दरी के नीचे की हलचल

लालू यादव की पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी भी अपने किसी एक बयान से सनसनी पैदा कर सकती हैं इसे राजनीति का आश्चर्य ही मानना होगा। राबड़ी देवी बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में किसी को याद नहीं हैं। उस समय और आज भी वे सिर्फ लालू यादव का ‘चूल्हा और बच्चा संभालनेवाली पत्नी’ के रूप में ही परिचित हैं। राबड़ी और लालू एक आदर्श जोड़ी है और उन्हें कुल ९ बच्चे हैं। ‘हम दो हमारे नौ’ इतना भारी काम-काज होने के बावजूद इस जोड़े ने आदर्श संसार निभाया। मुख्यमंत्री पद की शपथ ली उस समय राबड़ी देवी राजभवन की विशेष बुक में हस्ताक्षर भी नहीं कर सकती थीं, लेकिन लालू को जेल में जाना था इसीलिए अपनी कुर्सी पर उन्होंने राबड़ी देवी को विराजमान करवाया था। राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री पद तथा उनकी राजनीतिक हलचलों को कभी किसी ने गंभीरतापूर्वक नहीं लिया। वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थीं तब लालू ही जेल से राज्य का कामकाज हांक रहे थे। इसलिए राबड़ी देवी ने अब प्रशांत किशोर तथा नीतीश कुमार के बारे में जो गोपनीय बयान दिया है उसे बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं। प्रशांत किशोर का हवाला देते हुए राबड़ी देवी ने कहा है कि ‘भाजपा के साथ गए नीतीश कुमार वापस लालू यादव के साथ महाआघाड़ी में आना चाहते थे। नीतीश कुमार का ऐसा कहना था कि उन्हें खुद को महागठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया जाए। नीतीश कुमार का ‘पीके’ मतलब प्रशांत किशोर के माध्यम से ऐसा भी संदेश था कि वे २०२० में लालू पुत्र तेजस्वी को बिहार के मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते हैं। इस बारे में चर्चा करने के लिए श्रीमान प्रशांत किशोर लालू यादव से पांच बार मिले।’ राबड़ी देवी के इस दावे ने निश्चित ही खलबली मचाई है और प्रधानमंत्री पद के अनेक संभावित उम्मीदवारों को निश्चित ही विचार करने को मजबूर किया है। ‘गोपालगंज से रायसीना’ नामक लालू यादव का आत्मचरित्र प्रकाशित हो रहा है। लालू का यह आत्मचरित्र उनके स्वभाव की तरह ही मसालेदार और चटपटा होना ही चाहिए। उनके इस आत्मचरित्र में नीतीश कुमार के बारे में यह तड़का जरा अधिक ही झन्नाटेदार पड़ा दिखाई देता है। बिहार की राजनीति में ऐन चुनाव के समय इस तड़के से कई लोगों को पसीना छूटने लगा है। आत्मचरित्र मतलब गोपनीय चर्चा को बेनकाब कर विश्वसनीयता में दरार लाने जैसा यह मामला है। नीतीश कुमार और लालू यादव ने एक होकर विधानसभा के चुनाव लड़े हैं। उनके पराभव के लिए खुद मोदी तथा उनका संपूर्ण केंद्रीय मंत्रिमंडल बिहार में उतरा था। बिहार में भाजपा को सत्ता मिले इसीलिए आर्थिक ‘पैकेज’ की घोषणा की गई थी। इतना करने के बावजूद बिहार की जनता ने भाजपा को नकार दिया और लालू यादव-नीतीश कुमार की ‘युति’ को प्रचंड बहुमत दिया था। लालू यादव के दल को अधिक सीटें मिलने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया था। वही नीतीश कुमार अगले कुछ माह में भाजपा से जाकर मिल गए यह सच है। लेकिन अब बिहार के राजनीतिक कथा-कथन में जो ‘ट्विस्ट’ आया है वो मजेदार है। भाजपा को छोड़कर नीतीश बाबू को वापस लालू के साथ आना था और ये सभी नए समीकरण मिलाते समय नीतीश बाबू की निगाह दिल्ली के सर्वोच्च पद पर होने का यह विस्फोट है। उसी की खातिर मेल-जोल करने के लिए नीतीश कुमार के दूत के रूप में प्रशांत किशोर के लालू से पांच बार मिलने की विस्फोटक जानकारी सामने आई है। हालांकि प्रशांत किशोर ने इस तरह की मुलाकात से साफ इंकार किया है इसलिए यह विषय खत्म हो गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता। आज नरेंद्र मोदी के सामने दृढ़ता से खड़ा रहे, ऐसा नेता भाजपा में नहीं तथा प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी उनकी पार्टी में कोई दिखाई नहीं दे रहा, लेकिन ये कब? भारतीय जनता पार्टी खुद २७० से २७२ सीटें हासिल कर सकी तब! हम देश की स्थिरता के लिए उन्हें शुभकामनाएं दे रहे हैं, मगर हिंदुस्थान की राजनीति और लोकतंत्र जितनी ‘चंचल’ बात दुनिया में दूसरी कोई नहीं। ऐसे में नीतीश कुमार जैसे नेता की आशा, आकांक्षाओं तथा महत्वाकांक्षाएं अंकुरित होकर फूटने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हालांकि वो समय आएगा, ऐसा आज तो हमें नहीं लगता। लोकतंत्र में हर किसी को कुछ-न-कुछ तो होना ही है। उसके लिए मौका तथा अस्थिरता का इंतजार करनेवाले आज भी हैं। किसी भी हालत में ‘राजग’ को बहुमत न मिले और उस परिस्थिति में नई खिचड़ी पकाई जाए, संसद त्रिशंकु रहे ताकि अपना घोड़ा आगे दौड़ाया जा सके। उसके लिए भगवान को पानी में बिठाए रखनेवालों की वेदनाओं को समझना होगा। नीतीश कुमार ‘सेक्युलर’ हैं इसलिए उन्होंने भगवान को पानी में नहीं बिठाया होगा और राबड़ी देवी क्या बोलीं इसे उन्होंने नजरअंदाज किया होगा, ऐसा हम मानते हैं। लेकिन दरी के नीचे कुछ तो रोमांचक हलचल जारी है, यह मात्र निश्चित है!