" /> दिल्ली सूनी हो गई…!, सड़कों पर दिखते मजलूमों के बेबसी के काफिले

दिल्ली सूनी हो गई…!, सड़कों पर दिखते मजलूमों के बेबसी के काफिले

कोरोना संकट और लॉकडाउन से उत्पन्न हुई समस्याओं का सबसे ज्यादा सामना मजदूर कर रहे हैं। बात रोजी रोटी पर बन आई है। कहने को तो केंद्र व राज्य सरकारें हर तरह की सुविधाएं मुहैया करा रही हैं, लेकिन धरातल पर कागजी साबित हो रही हैं। बड़े शहरों में फंसे मजूदरों को उनके मूल ठौरों तक पहुंचाने के लिए भाड़ाविहीन स्पेशल श्रमिक रेलगाड़िया चल रही हैं, पर खबरें ऐसी हैं कि मजदूरों से किराया वसूला जा रहा है। कोरोनाकाल में पीड़ितों की परेशानियों को दूर करने के लिए देशभर के लोगों ने अनगिनत पैसा प्रधानमंत्री रिलीफ फंड में दिया। उस रकम का इस्तेमाल कहां किया जा रहा है, किसी को नहीं पता? मजूदरों के लिए स्पेशल रेलगाड़िया और बसें चलाने की बात कहीे जा रही है। बावजूद इसके सड़कों पर मजूदरों के बेबसी के काफिल दिख रहे हैं।

सच कहा जाता है कि मजलूमों की जिंदगी बहुत सस्ती होती है। मजदूर असहाय लोगों पर चाहें उच्च वर्ग का जुल्म हो, कुदरती आपदाएं हो, प्रकृतिक हारी-बीमारी हो, मतलब कोई भी रौंद देता है। उनकी मौतों पर सवाल उठाने वाला कोई नहीं होता। एक नेता की भैंस चोरी होने पर सरकार और प्रशासन दोनों मिलकर धरती-आसमां एक कर देते हैं लेकिन दर्जनों बेबस लोगों की मौते हुकूमतों को ज्यादा परेशान इसलिए नहीं करती, क्योंकि उनके जीवन का उनके लिए ज्यादा मोल और मायने नहीं होते? मजदूर सिर्फ उनके लिए प्रयोग मात्र के तौर पर होते हैं। काम किया, पैसा लिया, बात खत्म? उनका न कोई बीमा, न कोई गारंटी और न उनके हक-हकूक के लिए लड़ने वाला होता है।

बीते दिनों लगातार देश के दो जगहों से मजदूरों की दर्दनाक मौत की खबरें सुनने को मिली। गैस रिसाव से कई लोग मरे, तो वहीं सोते लोगों पर मौत बनकर ट्रेन चढ़ गई। कोई नहीं, वह मजदूर ही तो थे, कोई नेता या प्रशासनिक अधिकारी थोड़े ही थे, जिसका सरकार और सिस्टम विलाप करे। मुआवजा देकर मामला शांत हो जाएगा। एकाध दिनों में मीडिया की सुर्खियों से भी खबरें गायब हो जाएंगी। पापी पेट कुछ भी कराने का मादा रखता है। नियम-कानून और वदिंशें भी तुड़वा देता है। लॉकडाउन के बाद से पूरा हिंदुस्तान आजादी के बाद दूसरे सबसे बड़े आंतरिक विस्थापन से गुजर रहा हो। समूचे देशभर में सन्नाटा छाया हुआ है। कारखाने और फैक्ट्रियां बंद होने से हजारों लोग बेरोजगार और बेघर हो गए हैं।

दैनिक-तिहाड़ी देने के लिए मालिकों ने हाथ खड़े कर लिए। इसके अलावा जो लोग कार्यालयों में काम करते थे उनके साथ भी मालिकों ने ‘काम नहीं तो पैसा नहीं‘, का फॉर्मूला अपनाया लिया है? जेब खाली तो पेट खाली। दिल्ली में एक तिहाई मजदूर वर्ग रहता है जो दैनिक दिहाड़ी-मजदूरी पर निर्भर है। सुबह कमाएगा और शाम को खाएगा? मजदूरों की बदहाल स्थिति को दुरूस्त करने में सिस्टम भी विफल हो गया है। दिल्ली में करीब तीस लाख के आसपास मजदूरों की संख्या हैं। आधे से ज्यादा लोग अपने गांवों को निकल गए हैं। जा बचे हैं वह भी जाना चाहते हैं।

यातायात के साधनों पर ब्रेक लग जाने के बाद भी लोग मीलों दूर पैदल चलकर अपने ठौर को जा रहे हैं। हाईवे के किनारों भूखे-प्यासे साथ में महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चों को पैदल चलता देख किसी का भी कलेजा कांप उठेगा। ये तय है, समस्या किसी भी तरह की हो, उसकी पहली और सीधी मार सबसे पहले बदनसीब मजदूरों पर ही पड़ती है। ये लोग दो जून की रोजी-रोटी के लिए अपना घर-परिवार, बूढ़े मां-बाप, रिश्ते-नाते सभी को छोड़ दूसरी जगहों पर जाते हैं। कारखानों में आग लगे, या कोई अनजान समस्या उत्पन हो, उसकी चपेट में मजदूर ही आते हैं। कोरोना वायरस के बाद उत्पन्न हुई पूरे देश में त्रासद जैसी स्थिति का सबसे ज्यादा शिकार मध्यम और दैनिक दिहाड़ी-मजदूर ही हुआ।
पूर्व में घटी तमाम त्रासद कहानियों को हमने अपने बुजुर्गों और इतिहास के कालखंड़ो में पढ़ी। कमोबेश, ऐसी ही स्थिति हम इस वक्त भी देख रहे हैं। नंगे पांव सड़कों पर रेंगते मजदूरों के मासूम बच्चों को देखकर आंखों में पानी भर आता है। ये वही सड़कें हैं जिन्हें इन्हीं गरीबों ने अपने खून-पसीने से अमीरों के लिए बनाई। लेकिन, उनकी हैसियत आज इतनी भी नहीं कि वह उनका सही से इस्तेमाल कर सकें। तमाम सड़कों पर इस वक्त दुख, हताशा, बेचारगी के काफिले दिखाई दे रहे हैं। कोरोना ने इस देश की धमनियों में पल रहे मध्यवर्ग को विभाजन जैसा ऐहसास कराकर उनको सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया है। कामगार ही हैं जो सदियों से अपना पसीना बहाकर विकास का पहिया चारों ओर घुमा रहे हैं। जब मुसीबत आई तो दिल्ली ने इन्हें भागने पर मजबूर कर दिया।

केंद्र सरकार को पलायन की स्थिति पर गंभीरना होना चाहिए। नहीं तो कितने मजदूर भूख-प्यास के बीच पैदल चलते-चलते जिंदगी हार जाएंगे। कोरोना वायरस ने बंगाल का अकाल और लाशों से पटी सड़कें, प्रâांस में राज्यक्रांति के बाद पैदा हुई आराजकता, अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद रक्तरंजित माहौल, १८५७ का गदर और हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच आजादी के वक्त विभाजन से पैदा हुए दर्द का एहसास करा दिया है। बहरहाल, कोरोना त्रासदी को लेकर आवाम परेशान न हो, उनके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने भारी भरकम राहत पैकेजों की घोषणाएं की हैं। देश के तमाम मठों, मंदिरों ट्रस्टों, उद्योगपतियों, क्रिकेटरों, प्रबुद्ध वर्ग के अलावा तमाम दूसरे लोग सरकार को चंदा स्वरूप धान दे रहे हैं। अरबों रूपए सरकारी खाते में अभी तक जमा हो गए हैं। दिल्ली ऐसा उपराज्य है जहां हर प्रांत के लोग रोजी-रोटी कमाने आते हैं। कोरोना वायरस फैलने के बाद सभी अपने प्रांतों को निकल गए हैं। दिल्ली सूनी हो गई, इससे दिल्ली सरकार परेशान है। निर्माणाधीन कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो बिना मजदूरों के पूरे नहीं हो सकते। मजदूरों को फिर से दिल्ली वापस बुलाने की सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती है।