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दान धर्म में अधर्म

सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर बीेते कुछ दिनों से देशभर के राज्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद व तमाम जनप्रतिनिधियों द्वारा कोरोना संकट में अपने सरकारी फंड व निधि से भारी भरकम धन दान करने की पोस्टें कर रहे हैं। उनकी पोस्टों पर उनके चाहने वाले कंमेंट-लाइक के अलावा वीडियो संदेश देकर उनका धन्याद कर रहे हैं। कुलमिलाकर सा सांसद-विधायक सरकारी खजाने से दान करके खूब वाहवाही लूट रहे हैं। कोई लाख दे रहा है, तो कोई करोड़ों? सभी प्रधानमंत्री राहतकोष में जमा करा रहे हैं। दान-धर्म करना अच्छी बात है सभी को करना चाहिए, विशेषकर संकट की घड़ी में जरूर। पर, एक बात गौर करने की है कि जनप्रतिनिधि खुद से क्या दे रहे हैं? जो दे रहे हैं वह तो सरकारी पैसा है व्यक्तिगत कुछ नहीं?

गौरतलब है, सांसद/विधायक निधि का पैसा क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए सरकार द्वारा आवंटित होता है। देश का कोई राज्यमंत्री, सांसद, विधायक व अन्य राज्यनेता ऐसा नहीं है जिनकी हैसियत करोड़ों-अरबों की न हो। सभी धनाड्य और अकूत संपत्ति के मालिक हैं। ज्यादातर जनप्रतिनिधियों के बड़े-बड़े औधोगिक कर-कारखाने, धंधे, व्यवसाय स्थापित हैं जिनका सालाना टर्नओवर करोड़ों में होता है। सवाल बस इतना है कि देश पर जब कभी कोई आपदा या संकट आता है तब सफेदपोश व्यक्तिगत रूप से दान क्यों नहीं देते? जबकि, ऐसे वक्त में दैनिक दिहाड़ी करने वाला बेहद गरीब इंसान भी अपनी जिम्मेदारी समझकर कुछ न कुछ दान करता है। कोरोना संकट के इस दौर में भी गांव-देहातों से पचास रूपए, सौ रूपए, पांच सौ रूपए देने वालों की संख्या करोड़ों में हैं। खेती करने वाले सामान्य किसान से लेकर रिक्शा चालक से भी जो बन पड़ा उसने प्रधानमंत्री रिलीफ फंड में अपनी स्वेच्छा से दान किया। पर, ऐसी कोई खबर सुनने और देखने में नहीं आई, जब किसी जनप्रतिनिधि ने अपने से कुछ दान किया हो।

जनप्रतिनिधियों द्वारा सांसद-विधायक निधि को यूं लुटाने की हिमाकतों पर केंद्र सरकार को गंभीरता से गौर करना चाहिए। इस तरह के दान पर तत्काल प्रभाव से रोक लगानी चाहिए। सांसद-विधायक निधि का उपहास नहीं उड़ाना चाहिए। क्योंकि निधि/फंड के रूप में आंवटित पैसा उनका नहीं होता, जनता का होता है जिसे वह प्रति वर्ष टैक्स के तौर पर सरकारों को अपने विकास के लिए देता है। कभी-कभार तो ऐसा लगता है कि जनप्रतिनिधियों की चुनाव जीतने के बाद उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही खत्म सी हो जाती है। जनता को ऐसे मौकों पर उनसे सवाल करना चाहिए कि आखिर क्यों वह अपने फंड या निधि के पैसों को बेवजह खर्च करके देश के सच्चे जनप्रतिनिधि होने का प्रमाण प्रस्तुत करने का दिखावा करते हैं।

बहरहाल, लॉकडाउन के बाद समूचे देश में ताला पड़ा हुआ है। खेती-किसानी, छोटे मझले व्यवसाय, मजदूरी आदि कामधंधे ठप्प हैं। दिक्कतें सबसे ज्यादा उन दैनिक-दिहाड़ी मजूदरों को उठानी पड़ रही है जिनके समक्ष रोजाना खाने-कमाने की चुनौतियां होती हैं। मसलन, दिन की कमाई से ही शाम को घर का चूल्हा जलता है। हालांकि, केंद्र व राज्यों सरकारों द्वारा उनकी दिक्कतों को दूर करने के लिए हरसंभव सहायता मुहैया कराई हुई है। सरकार की अधिकृत राशन की दुकानों पर राशन प्रâी दिया जा रहा है पर हिंदुस्थान में कई ऐसे दुर्गम आवासीय इलाके हैं जहां ये सुविधाएं अब भी नाकाफी जैसी हैं। छत्तीसगढ़ के आदिवासी और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लॉकडाउन के समय सरकार की राहत सामग्रियां नहीं पहुंचने की बातें सामने आई हैं। अगर ऐसे जगहों पर जनप्रतिनिधि अपने सांसद, विधायक निधि से राहत कार्य संचालित करें तो उनको शायद सोशल मीडिया से ज्यादा वाहवाही मिले।

कोरोना वायरस से उत्पन्न हुई स्थिति से उभरने के लिए जो राहत फंड केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को दिया गया है। राज्य सरकारों ने उस फंड को प्रत्येक जिलों में वितरित कर दिया है। उसमें धांधली की भी खबरें आने लगी हैं। अधिकारी धन का बंदरबांट करने लगे हैं क्योंकि लॉकडाउन में ईमानदार अफसर तो अपनी डयूटी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं। पर, कुछ नाकारा और कामचोर नौकरशाहों के लिए मौज काटने और आरामदाह साबित हो रहा है। लॉकडाउन के बहाने वह किसी फरियादी की कोई फरियाद नहीं सुन रहे। लॉकडाउन में व्यस्त होने का हवाला देकर टरका रहे हैं। ऐसे प्रवृत्ति के अफसरशाह राहत फंड में भ्रष्टाचार का दीमक लगा सकते हैं। कुछ जिलों से विरोध के चिंगारियां उठने लगी हैं। जनप्रतिनिधियों ने डीए व एसपी की कार्यशैलियों पर सवाल उठाए हैं। यूपी के कई जिले से विधायकों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने सेनीटाइजर और दवाईयों के छिड़काव के लिए जिला प्रशासन को धन मुहैया कराया था उसका इस्तेमाल नहीं हुआ। शिकायतें मुख्यमंत्री तक पहुंचने लगी हैं।

दरअसल, राहत कार्य और दानधर्म के कार्यों पर एकाएक कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन गड़बड़झाला बहुत होता है। समूचे हिंदुस्थान में इस समय अनगिनत एनजीओ, धार्मिक संस्थाएं, गुरुद्वारा, मंदिर, सेवा भारती, ट्रस्ट, किन्नर समुदाय व विभिन्न वर्गों के लोग अपने व्यक्तिगत प्रयासों से प्रवासी मजदूरों और गरीबों को हर तरह की सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं, उन्हें खाना खिला रहे हैं। कपड़े, राशन, दवा आदि की समूचित व्यवस्थाएं पहुंचा रहे हैं। जबकि, ये सरकारों को ही करना चाहिए, उनके हिस्से का काम है। फिर भी सरकारें दावा कर रही हैं कि जो भी कुछ हो रहा उनके द्वारा किया जा रहा है। लेकिन सच्चाई यही है सरकारों और जनप्रतिनिधियों से कहीं आगे बढ़कर देश के लोग अपने से जरूरतमंदों की सहायता में लगे हैं। दावों और हकीकत में खासा अंतर होता है। कैसे पता चले कि सांसद-विधायक या सरकारें गरीबों को भोजन करा कर रही है?

राहत-सुविधा को रेखांकित करती दिल्ली सरकार की ताजातरीन तस्वीर हमारे समक्ष है। दिल्ली सरकार पंद्रह लाख गरीबों को रोजाना खाना खिलाने का दावा करती है। पहला सवाल अगर ऐसा होता तो हजारों-लाखों मजदूरों को दिल्ली छोड़कर क्यों जाना पड़ा? दिल्ली में करीब पांच हजार स्वयंसेवी संस्थाएं इस समय गरीबों को खाना खिला रही हैं। आम आदमी पार्टी ने भी कुछ कार्यालाय खोले हुए हैं। आम आदमी पार्टी कार्यालय पर जब कोई भूखा खाना मांगने जाता है तो उसे उन जगहों पर भेज दिया जाता है जहां एनजीओ द्वारा खाना खिलाया जा रहा होता है। कुल मिलाकर दान-धर्म की आड़ में भी जमकर दिखावा हो रहा है। तस्वीरें ऐसी देखने को मिल रही हैं। जब कोई जनप्रतिनिधि किसी गरीब को एक किलो राशन देता है तो उसकी एक दर्जन तस्वीरें उतारकर सोशल मीडिया में तैराकर खुद की वाहवाही और धर्मांतरूपी जयघोष कराता है।