दूसरे चरण में किसान रण में

लोकसभा चुनावों की पहली पारी समाप्त हो चुकी है। दूसरी पारी की तैयारी पूरे शबाब पर है। उत्तर प्रदेश के दूसरे चरण में ०८ लोकसभा सीटों पर १८ अप्रैल को संग्राम होना है। पहले चरण की तरह इस चरण में भी भाजपा को सपा-बसपा और रालोद के मजबूत गठबंधन के सामने मुश्किल भरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। फिर भी पहले चरण के मुकाबले भाजपा यहां कुछ राहत का अनुभव कर सकती है। पहले दौर में भाजपा अधिकांश सीटों पर पसीना रही है और उसे ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। अमरोहा, अलीगढ़, मथुरा, फतेहपुर सीकरी समेत नगीना, बुलंदशहर, आगरा और हाथरस जैसी सुरक्षित सीटें इनमें शामिल हैं। दूसरे चरण में बसपा-सपा-रालोद की अगुवाई हाथी कर रहा है। आठ में से ०६ सीटों पर चुनावी मैदान में बसपा है और सपा-रालोद एक-एक सीट पर चुनाव लड़ रही है। अत: दूसरे चरण का मतदान, मायावती बनाम नरेंद्र मोदी के बीच चुनावी मुकाबला माना जा रहा है। इस दौर में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और भाजपा की हेमा मालिनी की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है।
सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण के चुनाव के प्रमुख मुद्दे क्या होंगे? धार्मिक विभाजन व जातीय गोलबंदी के अलावा भी क्या कुछ स्थानीय मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित करेंगे? यह समझने के लिए दूसरे चरण की सीटों को दो हिस्से में बांटा जा सकता है। पहला हिस्सा मेरठ के आस-पास का है, जहां गन्ने की खेती होती है तथा गन्ना किसानों का बढ़ता बकाया प्रमुख मुद्दा है।
लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से पहले उत्तर प्रदेश में गन्ना एक बड़ा चुनावी मुद्दा था। अब दूसरे चरण (१८ अप्रैल) में आलू को अहम चुनावी मुद्दा माना जा रहा है। कल आगरा में मायावती और अखिलेश यादव की बड़ी रैली प्रस्तावित है लेकिन आज चुनाव आयोग की दो दिनी पाबंदी लगने के कारण बसपा सुप्रीमो बरसों से पार्टी का गढ़ रहे इस इस इलाके में प्रचार नहीं कर सकेंगी। गौरतलब है कि २०१४ के लोकसभा चुनाव में सभी आठ सीटों को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जीतने में कामयाब रही थी लेकिन किसानों की नाराजगी के साथ ही भाजपा को इस बार सपा-बसपा और आरएलडी के महागठबंधन की चुनौती का भी सामना करना पड़ेगा।
हाथरस में आलू से आफत
हाथरस जिले के सादाबाद विकासखंड के आलू किसान राम सजीवन कहते हैं मोदी जी, दो हजार रुपए की किस्त देने से किसान का कुछ नहीं होगा। हम चाहते हैं कि जैसे सरकार गेहूं का समर्थन मूल्य तय करती है, वैसे ही आलू का भी किया जाए। इस क्षेत्र में ९५ फीसदी किसान आलू की खेती करते हैं। हाथरस सीट जाट बहुल मानी जाती है इस सीट पर करीब ३ लाख जाट, २ लाख ब्राह्मण, १.५ लाख राजपूत, ३ लाख दलित, १.५ लाख बघेल और १.२५ लाख मुस्लिम मतदाता हैं।
आगरा में भी आलू मुद्दा
आगरा सुरक्षित सीट पर बसपा ने मनोज सोनी, भाजपा ने एसपी सिंह बघेल और कांग्रेस ने प्रीता हरित को मैदान में उतारा है। भाजपा के एसपी बघेल सपा और बसपा में रह चुके हैं, ऐसे में मुस्लिम मतदाताओं में अच्छी खासी पकड़ मानी जाती है। इस तरह से भाजपा के साथ-साथ बघेल दूसरे दलों के वोट बैंक को साधने में कामयाब रहते हैं तो एक बार फिर कमल खिल सकता है। हालांकि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर भी इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ऐसे में उनका भी अपना एक आधार है जबकि दलित और मुस्लिम के सहारे बसपा भी जीत की आस लगाए हुए है। आगरा देश का दूसरा सबसे अधिक स्वरोजगार रखने वाले लोगों का शहर है।
बुलंदशहर में किसान नाराज भी, साथ भी
बुलंदशहर में मुख्य मुकाबला भाजपा के भोला सिंह, गठबंधन के योगेश वर्मा और कांग्रेस के बंसी सिंह में है। भोला सिंह २०१४ में यहां से चार लाख से ज्यादा वोटों से जीते थे। विदित हो कि वर्ष १९९१ में बसपा सुप्रीमो मायावती भी इस सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं। उन्हें चौथे नंबर पर संतोष करना पड़ा था। बुलंदशहर लोकसभा के अंतर्गत कुल ५ विधानसभा अनूपशहर, बुलंदशहर, डिबाई, शिकारपुर और स्याना विधानसभा सीटें आती हैं। २०१७ विधानसभा चुनाव में इन सभी ५ सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की है। भाजपा को अपने परंपरागत लोधी, ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य सहित सवर्ण मतों पर भरोसा है। मोदी के नाम पर वोट की बात भी लोग कहते दिख रहे हैं जबकि बसपा प्रत्याशी दलित-मुस्लिम और सपा-रालोद के परंपरागत मतदाताओं पर उम्मीद लगाए हुए हैं। जाट मतदाताओं का रुझान अभी पूरी तरह साफ नजर नहीं आ रहा। कांग्रेस प्रत्याशी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास कर रहा है।
अमरोहा सीट पर चुनौती
शायरों की नगरी कही जाने वाली उत्तर प्रदेश की अमरोहा लोकसभा सीट पर सभी की नजरें हैं। मुस्लिम बहुल इस सीट पर २०१४ में सभी को चौंकाते हुए भाजपा ने जीत दर्ज की थी। अमरोहा लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी ने कुंवर दानिश को मैदान में उतारा है। वहीं, भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद कंवर सिंह तंवर पर दांव लगाया तो कांग्रेस ने सचिन चौधरी पर दांव खेला है। अमरोहा सीट के जातीय समीकरण को देखें तो करीब ५ लाख मुस्लिम, २.५ लाख दलित, १ लाख गुर्जर, १ लाख कश्यप, १.५ लाख जाट और ९५ हजार लोध मतदाता हैं। मेरठ, मुरादाबाद और संभल से सटे अमरोहा में इस बार वोटरों का मिजाज ही यहां का रुख तय करता है।
सियासत का `नगीना’ किसके हाथ?
नगीना लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैै। यहां से बसपा ने गिरीश चंद्र, भाजपा ने मौजूदा सांसद यशवंत सिंह और कांग्रेस ने पूर्व आईएएस आरके सिंह की पत्नी ओमवती को उतारा है। यहां निर्णायक समझे जाने वाले मुस्लिम मतदाताओं पर ही सबकी नजर है। नगीना सीट पर गठबंधन और कांग्रेस दोनों की नजर दलित और मुस्लिम वोटों पर है जबकि भाजपा राजपूत और गैर जाटव दलित के साथ-साथ जाट मतदाताओं के सहारे दोबारा जीत दर्ज करना चाहती है लेकिन ६ लाख मुस्लिम वोटर इस सीट पर किंगमेकर की भूमिका में हैं।
राज बब्बर त्रिकोणीय मुकाबले में
फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट का मुकाबला त्रिकोणीय होता नजर आ रहा है। यहां से भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद बाबूलाल चौधरी का टिकट काटकर राजकुमार चहेर को उतारा है जबकि कांग्रेस से प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और बसपा से गुड्डू पंडित मैदान में हैं। इस सीट पर दो लाख जाट मतदाताओं के देखते हुए भाजपा ने जाट समुदाय पर दांव खेला है जबकि तीन लाख ब्राह्मण मतों को ध्यान रखकर बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेला है। ऐसे में कांग्रेस के राज बब्बर के सामने सबसे बड़ी चुनौती जातीय समीकरण को तोड़ना है।
मथुरा सीट पर हेमा का जादू चलेगा?
मथुरा लोकसभा सीट से भाजपा ने एक बार फिर हेमा मालिनी को उतारा है जबकि आरएलडी से कुंवर नरेंद्र सिंह और कांग्रेस से महेश पाठक मैदान में हैं। ज्ञात हो कि दूसरे चरण में मथुरा सबसे अमीर सीट है। यहां भाजपा प्रत्याशी हेमा मालिनी, कांग्रेस प्रत्याशी महेश पाठक और रालोद प्रत्याशी नरेंद्र सिंह शीर्ष पांच अमीर प्रत्याशियों की सूची में शामिल हैं। यहां करीब ४ लाख जाट समुदाय के मतदाता हैं जबकि २.५ लाख ब्राह्मण और २.५ लाख राजपूत वोटर भी हैं तथा इतने ही दलित मतदाता हैं। इस सीट पर डेढ़ लाख के करीब मुस्लिम हैं। आरएलडी उम्मीदवार राजपूत के साथ-साथ जाट, मुस्लिम और दलितों को साधने में कामयाब रहते हैं तो फिर भाजपा के लिए कठिन हो जाएगा।
अलीगढ़ में होगा त्रिकोणीय मुकाबला
अलीगढ़ लोकसभा सीट से भाजपा ने मौजूदा सांसद सतीश गौतम और कांग्रेस ने चौधरी बिजेंद्र सिंह को मैदान में उतारा है जबकि बसपा ने अजीत बालियान को उतारा है। अलीगढ़ में मुस्लिम वोटर लगभग तीन लाख हैं। मुस्लिमों का अधिकांश वोट गठबंधन के कारण बालियान को मिलने की संभावना है। राजपूतों के बाद अलीगढ़ में सबसे ज्यादा संख्या ब्राह्मणों की है। माना जा रहा है कि सतीश गौतम ब्राह्मण है इसलिए उन्हें ब्राह्मण वोट आसानी से मिलेगा। राजस्थान के राज्यपाल और यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह भी इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ रखते हैं। सतीश गौतम, कभी कल्याण सिंह के बहुत खास माने जाते थे लेकिन पिछले पांच वर्षों में सांसद और कल्याण सिंह के बेटे राजबीर के बीच विवाद बढ़ता गया। सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी राजबीर और सतीश के बीच सुलह कराने की कोशिश की। सूत्रों की मानें यह राजनीतिक दूरी भाजपा को विजय से दूर करने का पर्याप्त कारण बन सकती है।