थके हुए दल की कहानी!

लगभग डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास और सबसे अधिक कालावधि में सत्तापक्ष में रहनेवाली कांग्रेस पार्टी की हालत फिलहाल क्या है, इस सवाल का उत्तर उसी पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं ने दी है। एक हैं सलमान खुर्शीद और दूसरे हैं अपने सुशील कुमार शिंदे। खुर्शीद मियां ने तो मतदान के पहले यहां तक कह दिया कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए जीतना कठिन है। उन्होंने ये भी भविष्यवाणी कर दी है कि पार्टी का भविष्य अंधेरे में है। इधर सोलापुर में सुशील कुमार शिंदे ने खुर्शीद मियां के इस बयान में हवा भर दी कि ‘कांग्रेस पार्टी अब थक चुकी है।’ इस बयान में उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस को भी खींच लिया है। ‘राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी अब थक चुकी है। शरद पवार की उम्र हो गई है। जिस मुद्दे पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का निर्माण हुआ वो मुद्दा भी अब शेष नहीं रहा। इसलिए भविष्य में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का विलीनीकरण हो जाएगा।’ ऐसे पटाखे सुशील कुमार ने फोड़े हैं। हालांकि राष्ट्रवादी के अध्यक्ष शरद पवार ने शिंदे के पटाखों की बाती निकाल डाली है। ‘शिंदे अपनी पार्टी के बारे में बोल रहे होंगे। मुझे मेरी पार्टी के बारे में अच्छी जानकारी है’, ऐसा कहते हुए पवार ने विलीनीकरण की ‘शिंदेशाही’ को नकार दिया है। सुशील कुमार ने ये भी कहा कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कभी एक ही वृक्ष के नीचे बढ़े हैं। एक ही मां के बेटे हैं। एक ही मां की गोद में दोनों पार्टियां बढ़ी हैं। उनका कहना गलत नहीं है क्योंकि कांग्रेस में ‘माई’ जो कहती है वही पूर्व दिशा मानी जाती है और राष्ट्रवादी में जो ‘बाप’ कहे उसी को पूर्व दिशा के रूप में स्वीकार किया जाता है। ऐसे समय में दोनों पार्टियों के विलीनीकरण का मुद्दा फुसकी निकलना ही था। पवार कहते हैं, मैं थका नहीं हूं। वे जिस प्रकार इस उम्र में भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं, घूम रहे हैं उसे देखते हुए उनके इस दावे को सच मान भी लिया जाए तो भी उनकी पार्टी कांग्रेस की तरह थक चुकी है। उनके नेता-कार्यकर्ता वहां रहने को तैयार नहीं और उन्हें झेलने की ताकत पार्टी में रह नहीं गई। रहा मामला कांग्रेस का और उनके नेताओं के दावों का। खुर्शीद हों या सुशील कुमार दोनों वरिष्ठ नेता हैं। वे कांग्रेस पार्टी के और उसमें भी गांधी खानदान के निष्ठावान हैं इसलिए उनके बयान का महत्व होता है। इसमें गलत कुछ भी नहीं है। कांग्रेस हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस। वर्तमान राजनीति में दोनों ‘थके हुए घोड़े’ ही हैं। उनके घुड़सवारों की जांघों में बल नहीं रहा। चुनाव की दौड़ में दोनों घोड़ों पर ‘जैकपॉट’ नहीं लग रहा, ये २०१६ से बार-बार साबित हो रहा है। इसलिए नाम में कांग्रेसवाले दोनों पार्टियां थक चुकी हैं। कांग्रेस पार्टी तो इतनी थक चुकी है कि राहुल ‘जॉकी’ नहीं बनना चाहते और फिर एक बार सोनिया गांधी पर ‘थकी हुई’ पार्टी की बागडोर संभालने की नौबत आन पड़ी है। बढ़ती उम्र के कारण वे भी थक चुकी हैं। फिर भी उन्होंने पार्टी की लगाम थामी है। लोकसभा चुनाव में राहुल के नेतृत्व से थोड़ी आस जगी थी। उनका साथ देने के लिए प्रियंका गांधी नामक ‘टॉनिक’ भी पार्टी को देने का प्रयास किया गया। हालांकि इसका कोई नतीजा नहीं निकल पाया। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस चित हो गई। जिन तीन-चार राज्यों में उनकी पार्टी सत्तारूढ़ है उन राज्यों का कार्यभार बुजुर्गों के हाथों में ही है। तो कांग्रेस नामक डेढ़ सौ साल पुरानी पार्टी थकेगी नहीं तो और क्या होगा? पहले कम-से-कम पार्टी में बुजुर्गों और युवाओं का समावेश दिखता था। अब युवा कम और वृद्ध ज्यादा दिखते हैं। इसमें भी बुजुर्ग नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच में फासला होने के कारण पार्टी थकेगी नहीं तो और क्या होगा? ये सब ठीक होने की अपेक्षा एमआईएम के ओवैसी को भी नहीं है क्योंकि उन्होंने हाल ही में बयान दिया था कि वैâल्शियम का इंजेक्शन देने के बावजूद कांग्रेस पार्टी दोबारा खड़ी नहीं हो पाएगी। इसलिए सुशील कुमार जी आप जो कह रहे हैं वो सही है। कांग्रेस पार्टी थके हुए लोगों की पार्टी है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले सब कुछ कर लिया और अब थक गए। उनकी ऐसी अवस्था हो चुकी है। इसलिए जनता भी उन्हें वोटों की टॉनिक देने को तैयार नहीं और नेता-कार्यकर्ता इस पार्टी में रहने को तैयार नहीं। कांग्रेस हो या नाम में कांग्रेसवाली राष्ट्रवादी हो, दोनों ‘थकी हुई पार्टियों की कहानी’ हैं। सुशील कुमार बोले और शरद पवार ने अपनी आदत के अनुसार उसे नकार दिया, इतना ही।