दिवाली नहीं काली अमावस! फीकी पड़ी खरीददारी

दिवाली की जगमगाहट इस बार फीकी पड़ चुकी है। महंगाई, जीएसटी और कानूनी नियमों के कारण व्यापारी हलाकान हैं। ग्राहक चुनिंदा शॉपिंग कर रहे हैं। दिवाली के दौरान मिलनेवाले रेडीमेड फराल (चकली, सेव, करंजी आदि) का बाजार भी नाम का रह गया है। कपड़ा बाजार के व्यापारी ‘सेल’ का बोर्ड लगाकर ग्राहकों को अपनी दुकान की ओर आकर्षित करने में जुटे हैं। ऑनलाइन शॉपिंग, दुकानों और फुटपाथों पर कपड़े का धंधा लगानेवाले व्यापारी भी छूट का लालच दिखा रहे हैं लेकिन ग्राहक हैं कि उस ओर झांक ही नहीं रहे। मिट्टी के दीए हों या जगमगाहट वाली लाइटिंग, सभी के व्यापारी परेशान हैं। ‘ग्राहकी नहीं है’, यही सुनने को मिल रहा है। दिवाली काली अमावस के दिन आती है लेकिन इस साल महंगाई के कारण व्यापारियों और ग्राहकों की दिवाली पर काली अमावस का प्रकोप दिख रहा है। ग्राहक खरीददारी करने कम जा रहे हैं। जो जा भी रहे हैं वे खरीददारी बहुत कम कर रहे हैं। व्यापारी तरह-तरह के डिस्काउंट और सस्ताई का दावा कर ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं, जिसमें वे असफल होते दिख रहे हैं।
हर बाजार दिवाली में बेजार
 दिवाली में घरों में रौनक के लिए लगाई जानेवाली लाइटिंग का बाजार भी इस साल ठंडा है। क्रॉफर्ड मार्केट में तरह-तरह की लाइटिंग का व्यापार करनेवाले निशार भाई का कहना है कि पहले चाइना लाइटिंग की काफी मांग रहती थी। बाजार में व्यापारियों ने कुछ सालों से चाइना लाइटिंग का बहिष्कार किया है इसलिए इस बार मेड इन इंडिया के तहत लाइटिंग ऑर्डर देकर बनवाई थी लेकिन ग्राहक न के बराबर बाजार में दिखाई दे रहे हैं। इस बार दिवाली का बाजार पूरा चौपट हो गया है। ग्रांट रोड स्टेशन के बाहर भाजी मार्वेâट में मिट्टी का दीया बेचनेवाले संतोष परदेशी का कहना है कि बड़ी उम्मीद से मिट्टी के दीए का ऑर्डर इस बार दिया था। दीया तो कुंभार के पास से समय पर आ गया लेकिन ग्राहक समय से नहीं आ रहे हैं। दिवाली को कुछ ही दिन रह गए हैं पर जैसा धंधा होने को सोचा था, वैसा नहीं है। ग्राहक के पास पैसा ही नहीं है तो कहां से बाजार में आएंगे। इसी तरह बाजार में कंदील का व्यापार भी ठंडा पड़ गया गया है। कुछ साल पहले मार्वेâट, चौराहे पर कंदील का बाजार भरा रहता था लेकिन इस साल कहीं कंदील का नामों निशान नहीं है। कंदील विक्रेता सचिन चव्हाण ने बताया कि इस साल बांस की लकड़ियों से बना २०० कंदील तैयार किया है। एक कंदील का खर्च लगभग १०० रुपए पड़ा है। १५० रुपए प्रति नग बेच रहा हूं लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं है। लगता नहीं है कि दिवाली तक सारा कंदील बिक जाएगा।