दूरी मत बनाओ ईरान से  नादानी भारी पड़ेगी ईमान से

‘मरता क्या न करता…।’ यह कहावत इन दिनों ईरान पर चरितार्थ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बेजा दबाव, ईरान को समझौते के लिए मजबूर तो कर रहा है परंतु ईरान जानकर समझौते अमेरिका या अमेरिकी हित में नहीं, बल्कि अनजाने में खुद के व हिंदुस्थान के अहित में करने जा रहा है। ईरान, अमेरिका की आंखों की किरकिरी और हिंदुस्थान की ऑल टाइम मुसीबत, चीन की गोद में बैठने जा रहा है। उसने हर लिहाज से चीन की कॉलोनी बनने की आत्मघाती सहमति दे दी है। वो चीन की ऐसी कॉलोनी बनने जा रहा है जैसी तो आज तक पाकिस्तान भी नहीं बना है। बात चौंकानेवाली जरूर है पर सोलह आने सच है। इस पर चिंता विशेष यही कि ईरान-चीन की एक हालिया डील केवल हिंदुस्थान के लिए सामरिक-व्यापारिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक लिहाज से भी तंग घेरेबंदी का तानाबाना है। बहुत संभव है कि ट्रंप की एक नादान हरकत का खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़े और निश्चित तौर पर हिंदुस्थान को भी सहना पड़े।
दरअसल, इस चौंकानेवाली हकीकत की जड़ में डोनाल्ड ट्रंप का ‘ट्रेड टेररिज्म’ है। उनका वह सनकी पैâसला भी है जिसमें उन्होंने अचानक ईरान के साथ परमाणु संधि खत्म कर दी थी। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल में काफी सूझबूझ से, थोड़ा पीछे हटकर ईरान के साथ दूरदृष्टतावाला परमाणु समझौता किया था। अमेरिका की चिंताओं से ऊपर उठकर, मध्य-पूर्व में सामरिक संतुलन और सामंजस्य बनाए रखनेवाला महत्वपूर्ण करार किया था। जिसे न जाने कौन-सा हित देखकर ट्रंप ने तड़ाक से तोड़ दिया। सोचा था ईरान घुटनों के बल आ जाएगा, पर दुर्भाग्य से ऐसा हो न सका। ईरान इससे बौखलाया और बेलगाम हो गया। उस दिन का दिन है और आज का दिन, हालात सुधारने के बजाय ट्रंप की लगातार सख्ती उसे बिगाड़ती जा रही है। नतीजे में आर्थिक टॉर्चर से परेशान ईरान विद्रोह पर उतर आया है। शुरुआती दौर में ईरान ने समझौते के संकेत दिए थे, परंतु बात न बनती देख आखिर उसने कड़ा रुख अपना ही लिया। ऑइल टैंकर की जब्ती का जवाब ऑइल टैंकर की जब्ती से दिया। अमेरिका का ड्रोन मार गिराया और उसे अपनी मिसाइलों की धौंस भी दिखाई। डंके की चोट पर अपना यूरेनियम उत्पादन बढ़ाया। कथित तौर पर सऊदी अरब के ऑइल ठिकानों पर हमला करवाया। लगातार अमेरिका को आंखें दिखार्इं और अब भी दिखा रहा है। क्या बिगाड़ लिया अमेरिका ने ईरान का? कुछ नहीं। क्यों? दरअसल, ईरान जानता है कि अफगानिस्तान में कमर तुड़वा चुके अमेरिका में अब उससे सीधे लड़ने का न सामर्थ्य है, न ही इच्छाशक्ति। वो उसे सिर्फ गीदडभभकी दे सकता है। अमेरिका भी अपने इस सच से भली-भांति परिचित है। इसलिए ट्रंप चचा केवल प्रतिबंधों की कड़ाई से ही लड़ाई जीतने की उम्मीद पाले बैठे हैं। उनकी यही कड़ाई असल मुसीबत की जड़ है। इसने ईरान को झुकने से बेहतर अपनी राष्ट्रीय पॉलिसी में ढिलाई बरतते हुए स्वहित में चीन से बड़ा समझौता करने को उसे मजबूर किया है। समझौता ४०० बिलियन डॉलर की चीनी ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ का हुआ है। मुसीबत का मटेरियल चीन की इसी लाइन ऑफ क्रेडिट के मसौदे और मकसद में छिपा है, जो महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट सीपेक (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) से भी आठ गुना बड़े आकार का है। जो हिंदुस्थान के कुल वैâश रिजर्व के तकरीबन बराबर है। इसके तहत चीन ईरान के तेल और गैस क्षेत्रों में २८० बिलियन डॉलर और ट्रांसपोर्ट इंप्रâास्ट्रक्चर पर १२० बिलियन डॉलर की ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ दे रहा है। बदले में काम के साथ-साथ उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए १३ फीसदी कम दाम पर ईरान से गारंटीड तेल और गैस का रिटर्न मिल रहा है। उस पर बड़ी चिंता यह कि चीन ईरान में ४०० बिलियन डॉलर निवेश की सुरक्षा के बदले में वहां अपने ५००० सैनिकों को भी तैनात करने जा रहा है। २५ वर्षों की इस ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ के दौरान यह ५ से ५० हजार हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान में पहले से ही चीन के हजारों सैनिक तैनात हैं उस पर ईरान में भी उनकी यह ताजा तैनातगी हमारी सुरक्षा के लिए बेहद ही गंभीर मसला है। श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट पर उसकी उपस्थिति पहले से ही बनी हुई है। कुल मिलाकर आर्थिक रूप से कमजोर और कूटनीतिक तौर पर अलग-थलग प़ड़े ईरान को चीन ने पूरी तरह साधने में कामयाबी हासिल कर ली है।
चीन जैसा एक देश जिसे इस आधुनिक युग का कूटनीतिक गिद्ध कहा जा सकता है, जो दूसरों की जमीन हथियाने का कोई मौका नहीं छोड़ता, उसके लिए इस ट्रेड वॉर में यह डील मुंहमांगी मुराद है और अमेरिका और हिंदुस्थान के हितों को बहुत बड़ी चुनौती। आज दुनिया से हताश-निराश ईरान को फांस कर चीन एक तीर से कई निशाने साध रहा है। वो एक ओर तो अमेरिका के ट्रेड वॉर का हिसाब बराबर कर रहा है तो दूसरी और अपने इंडस्ट्रीयल-मैन्यूपैâक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर को मजबूती दे रहा है। चीन इसके जरिए ईरान में गारंटीड बाजार हासिल कर रहा है। अपनी इकोनॉमी को बूस्ट दे रहा है और बदले में ब्याज, व्यापार और अपने बेल्ट एंड रोड इनिसिएटिव को मजबूती दिला रहा है। वो एक तरह से ईरान को भी अपनी कॉलोनी बनाने जा रहा है। कुल मिलाकर वो इस ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ के जरिए पाकिस्तान से लेकर पूरे मिडिल ईस्ट पर ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ हासिल कर रहा है। वो रिटर्न के तौर पर क्षेत्र के पूरे एनर्जी भंडार पर अपनी मजबूत पकड़ बना रहा है। ईरान से संबंध सुधारकर वो अपनी ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना को हर लिहाज से सार्थक बना रहा है। तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के रास्ते सीधे तेल और गैस क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल कर रहा है। बदले में आपूर्ति और व्यापार का पर्याय भी हासिल कर रहा है। उसे इसके लिए समुद्री मार्ग की निर्भरता से काफी हद तक निजात मिलने जा रही है। बोनस के तौर पर उसे हिंदुस्थान पर शिकंजा कसने का मौका मिल रहा है वो अलग से। ईरान को साधकर चीन ने हम पर हर तरह से नकेल कसने की क्षमता हासिल कर ली है।
हिंदुस्थान के लिए चिंता के कई विषय हैं तो उधर खुद ईरान के लिए भी चिंता कम नहीं है। वो इस डील के संभावित खतरों को जानते हुए भी कि भविष्य में उसके लिए यह मुसीबत बन सकती है, अपनी वर्तमान जरूरतों के लिए इसे सहर्ष स्वीकार कर चुका है। वो यह डील डॉलर में न करके चीनी मुद्रा में करने जा रहा है। खैर, अमेरिका के चक्कर में हमने ईरान जैसे अपने ऑल टाइम प्रâेंड से दूरी बना ली है। उनके दबाव में आकर हमने उससे तेल खरीद बंद कर दी है। व्यापार समेट लिया है। नतीजा ईरान से हमारे संबंधों पर नजर भी आने लगा है। अभी हाल ही में कश्मीर मसले पर ईरान के बदले सुर से इसके साफ संकेत भी मिले हैं। उससे पहले भी अमेरिकी गलबहियों पर ईरान ने हमें संकेत दिए थे। आज बात यहां तक पहुंच गई है कि ईरान अब हिंदुस्थान से चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट की सुस्ती पर भी जवाब मांगने लगा है। हो सकता है चाबहार का बचा-खुचा काम भी कल को चीन की झोली में चला जाए और हिंदुस्थान के हाथ से न केवल ईरान का एक महत्वपूर्ण पोर्ट और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग निकल जाए बल्कि हम अफगानिस्तान और मिडिल ईस्ट तक अपनी सीधी पहुंच का पर्याय भी खो बैठें। इसलिए सचेत हो जाओ, ईरान का हिंदुस्थान के प्रति नजरिया बदल रहा है। ड्रेगन उसे मोहपाश में कस रहा है। लिहाजा दूरी मत बनाओ अब ईरान से क्योंकि यह नादानी भारी पड़ेगी ईमान से।