" /> दुष्प्रभाव का अगला चैप्टर

दुष्प्रभाव का अगला चैप्टर

क्या हमें ये मान लेना चाहिए कि स्क्रीन टाइप, नई किस्म की शिक्षा का यहां से नया दौर शुरू हो गया है। शिक्षण संस्थाएं कोरोना संकट की शुरुआत से ही ऑनलाइन क्लासों में जूम ऐप, माइक्रोसॉफ्ट, यूट्यूब, ट्यूटोरियल, व्हॉट्सऐप जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये तय है इसका साधन-संपन्न वर्गों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन कम पढ़े-लिखे पैरेंट्स निश्चित रूप से परेशान हो रहे हैं। बच्चे मोबाइल्स और लैपटॉप के जरिए पढ़ रहे हैं जिनमें बच्चों को न स्कूली क्लासों जैसा वातावरण मिल रहा है और न ही टीचरों के साथ इंटरेक्ट हो पा रहे हैं। इन नए तरीकों ने अभिभावकों पर अतिरिक्त भार भी डाल दिया है, जिन घरों में एन्ड्रॉयड मोबाइल फोन, लैपटॉप या टैबलेट नहीं है, उन्हें अरेंज करने पड़ रहे हैं। ये हाल दिल्ली का ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्थान में ऑनलाइन शिक्षा का चलन आरंभ हो गया है। बच्चों के घर बैठे ऑनलाइन पढ़ाई करने पर भी निजी स्कूल फीस वसूल रहे हैं। ये सब अभिभावकों अटपटा लग रहा है। अभिभावक फीस देना नहीं चाहते और स्कूल प्रबंधक किसी भी सूरत फीस वसूलने को आतुर हैं। दोनों के दरमियान माहौल तनातनी का हो गया है। तभी अभिभावकों ने कोर्ट का रूख किया है।

ये तय है, कोरोना संकट अभी खत्म होने वाला नहीं? इसकी मौजूदगी आगे भी रहेगी। डब्ल्यूएचओ, चिकित्सा विज्ञान व एक्सपर्ट्स के मुताबिक अभी भयावह रूप बाकी बचा है। कोरोना से क्या कुछ बदला? उसकी समीक्षा कोरोना के जाने के बाद होगी। लेकिन उसके दुष्परिणाम अभी से दिखने शुरू हो गए हैं। दिल्ली-एनसीआर में कोरोना से हताहत होने वाले लोगों से कहीं ज्यादा केस आत्महत्याओं के आने शुरू हो गए हैं। रोजाना दर्जनों की तादाद में लोग अपनी जीवन को खत्म कर रहे हैं। इसमें ऐसा वर्ग शामिल है जो कोरोना संकट से पहले संपन्न था, खुशहाल था। व्यापारी और नौकरीपेशा ज्यादा हैं। कारण, किसी की नौकरी छूटना, कर्ज के तले दबना या उनके कामधंधों का ठप्प हो जाना।
दिल्ली के पूर्वी क्षेत्र में स्थित राजधानी के सबसे बड़े मेंटल अस्पताल इबहास में मरीजों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। लोगों का मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने वालों को जीवन की कीमत समझाने वाले चिकित्सक भी सुसाइड करने लगे हैं। बीते शुक्रवार को एम्स के मनोचिकित्सक ने भी अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। इन घटनाओं को देखकर लगने लगा है कि स्थितियां भयावह हो रही हैं। दरअसल ये ऐसा वक्त है जिसमें हमें खुद पर संतुलन रखना होगा, वक्त को बिताना होगा, अपने पर हावी नहीं होने देना। अपनी और अपने परिवार के प्रति ईमानदारी दिखानी होगी। क्योंकि संकट से लड़ने वालों को ही सिकंदर कहा जाता है।
कोरोना से जुड़ी खबरें निश्चित रूप से हमें डरा रही हैं। हिंदुस्थान का कोई ऐसा शहर, गांव, कस्बा या मोहल्ला नहीं जहां से कोरोना संक्रमितों के केस न निकल रहे हों। केंद्र शासित राज्य दिल्ली और महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक चार ऐसे राज्य हैं जहां कोविड-१९ के केस सबसे ज्यादा हैं। कमोबेश, मौतों का आंकड़ा भी यहीं सबसे ज्यादा है। बावजूद इसके हमें इन आंकड़ों को खुद के लिए डर का कारण नहीं बनाना। भय असीमित दर्द देता है, उसे अपना साथी नहीं बनाना चाहिए। चुनौतियों से लड़ना इंसानी जीवन के पहले अध्याय में दर्ज है। जो परिस्थितियों के आगे हार मान लेता है वही पत्ते डालता है। वैश्विक इस आपदा से इंसानी जीवनशैली से लेकर उनके व्यवहार आदि में भी बदलाव आ चुका है। दुनिया ठहर सी गई है। शिक्षा-साधन सभी धराशायी हो गए हैं।
कोरोना के बढ़ते प्रभाव के चलते दिल्ली सरकार ने पिछले सप्ताह सभी शिक्षण संस्थाओं के अंतिम सेमेस्टरों पर रोक लगाई है। वहीं, पब्लिक स्कूलों का फीस मसला भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकताओं को हाई कोर्ट जाने की सलाह देकर अपने यहां दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया है। मामला अभिभावकों की ओर से दर्ज कराया गया है जिसमें उन्होंने ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर स्कूलों द्वारा फीस लेने पर रोक की मांग की है। कोरोना ने शिक्षा के स्वरूप को जिस तरह से बदला है वह अकल्पनीय है। कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि ऐसे दौर के दीदार होंगे। स्कूल-कॉलेजों की शिक्षा पूरी तरह से एन्ड्रॉयड फोन्स में आकर समा गर्इं हैं। बच्चे सुबह से ही हाथों में मोबाइल और कानों में लीड़ लगाए बैठे रहते हैं।
क्या हमें ये मान लेना चाहिए कि स्क्रीन टाइप, नई किस्म की शिक्षा का यहां से नया दौर शुरू हो गया है। शिक्षण संस्थाएं कोरोना संकट की शुरुआत से ही ऑनलाइन क्लासों में जूम ऐप, माइक्रोसॉफ्ट, यूट्यूब, ट्यूटोरियल, व्हॉट्सऐप जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये तय है इसका साधन-संपन्न वर्गों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन कम पढ़े-लिखे पैरेंट्स निश्चित रूप से परेशान हो रहे हैं। बच्चे मोबाइल्स् और लैपटॉप के जरिए पढ़ रहे हैं जिनमें बच्चों को न स्कूली क्लासों जैसा वातावरण मिल रहा है और न ही टीचरों के साथ इंटरेक्ट हो पा रहे हैं। इन नए तरीकों ने अभिभावकों पर अतिरिक्त भार भी डाल दिया है, जिन घरों में एन्ड्रॉयड मोबाइल फोन, लैपटॉप या टैबलेट नहीं है, उन्हें अरेंज करने पड़ रहे हैं। ये हाल दिल्ली का ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्थान में ऑनलाइन शिक्षा का चलन आरंभ हो गया है। बच्चों के घर बैठे ऑनलाइन पढ़ाई करने पर भी निजी स्कूल फीस वसूल रहे हैं। ये सब अभिभावकों अटपटा लग रहा है। अभिभावक फीस देना नहीं चाहते और स्कूल प्रबंधक किसी भी सूरत फीस वसूलने को आतुर हैं। दोनों के दरमियान माहौल तनातनी का हो गया है। तभी अभिभावकों ने कोर्ट का रूख किया है।
अभिभावकों के समक्ष ऑनलाइन शिक्षा ने एक मुसीबत और खड़ी कर दी है। ट्यूशनों की जरूरत एकाएक बढ़ गई। अधिकांश अभिभावक ऑनलाइन क्लासों के वक्त ट्यूशनरों का सहारा ले रहे हैं। ट्यूशन और ऑनलाइन शिक्षा की गुणवत्ता हमेशा से सवालों के घेरे में रही है पर कोरोना संकट में इनका प्रचलन और बढ़ गया। ये गारंटी कोई नहीं देता कि जो बच्चे स्कूलों में भी नहीं पढ़ते थे, वह कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट यानी ऑनलाइन माध्यमों से कैसे पढ़ पाएंगे? ट्यूशन का बिलावजह बोझ हमेशा से अभिभावकों के जेब पर डाका डालता रहा है, अब और बढ़ गया है। एनएसएसओ की सर्वे रिपोर्ट ने भी माना है कि भारतीय परिवारों की कमाई का एक तिहाई हिस्सा बच्चों की अतिरिक्त शिक्षा यानी ट्यूशन पर खर्च होता है।
ऑनलाइन कक्षाओं के दुष्परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। बच्चे ऑनलाइन क्लासों के बहाने पूरे दिन मोबाइलों से चिपके रहते हैं। गेम, पब्जी आदि खेलते रहते हैं। बच्चों में पब्जी की लत इस कदर बढ़ती जा रही है कि आए दिन इसको लेकर घटनाएं भी होने लगी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन क्लासेस सफल नहीं हो पा रही है क्योंकि वह इंटरनेट कनेक्टिविटी की सबसे बड़ी समस्या है। ऑनलाइन कक्षाओं की बुनियादी पूरी तरह इंटरनेट कनेक्शन पर निर्भर होती है। मोबाइल से लगातार चिपके रहने से बच्चों की आंखों पर बुरा असर पड़ने लगा है। चिकित्सक हमेशा सलाह देते हैं कि कम उम्र के बच्चों को मोबाइलों से दूर रखना चाहिए, क्योंकि इनकी रेडिएशन शारीरिक विकास में बाधक होती है। इन दुष्परिणामों को देखते हुए कुछ राज्यों ने पहली से पांचवी तक के छात्रों के लिए ऑनलाइन क्लासों पर रोक लगाई हैं।