" /> दादामियां, ये न भूलो ‘संभाजीनगर’ हो ही गया है!

दादामियां, ये न भूलो ‘संभाजीनगर’ हो ही गया है!

महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के बर्ताव और बातों का वैसे कोई अर्थ शेष नहीं बचा है। देवेंद्र फडणवीस, चंद्रकांत पाटील राज्य की आदि मंडली फिलहाल जो कहती है और जो करती है उसमें उनकी विफलता दिख जाती है। चंद्रकांत पाटील अर्थात भाजपा के ‘दादामियां’ भी अब फडणवीस के नक्शेकदम पर कदम बढ़ाते हुए व्यर्थ बकवास करने लगे हैं। अब संभाजीनगर में जाकर उन्होंने ऐसी हवा पैâलाई है कि ‘छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी महाराज के हम वंशज हैं, औरंगजेब के नहीं इसलिए औरंगाबाद का नामकरण होना ही चाहिए।’ भाजपा के दादामियां के आवेश और जोश को देखते हुए इस मंडली की सिर्फ जीभ सटकी है, ऐसा नहीं है। बल्कि बहुत कुछ सटक गया है, ऐसा निश्चित है। उनका कहना ऐसा है कि छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी महाराज के हम वंशज हैं। दादामियां के ऐसा खुद घोषित करने की कोई वजह नहीं है। महाराष्ट्र में कोई भी ‘औरंगजेब’ का वंशज नहीं है। औरंगजेब को महाराष्ट्र ने हमेशा के लिए दफना दिया है। इसके लिए हर किसी को अभिमान है। भारतीय जनता पार्टी और उसके लोग विगत ५ वर्षों से छत्रपति शिवाजी राजा का नाम ले रहे हैं और अब तो ‘प्रधानमंत्री मोदी ही शिवाजी महाराज’ ऐसी पुस्तक छापकर बांटने तक का दुस्साहस ये करने लगे हैं इसलिए आप निश्चित तौर पर किसके वंशज हैं। ये उन्हें बताना चाहिए। ‘औरंगाबाद का नामकरण ‘संभाजीनगर’ होना ही चाहिए’ ऐसा उन्होंने चिल्लाकर कहा है। ५ वर्षों तक महाराष्ट्र में तुम्हारी ही सरकार थी। केंद्र में भी आप ही हो। फिर ५ वर्षों में औरंगाबाद को ‘संभाजीनगर’ क्यों नहीं कर सके? वहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले झटके में ही इलाहाबाद को प्रयागराज कर दिया। अन्य भी नाम और गांव बदलें। उन्हें किसी ने नहीं रोका। फिर श्री फडणवीस को औरंगाबाद का ‘संभाजीनगर’ करने के लिए किसकी अनुमति चाहिए थी? बाबर, अफजल खान, शाइस्ता खान, औरंगजेब ये सभी मुगल सरदार आक्रामक थे, ऐसा प्रवचन देने की आवश्यकता नहीं है तथा भाजपा के दादामियां ‘इतिहास पुरुष’ कब से बन गए हैं? उन्हें इतिहास के उत्खनन करने की इतनी ही दिलचस्पी होगी तो २५ साल पहलेवाले हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे द्वारा औरंगाबाद का नामकरण ‘संभाजीनगर’ किए जाने का उन्हें भान होना चाहिए था। औरंगजेब के पिशाच को गाड़कर ‘औरंगाबाद नहीं, आज से ये संभाजीनगर है’, ऐसा स्पष्ट शब्दों में कहनेवाले शिवसेनाप्रमुख ही थे। बाबर से औरंगजेब तक सभी पिशाचों को गाड़कर उन्हें सुपुर्द-ए-खाक करने का कार्य शिवसेना ने पूरा किया है। औरंगाबाद का उल्लेख हर स्वाभिमानी हिंदू ‘संभाजीनगर’ कहकर अभिमान से करता है, तो सिर्फ और सिर्फ शिवसेनाप्रमुख के कारण ही और उसी बालकडू को पीकर शिवसेना अपना मार्ग तय कर रही है। अब एक समय की ‘मित्रवर्य’ भाजपा को जिस हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के प्रति प्यार उमड़ा है वो क्यों और किसलिए? क्या जनता यह नहीं समझती है। कभी वीर सावरकर तो कभी ‘संभाजीनगर’, कभी कुछ और। ये मुद्दे सिर्फ राजनीतिक लाभ उठाने के लिए ही लिए गए हैं न? न मुंबई में छत्रपति शिवाजी महाराज के भव्य स्मारक की एक र्इंट रखी गई न वीर सावरकर को भारतरत्न दिया गया। वहां अयोध्या में भी श्रीराम का भव्य मंदिर बन रहा है तो सर्वोच्च न्यायालय की कृपा से। उसमें अब पापी औरंगा भी शामिल हो गया है, इतना ही। हिंदुओं का स्वाभिमान प्रखर राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया है इसलिए महाराष्ट्र में राष्ट्रवाद कभी मार नहीं खाएगा। जो राष्ट्रवाद को मारने का प्रयत्न करेगा वो हिंदुओं के हाथ से मार खाएगा क्योंकि हम सभी छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रपति संभाजी राजे और हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के वंशज हैं। महाराष्ट्र में भाजपा के घोड़े अभी भी मुगलों की तरह सीधे पानी पीने को तैयार नहीं हैं। विपक्ष मतलब सिर्फ बकवास करने और ऊटपटांग हरकतों के लिए शेष बचा है क्या? ऐसा सवाल लोगों के मन में उठ रहा है। हमें महाराष्ट्र में शांति चाहिए। दादामियां जैसे लोग औरंगे के पिशाच को कितना भी खोदकर निकालेंगे फिर भी महाराष्ट्र की शांति को भंग नहीं कर पाएंगे। ये दादामियां को दृढ़ता के साथ याद रखना चाहिए। ऐसे कई दादामियां जब बिस्तर गीला करते थे तब शिवसेना हिंदुत्व और राष्ट्र कार्य के लिए सीना तानकर लड़ती थी। दादामियां ये याद रखो!