‘दाता’ बदला, ‘कटोरा’ कायम!

आर्थिक दिवालिए की दहलीज पर खड़े पाकिस्तान की झोली में चीन ६ अरब डॉलर्स की ‘मदद’ डालनेवाला है। कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा हाल ही में चीन के किए गए दौरे के बाद चीन ने इस तरह का आश्वासन दिया है। इस दौरे के दरम्यान दोनों देशों के बीच कई अनुबंध हुए। लेकिन इमरान का सारा ‘दारोमदार’ जिस पर टिका था, वह चीन से मिलनेवाला ‘आर्थिक पैकेज’। वैसे भी इन दिनों पाकिस्तान की तिजोरी पूरी तरह से खाली है। यह देश इतना कंगाल हो चुका है कि प्रधानमंत्री निवास स्थान की भैंसों को बेचकर २३ लाख रुपए जमा किए गए। इसके अलावा ६१ सरकारी गाड़ियों की नीलामी कर २० करोड़ रुपए जमा किए गए। इतनी भयंकर आर्थिक स्थिति हो जाने के कारण दुनिया के सामने हाथ पैâलाने के अलावा उस देश के पास कोई विकल्प ही नहीं बचा है। पहले कम-से-कम अमेरिका उनके लिए सबसे बड़ा ‘आधार’ था। प्रतिवर्ष अमेरिका अरबों डॉलर्स पाकिस्तान की झोली में ‘आर्थिक सहायता’ के रूप में डाल रहा था। मगर यह सारा पैसा भ्रष्टाचार, घोटाला, अवैध हथियार व्यापार और आतंकवाद के लिए इस्तेमाल किया गया। यही वजह है कि सात दशक खत्म होने के बावजूद पाकिस्तान दरिद्र और पिछड़ा हुआ राष्ट्र ही रहा। व्यापार, उद्योग, कारखानों की अवस्था विकट है। लेकिन गैरकानूनी हथियारों का निर्माण जोर-शोर से हो रहा है। पाकिस्तान की आज ऐसी स्थिति है। ऊपर से दुनिया में उसकी पहचान अब ‘आतंकवादियों के कारखाने’ के रूप में हो गई है। ऐसे में किस मुंह से और किस देश की दहलीज पर आर्थिक सहायता के लिए खड़े हों, यह उस देश के सत्ताधारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल था। ऊपर से पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका का पाकिस्तान प्रेम घटता जा रहा था। कई वर्षों तक अरबों डॉलर्स का ‘दूध’ पिलाकर भी ‘हरा सांप’ अमेरिका पर ‘९/११’ के रूप में पलट गया इसलिए भयभीत और होश में आनेवाले अमेरिका ने पाकिस्तान की आर्थिक नसों को दबाना शुरू कर दिया। अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप ने उस देश की आर्थिक नाकेबंदी ही कर रखी है। सच तो यह है कि इससे पाकिस्तान में सुधार आना चाहिए था और उसे सच्चे अर्थों में विकास के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। जब अमेरिका से कुछ हासिल नहीं हुआ तो उसने अपना चेहरा चीन की ओर घुमा लिया। चीन को भी पाकिस्तान जैसे प्यादे की जरूरत थी ही। इसके अलावा ‘आर्थिक सहायता’ और ‘विकास कार्यों’ के ‘बोझ’ तले दबाकर हिंदुस्थान के पड़ोसी देशों और पूर्व के छोटे देशों को चिन्हित करने की चीन की नीति है। ऐसे समय पाकिस्तान जैसे भ्रष्टाचार, फौजी दादागीरी और आर्थिक-राजनीतिक अराजकता की गर्त में डूबते-उतरानेवाला देश ‘ड्रैगन’ के शिकंजे में अपने आप ही फंसनेवाला था। यही हुआ और हो रहा है। ‘सीपीईसी’ जैसा अपना महत्वाकांक्षी भूत चीन ने पहले ही पाकिस्तान की गर्दन पर बिठा रखा है। अन्य परियोजनाओं के माध्यम से चीन ने उस देश को अरबों डॉलर्स की आर्थिक सहायता की है। चीन की यह मेहरबानी एक दिन पाकिस्तान को उस देश का गुलाम बनाएगी, यह स्पष्ट है। मगर दिवालिया बने पाकिस्तान के पास इसके अलावा कोई और चारा नहीं बचा है। इसके पहले ‘बेल आउट पैकेज’ की विनती पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से की थी। लेकिन उसके लिए चीन के साथ हुए सभी आर्थिक और अन्य अनुबंधों की जानकारी और नियम प्रस्तुत करने की शर्त मुद्रा कोष ने रखी थी। यह मामला पाकिस्तानी सत्ताधारियों और सेनाप्रमुखों के लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल में डालनेवाला और उनकी पोल को खोलनेवाला था। ऐसे में फिर से चीन के दरवाजे पर कटोरा लेकर जाने की राह का चयन किया गया और ‘बंद मुट्ठी ६ अरब डॉलर्स की’, उनके लिए अधिक लाभदायक थी। कल तक सऊदी अरब और अमेरिका ही पाकिस्तान के ‘दाता’ थे और अब ये स्थान चीन ने ले लिया है और पाकिस्तान के हाथ का ‘कटोरा’ आज भी कायम है। इस बर्बादी के लिए पाकिस्तान खुद जिम्मेदार है। यही इस देश का वर्तमान है और भविष्य भी!