" /> थोरात की कुरकुर नहीं!, विखे की टुरटुर!

थोरात की कुरकुर नहीं!, विखे की टुरटुर!

दुनिया भर में व्यंग्य साहित्य में विस्मृति विनोद का एक हिस्सा बन गया है। मराठी रंगमंच और पर्दे पर भी, विशेष रूप से ‘भुलक्कड़’ चरित्र को लाकर हास्य पैदा किया जाता है। ऐसे भुलक्कड़ चरित्र की सूची में नगर जिला के राधाकृष्ण विखे पाटील का नाम जुड़ गया है। समय-समय पर वे यह प्रयोग करने की कोशिश करते रहते हैं कि भूलने की कला में वे किस प्रकार पारंगत हासिल किए हुए हैं। कुछ दिनों पहले विखे महाशय ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बालासाहेब थोरात के बारे में एक महान टिप्पणी करते हुए कहा, ‘इतने सालों से कांग्रेस के साथ रहा, लेकिन हमने पहले कभी भी किसी प्रदेश अध्यक्ष को सत्ता के लिए इतना लाचार नहीं देखा।’ इस पर थोरात कहां चुप बैठनेवाले थे! थोरात ने कहा, ‘मैंने कई बार विखे को पिछले मुख्यमंत्री के पैर छूते देखा है!’ इस पर भुलक्कड़ विखे की बोलती बंद हो गई। कांच के घरों में रहनेवाले लोग दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते, यदि विखे इस सरल नियम को भूल गए हैं, तो उनके लिए राजनीति से तुरंत दूर होना ही बेहतर है। विखे कई वर्षों तक कांग्रेस पार्टी में थे और अब यह इतिहास बन चुका है। वे दल बदलने की कला अच्छी तरह से जानते हैं और पिछली पार्टी में उन्होंने जो धंधे किए, उसे भूल जाने में भी वे पारंगत हैं। विखे का पेटदर्द यह है कि नगर जिले की राजनीति में उनके प्रतिद्वंद्वी बालासाहेब थोरात अब सत्ता में हैं और चुनाव से पहले सत्ता के लिए भाजपा के कदमों में लीन होने के बावजूद वे वनवास भोग रहे हैं। राजनीति में एक आचार संहिता बनाए जाने की आवश्यकता है, जिसके आधार पर लाचारी और बेईमानी जैसे शब्दों के प्रयोग कौन किसके लिए करेगा, ये तय हो सके। जब विखे जैसे नेता थोरात पर लाचार आदि जैसे शब्दबाण छोड़ते हैं, तो उनका भुलक्कड़पन अच्छा लगता है। विखे जिस किसी भी राजनीतिक दल में जाते हैं, वे उसके प्रति कभी भी वफादार नहीं रहते। विखे कांग्रेस पार्टी में थे। उनका आज का सारा वैभव व सम्राज्य कांग्रेस की ही देन है। वे और उनका परिवार अपने पैरों को फैलाए नगर जिले में कांग्रेस की खटिया पर आजतक बैठे थे, एक दिन विखे सपरिवार शिवसेना में शामिल हो गए। उन्होंने राज्य में और केंद्र में मंत्री पद संभाला और बाद में कांग्रेस पार्टी में फिर से शामिल होकर सत्ताधारी बन गए। कांग्रेस से सत्ता में रहे और २०१९ के चुनावों से पहले वह फडणवीसवासी बन गए। वर्तमान की कुटिल राजनीति में इससे कुछ अलग होने की संभावना नहीं है। लेकिन अपनी बात छिपाए रखना और दूसरों के कामों को देखने के चाहत की विकृति अपने चरम तक नहीं पहुंचनी चाहिए। विखे ने थोरात पर हमला किया। क्यों? क्योंकि बालासाहेब थोरात और अशोक चव्हाण ने कुछ मांगों को लेकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाकात की। एक घंटे तक उनके साथ चर्चा की। यह चर्चा राज्य के सामने आनेवाले संकट के बारे में थी। थोरात ने कहा कि वह चर्चा से संतुष्ट थे। दूसरे शब्दों में, थोरात ने आश्वासित किया कि महाविकास आघाड़ी स्थिर और मजबूत है। इस पर विखे-पाटील के पेट में उथल-पुथल मचने का कारण क्या है? विखे फिलहाल कांग्रेस पार्टी में नहीं हैं। उन्हें उस पार्टी के बारे में बात करनी चाहिए जिसमें वे फिलहाल हैं। लेकिन सत्ता न होने पर कुछ लोग जल बिन मछली की तरह तड़पते हैं। विखे उसी तड़पनेवाली मछली के प्रतिनिधि हैं। संकट के समय में सबसे ज्यादा काम विपक्ष का ही होता है। राज्य या देश पर जब संकट आता है तो विरोधी दल को चाहिए कि वह सरकार का साथ दे लेकिन महाराष्ट्र के विरोधी दल में कुछ ‘दल-बदलू’ घुस आए हैं। इसलिए विपक्ष ने अपनी ही छवि धूमिल कर ली है। हम विधानसभा में विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस के जुनून और बेकरारी को समझ सकते हैं। एक बार कोरोना का टीका मिल सकता है, लेकिन विपक्ष की इस बेचैनी का हल खोजना मुश्किल है। कम-से-कम फडणवीस खुद भाजपा-संघ परिवार के सौ नंबरी कार्यकर्ता हैं, लेकिन हमें आश्चर्य होता है भाजपा की गोद में बैठकर ठाकरे सरकार की आलोचना करनेवाले ‘दल-बदलुओं’ पर। नगर जिले में इस तरह के एक-दो दल-बदलू हैं और दो-एक कोंकण में हैं। उनमें से हर मामले में यह देखा गया कि महाराष्ट्र उन लोगों को माफ नहीं करता जो मूल पार्टी में सब सुख भोगकर सत्ता का आनंद लेने के लिए दल-बदल लेते हैं। विखे-पाटील विपक्ष के नेता थे और वे भाजपा में विलीन हो गए। इस तरह के साहस (लाचारी नहीं!) को साधने में बहुत मेहनत लगती है। यही कहना होगा कि थोरात और अन्य लोगों की मेहनत इस तरह के मामले में कम पड़ गई। जब पार्टी संकट में थी तब जो चूहों की तरह नहीं कूदे और डूबते जहाज को बचाने की कोशिश की, ऐसे लोगों को इतिहास के पन्नों में जगह मिली। ऐसे किसी पृष्ठ पर विखे-पाटील हैं क्या? विखे-पाटील के कांग्रेस छोड़ने से कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं हुआ और भाजपा में शामिल होने से भाजपा को धेले भर का कोई फायदा भी नहीं हुआ। अगर विखे उस समय नहीं भागे होते, तो वे आज सरकार में कांग्रेस के नेता होते। वह स्थान नियति द्वारा थोरात को दिया गया। दल बदलने की राजनीति हमेशा काम नहीं करती। भाजपा पर विखे-पाटील ने क्या-क्या मैला फेंका है, उन्हें याद कर लेना चाहिए। विखे-पाटील कभी-कभी कहते हैं, ‘हम भाजपा में खुश हैं।’ जो विखे को जानते हैं, वे इस पर विश्वास नहीं करेंगे। मति मारी गई जो भाजपा में गया। इस चिढ़ से वे अपने बाल नोंचते बैठे होंगे। महाराष्ट्र की ‘ठाकरे सरकार’ स्थिर है। एक-दूसरे का सम्मान करते हुए राजसत्ता चल रही है। बहुत पहले ‘थोरातांची कमला’ फिल्म रिलीज हुई थी। अब ‘विखे-पाटीलांची कमला’ नाम की एक फिल्म आई और चली गई। देखते हैं कांग्रेस की खटिया कुरकुर कर रही है क्या, लेकिन विखे की ‘टूर एंड ट्रैवल’ कंपनी बंद हो चुकी है, लेकिन उनकी टुरटुर जारी है। असफलता, और क्या!