ऐसा स्पष्ट मंतव्य शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने कल अयोध्या में व्यक्त किया। दैनिक ‘सामना’ के कार्यकारी संपादक संजय राऊत ने उद्धव ठाकरे से अयोध्या में विशेष चर्चा की। इस दौरान उन्होंने शिवसेनाप्रमुख और अयोध्या का भावनात्मक नाता, राम जन्मभूमि, वहां पर मेरा अनुभव, राम मंदिर के सवाल पर सरकार का रुख, भाजपा की राम मंदिर के बारे में नीति, ऐसे विभिन्न मुद्दों के बारे में पूछे गए सवालों के उन्होंने बेबाकी से जवाब दिए। उन्होंने शिवसैनिकों द्वारा अयोध्या में किए गए काम की सराहना भी की।

राम जन्मभूमि का दर्शन करके लौटते समय आपके मन में क्या विचार आ रहे हैं?
अभी मैंने जो शब्द इस्तेमाल किए, वह केवल शब्द नहीं बल्कि मेरा अनुभव था। इतने वर्षों से हम राम मंदिर, राम जन्मभूमि, अयोध्या सुनते आ रहे हैं। कल से मैं अयोध्या में हूं लेकिन दिल से कहता हूं कि आज जब मैं राम जन्मभूमि पर गया और प्रभु श्रीराम की मूर्ति के समक्ष खड़ा हुआ तब एक अनोखा अहसास मुझे महसूस हुआ। एकदम रोमांचित करनेवाला कहो अथवा वहां जो शक्ति है, उसका अनुभव मुझे महसूस हुआ इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि इस मुद्दे से अब खेल खेलने की बजाय जल्द से जल्द राम मंदिर का निर्माण हो जाना चाहिए। क्योंकि यह सवाल सिर्फ अयोध्या, उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। मैं तो कहूंगा कि हिंदुस्थान तक भी सीमित नहीं है बल्कि समूचे विश्व की िंहदू अस्मिता का सवाल है। राम मंदिर हमारे देश में होना, राम जन्मभूमि की जगह पर होना, यह एक देश का पहचानपत्र अथवा पहचान का प्रतीक है। हम जो राम राज्य कहते हैं, राम राज्य मतलब न्याय और समरसता का राज्य। इस देश में न्याय और सत्य का राज। ये जो है, यदि आपको दिखाना है तो, यदि अपनी पहचान बतानी होगी तो जल्द से जल्द राम मंदिर का निर्माण होना आवश्यक है।
उद्धव जी, आप इस समस्या को राष्ट्रीय दृष्टि से देखते हैं या धार्मिक दृष्टि से?
दुर्भाग्य से इस समस्या को कुछ लोगों ने राजनीति से जोड़ दिया है। इतना तय है कि सरकार की मदद के बगैर कुछ नहीं होगा क्योंकि अब इस मुद्दे को कानून के कटघरे में फंसा दिया गया है इसलिए इसे यदि हल करना होगा तो सरकार को आगे आकर कानून बनाना होगा। अध्यादेश लाना होगा और राम मंदिर, जो कानून के कटघरे में फंसा है, उस समस्या को हल करना होगा।
 आप दो दिन से यहां के दौरे पर हैं। इस दौरान किस पल आपको शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की याद आई? क्योंकि अयोध्या का और शिवसेनाप्रमुख का एक भावनात्मक नाता रहा है।
मैंने कल संत-सम्मेलन में कहा था। याद उसकी आती है, जिसे हम भूल जाते हैं। मुझे एक भी पल ऐसा नहीं लगा कि मुझे शिवसेनाप्रमुख की याद आई। मैं उनकी प्रेरणा से यहां आया हूं। मुझे हमेशा ऐसा महसूस होता है कि ऐसे मौकों पर वे कहीं न कहीं मेरे साथ हैं। वे जो कुछ भी आदेश देते हैं, उसके मुताबिक हम काम करते हैं, ऐसी मेरी सोच और नीति है।
आपके इस दौरे के बाद समूचे देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होता दिख रहा है। राम मंदिर २५ साल बाद एक बार फिर देश की राजनीति का केंद्र बिंदु बन गया है। २५ साल पहले जब शिवसेनाप्रमुख हमारे बीच थे, तब उनके ईर्द-गिर्द राम मंदिर की राजनीति घूमती थी। आज यह आपके ईर्द-गिर्द घूम रही है। इसमें मोदी सरकार पर आप शिवसेना की हैसियत से किस तरह का दबाव…
पहली बात मैं पूरी ईमानदारी से कहता हूं कि यह केंद्र बिंदु मैं नहीं हूं। आज भी शिवसेनाप्रमुख ही हैं क्योंकि आपने देखा होगा, जब मैं राम मंदिर में दर्शन के लिए गया था, असंख्य हिंदू चाहे वे विश्व हिंदू परिषद के होंगे अथवा कोई भी होंगे और कहीं से भी होंगे, उन पर लेबल लगाना गलत है। लेकिन मुझे देखने के बाद उन्होंने ‘बालासाहेब जिंदाबाद’ के नारे लगाए। मतलब यह भी एक तेज ही है। मैं तो ऐसा समझता हूं कि यह एक विचारधारा है, परंपरा है। मैं इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा हूं। दबाव डालने का मुद्दा यदि राम मंदिर के लिए आता होगा और वह भी हिंदुस्थान में तो इसके जैसा दुर्भाग्य नहीं है। जिस दल ने राम मंदिर के नाम पर वोट मांगे और सत्ता में आए, आप उन दिनों को भी याद करो। जो मुद्दा, अथवा उल्लेख आपने किया २५ साल पहले के दौर का, उस समय भारतीय जनता पार्टी के सिर्फ दो सांसद थे। शिवसेनाप्रमुख ने देश में पहली बार दिखा दिया कि देश में हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव सिर्फ लड़ा नहीं जाता बल्कि चुनाव जीता भी जा सकता है। विलेपार्ले के उपचुनाव में जब शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख ने हिंदुत्व के मुद्दे पर जीत हासिल की तब राम मंदिर मुद्दा नहीं था। तब हिंदुत्व ही मुद्दा था। उसके बाद वर्ष १९८९ से रथयात्रा निकाली गई, राम मंदिर का मुद्दा आया और दो का ८० और ८० का १८० तथा १८० का २८० तक इस तरह से भाजपा का राजनैतिक सफर चला। वोट मांगते समय ‘राम राम’ करना और बाद में आराम करना, यह रोज का खेल बन गया है। इसे कहीं तो खत्म करना चाहिए इसलिए चुनाव के मुहाने पर मैंने राम मंदिर के मुद्दे को हाथ लगाया है।
आपने दर्शन के लिए राम मंदिर में जब प्रवेश किया तब वहां जो दर्शनार्थी आए थे, उन्होंने आपको देखकर ‘ठाकरे जी, राम मंदिर बनाइए’, ऐसी स्वयंस्फूर्त नारेबाजी की। लोगों की अथवा देशभर के हिंदुओं की अब एक बार फिर राम मंदिर निर्माण के संबंध में आपसे उम्मीद है। (उद्धव ठाकरे के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई), ऐसा आपको महसूस हुआ क्या?
निश्चित तौर पर महसूस किया और मैंने जो आपको अभी उत्तर देते हुए कहा कि ठाकरे जी का मतलब बालासाहेब और आज भी उन्हें लगता होगा कि बालासाहेब ही मंदिर का निर्माण करवा सकते हैं। उनकी शिवसेना और शिवसैनिक ही यह काम कर सकेंगे। मुझसे सवाल पूछा गया कि सरकार ने नहीं बनाया तो आप बनाओगे क्या? उस समय पत्रकार परिषद में मैंने कहा कि सरकार सबसे शक्तिशाली होती है। यह सरकार इतनी मजबूत सरकार है कि कोई समर्थन हटा ले तो फिर भी ये सरकार नहीं गिरेगी। इतनी मजबूत यह सरकार है तो फिर निश्चित तौर पर यह ताकत कहां दिखाई जाती है? जिन मुद्दों से तुमने यह ताकत कमाई है, उस ताकत को उन मुद्दों के लिए इस्तेमाल नहीं करते होंगे तो उस ताकत का कोई लाभ नहीं।
इस माध्यम से महाराष्ट्र से अयोध्या के बीच आपने एक रामसेतु का निर्माण कर दिया है और रामायण में रामसेतु महत्वपूर्ण है। रामसेतु के बाद लंका पर विजय हासिल हुई तो इस रामसेतु के मार्ग पर और इस मार्ग से जाते समय आप देश की राजनीति में कौन सी भूमिका निभाते हो?
पहली बात पूरे मन से कहता हूं कि इस रामसेतु को बनाने का काम शिवसेनाप्रमुख की शिवसेना ने किया है। फिर आप खुद हो, संजय राऊत, एकनाथ शिंदे हैं, हमारे अनिल परब हैं, महापौर हैं, सुनील प्रभु हैं, अनिल देसाई हैं, ऐसे तमाम नासिक के शिवसैनिक थे। कई मतलब असंख्य शिवसैनिक हैं। अर्थात असंख्य पृष्ठ भर जाएंगे लेकिन नाम शेष रह जाएंगे। इन तमाम शिवसैनिकों के कारण ही मेरी अयोध्या यात्रा की शुरुआत हुई।
फिर कब…
मेरी तो इच्छा है कि जल्द से जल्द राम मंदिर का निर्माण हो और राम भक्त के रूप में प्रभु राम के दर्शन के लिए आऊं लेकिन यदि राम मंदिर नहीं बना, बनाया नहीं गया तो मुझे फिर यहां मंदिर बनाने का निश्चय करके आना पड़ेगा।