" /> दादा की छाती पर पोता! कश्मीर जैसा था!

दादा की छाती पर पोता! कश्मीर जैसा था!

लद्दाख में चीन और कश्मीर घाटी में पाकियों की खुराफातें शुरू हैं। हिंदुस्थान की ओर टेढ़ी नजर से देखना उनका धंधा बन चुका है लेकिन अब उनसे निपटना ही पड़ेगा। बुधवार को सोपोर जिले में आतंकवादियों ने हमला किया। इस हमले में ‘सीआरपीएफ’ का एक जवान शहीद हो गया। इस हमले में उसी क्षेत्र के रहनेवाले एक वरिष्ठ नागरिक की मौत हो गई। कश्मीर घाटी में इस प्रकार रोज खून बह रहा है और मासूम लोगों की जान जा रही है। विश्वासपूर्वक ऐसा कहना कि नोटबंदी करने से कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगेगी और नकली नोटों के व्यवहार पर अंकुश लगेगा, व्यर्थ साबित हुआ। कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियां और नकली नोटों का व्यवहार बढ़ चुका है। गृह विभाग के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। अनुच्छेद-३७० हटाकर और कश्मीर का विभाजन करने के बावजूद हालात पहले जैसे ही हैं। सोपोर में हुए हमले में एक जवान और एक वरिष्ठ नागरिक की मौत हो गई। उस पर यह खबर भी भावुक कर देनेवाली है कि एक वरिष्ठ नागरिक जो अपने पोते के साथ घर जाने के लिए निकले थे, वे आतंकवादी गोलीबारी में लहूलुहान हो गए। उस परिस्थिति में भी उनका पोता अयाद अपने दादा को छोड़कर नहीं भागा। वह वहीं रुका रहा। लहूलुहान दादा की छाती पर बैठकर वह उन्हें उठाता रहा। गोलीबारी में दादा अहमद खान की जान जा चुकी थी और मासूम अयाद को जवानों ने बचा लिया। मृत दादा की छाती पर बैठकर रोनेवाले अयाद की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। यह देखकर देश करुणा से पूरित हो गया। केंद्र के कुछ मंत्रियों ने इस तस्वीर को अपने ट्विटर हैंडल पर डालकर अश्रुधारा की राह बनाई। आतंकवादियों के हमले का निषेध व्यक्त किया। उस मासूम के प्रति सहानुभूति व्यक्त की। यह सब ठीक है, लेकिन मूलत: दिल्ली में इतनी मजबूत सरकार होने के बावजूद कश्मीर घाटी में शांति क्यों स्थापित नहीं हो पा रही? मृत दादा की छाती पर बैठकर रोनेवाले पोते की तस्वीर को प्रसारित करनेवाले केंद्रीय मंत्री को यह समझना चाहिए कि यह तस्वीर केंद्र सरकार के लिए चुनौती साबित हो सकती है। यह तस्वीर जब सरकार के अधिकृत मंत्री ही अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट करते हैं तो कश्मीर घाटी में हो रही ऐसी रक्तपात की जिम्मेदारी भी सरकार की ही होती है। दादाजी मर चुके हैं और वे अब कभी नहीं उठनेवाले, यह न समझ पानेवाला पोता उन्हें उठाने का प्रयास कर रहा है। इतनी हृदयविदारक तस्वीर सीरिया, इजिप्त, सोमालिया और अफगानिस्तान जैसे देशों में विध्वंस के बाद सामने आई है। कश्मीर घाटी में हमारे जवानों का बलिदान हो ही रहा है। अनुच्छेद-३७० हटा तो दिया लेकिन कश्मीरी पंडितों की घरवापसी नहीं हो पाई। कश्मीरी पंडित सरपंच की आतंकवादियों ने महीने भर पहले हत्या कर दी। यह दृश्य भयानक है। कश्मीर में पाक समर्थित अलगाववादियों को नई ताकत मिल रही है। पाकिस्तानी सेना की हलचल सीमा पर बढ़ रही है। लद्दाख की सीमा पर चीन और कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना खड़ी है। सीमा पर तनाव कम होने के लक्षण नहीं दिख रहे। इसी का फायदा पाकिस्तान उठाएगा और कश्मीर सहित हिंदुस्थान के कई बड़े शहरों में उत्पात मचाएगा। अमित शाह ने गृह विभाग का नेतृत्व संभालते ही कश्मीर घाटी का गाजे-बाजे के साथ दौरा किया। इस दौरे की खूब वाहवाही भी हुई। अब तक जब-जब देश के गृहमंत्री कश्मीर गए, वहां के आतंकवादियों और अलगाववादियों ने बंद घोषित किया। मुश्किलें पैदा कीं। श्री शाह के मामले में ऐसा नहीं हुआ, यह सही है लेकिन गत ६ महीनों में वहां आतंकी गतिविधियां और हमले बढ़े हैं। घुसपैठ की संख्या भी बढ़ी है। गत कुछ महीनों में हमारे जवानों ने कई आतंकवादियों का खात्मा किया। फिर भी इन मुठभेड़ों में शहीद जवानों की संख्या भी कम नहीं है। आज भी जम्मू-कश्मीर में लगभग १७० आतंकवादी सक्रिय हैं, ऐसा कहा जा रहा है। इसका मतलब कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ और गतिविधियां शुरू ही हैं। आतंकी हमलों में जवानों के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों को भी निशाना बनाया जा रहा है। सोपोर में हुए आतंकी हमले में बशीर अहमद खान नामक व्यक्ति की मृत्यु इसी के तहत हुई है। मतलब कश्मीर में ‘जैसे थे’ वाला माहौल है। सरकार को कश्मीर से अलगाववादियों और घुसपैठियों को बाहर निकालना ही चाहिए। लद्दाख में घुसे चीनियों को हकाल देना चाहिए। कश्मीर घाटी में एक मृत दादाजी की छाती पर बैठकर उनका पोता रो रहा है, बगल में दनादन बंदूकें चल रही हैं। यह तस्वीर देश की छवि और हिम्मतबाज सरकार की प्रतिष्ठा पर दाग लगानेवाली है। जवानों ने अपनी जान खतरे में डालकर दादा की छाती पर बैठकर बिलख रहे पोते को बचा तो लिया लेकिन उस पोते का भविष्य क्या? सरकार के पास इस सवाल का क्या जवाब है?