`दुर्गतिनाशिनी’ हैं दुर्गा!

दैत्यनाशार्थवचनो दकार: परिकीर्तित:।
उकारो विघ्ननाशस्य वाचको वेदसम्मत:।।
रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्नवाचक:।
भयशत्रुघ्नवचनश्चाकार: परिकीर्तित:।।
देवी पुराण के उपर्युक्त वचनों के अनुसार दुर्गा शब्द में `द’ कार दैत्यनाशक, `उ’ कार विघ्ननाशक, `रेफ’ रोगनाशक, `ग’ कार पापनाशक तथा `आ’ कार भयशत्रुनाशक है। अतएव दुर्गा `दुर्गतिनाशिनी’ हैं।
नवरात्रि में क्या करें, क्या न करें?
प्रतिपदा को केश संस्कार के द्रव्य-आंवला, सुगंधित तेल आदि केश-प्रसाधन संभार, द्वितीया को बाल बांधने-गूंथनेवाले रेशमी सूत, फीते आदि, तृतीया को सिंदूर और दर्पण आदि, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक और नेत्रांजन, पंचमी को अंगराग-चंदनादि एवं आभूषण, षष्ठी को पुष्प तथा पुष्पमालादि समर्पित करें। सप्तमी को ग्रहमध्यपूजा, अष्टमी को उपवासपूर्वक पूजन, नवमी को महापूजा और कुमारी पूजा करें। दशमी को पूजन के अनंतर पाठकर्ता की पूजा कर दक्षिणा दें एवं आरती के बाद विसर्जन करें। श्रवण नक्षत्र में विसर्जनांक-पूजन प्रशस्त कहा गया है। दशमांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन कराकर व्रत की समाप्ति करें।
कुमारी पूजन की महत्ता
देवीव्रत में कुमारी-पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो नवरात्रिभर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन नौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देव रूप मानकर गंध-पुष्पादि अर्चन कर आदर के साथ यथा रुचि मिष्ठान्न भोजन कराना चाहिए एवं वस्त्रादि से सत्कृत करना चाहिए। शास्त्रों में उद्धृत है कि एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की, दो की पूजा से भोग और मोक्ष की, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ, काम-त्रिवर्ग की, चार की अर्चना से राज्यपद की, पांच की पूजा से विद्या की, छह की पूजा से षट्कर्मसिद्धि की, सात की पूजा से राज्य की, आठ की अर्चा से संपदा की और नौ कुमारी कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है। कुमारी पूजन में दस वर्ष की कन्याओं का अर्चन विहित है जबकि दस वर्ष से ऊपर की आयुवाली कन्या का कुमारी पूजन वर्जन किया गया है।